जनाब कितने पानी में है सब जानू--धर्मेन्द्र मिश्र

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जनाब कितने पानी में है सब जानू--धर्मेन्द्र मिश्र

Post by admin » Sun Jan 21, 2018 7:08 pm

..व्यंग्य..

जनाब कितने पानी में है सब जानू ,

कितने खरे कितने खोटे ये भी जानू .

जनाब की अक्कल गई है घास चरने,

खुद को समझे अक्कल का थाने दार.

खरी-खरी जो कहता हूँ तो जनाब की

नजरो में मै ही मुजरिम बनजाउं.

वो खरी बात क्या है,कोई मुझसे पूंछे तो बताऊँ .

जनाब को लगता हम अमीर है.

यह मोहल्ले को कैसे बतलाऊँ.

मेरी नाक सबसे ऊपर है,

अमीरियत का डंका मोहल्ले में कैसे बजाऊं.

फलाने से फलाने साहब !कैसे बन जाऊँ.

जनाब ने एक तरकीब निकली ,

सर पर हैट पैर में बूट पहन के रोज सबेरे

रौब दिखते कुत्ता टहलाने जाते है .

कुत्ते की भी सानो-सौकत देखो

जनाब ने उसके लिए भी ड्रेस बनवायी है.

कुत्ता तो कुत्ता है पेड़ के ऊपर या गाड़ी

के टायर में ही मूतेगा.

साफ-सुथरी जगह पर ही टट्टी करेगा .

जनाब ने कुत्ते को हर अदब सिखलाई है .

दोनों टांग निचे करके

मूते बस यही कला नहीं सिखाई है.

साहब का कुत्ता भी साहब की भाषा बोलता है .

भौ-भौ करता,आंख दिखता

सड़क किनारे बैठे गरीबो पर ही भौकता है.

जनाब ने कुत्ते को सिखलाई फर्राटेदार अंग्रेजी,

जनाब ने कुत्ते का नाम भी रखा है अंग्रेजी.

बिलायती कुत्ता है भाई!भला वो हिंदी खाक समझेगा .

हाय!हेलो!गुडमॉर्निंग कहने पर ही गोल-गोल पूंछ हिलायेगा .

क्या जनाब की अकड़ और कुत्ते की

पूंछ कभी सीधी हो सकती.

कुत्ता ,जनाब है या जनाब ही कुत्ता है,

ये भी बात मेरी समझ में नहीं आती.

क्या जनाब कभी साहब बन पायेंगे या

कुत्ते की सोहबत में कुत्ता ही बन जाएंगे .

अब ये तो जनाब या जनाब के मोहल्ले वाले ही बताएँगे .
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