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जब लोकतंत्र के मन्दिर में मानव का जीना दुष्कर है----अनुराग 'अतुल'

Posted: Wed May 16, 2018 10:13 am
by admin
अनुराग 'अतुल'
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जब लोकतंत्र के मन्दिर में मानव का जीना दुष्कर है,
है द्वार खुला भ्रष्टों हित, सच्चे जन का आना वर्जित है।
जुमलों के मंत्रों पर मोहित जब हो जाये युग का भैरव ,
तब चाहे जो भी दल जीते , जनता की हार सुनिश्चित है।

हिन्दू, मुस्लिम , ब्राह्मण, यादव, हरिजन, वैश्यों को बाँट बाँट।
यह राजनीति की नाव चली समरसता का जल काट काट।
सब कहते हैं चुनाव में, उनकी अब कारा की बारी है ।
हमको आपस में शत्रु बना , चोरों में बेशक यारी है।

जब राजनीति-साज़िश , नेता में गुंडा अर्थ समाहित है ।
तब चाहे जो भी दल जीते जनता की हार सुनिश्चित है।

जो सन्तों को प्रश्रय दे वह तो हर प्रकार से श्लाघनीय ।
लेकिन फ़र्जी बाबाओं के सरंक्षक कैसे पूजनीय ?
वोटो के लिए बलात्कारियों के चरणों पर गिरे पड़े !
ऐसे नेताओं के चरित्र पावन भारत में भरे पड़े !

गाँधी, सुभाष की शुचिता जब कर्मों में शेष न किंचित है।
तब चाहे जो भी दल जीते , जनता की हार सुनिश्चित है।

अच्छी शिक्षा, अच्छा इलाज जिस जनता को न मयस्सर हो।
लाखों आवास योजनाओं के सम्मुख टूटा छप्पर हो !
हों पढ़े लिखे बेरोजगार , विक्षिप्त जहाँ तरुणाई हो !
नित प्रति गुड़ियों की चीत्कार, हर मन को अति दुखदाई हो !

जब भारत की भूखी पीढ़ी निज अधिकारों से वंचित है ।
तब चाहे जो भी दल जीते , जनता की हार सुनिश्चित है।

-अनुराग 'अतुल'