ज़माने के सारे दर्द पीकर हम लिखते है--प्रणव कुमार मिश्रा

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ज़माने के सारे दर्द पीकर हम लिखते है--प्रणव कुमार मिश्रा

Post by admin » Fri Jul 31, 2015 1:56 pm

ज़माने के सारे दर्द पीकर हम लिखते है।
वो पागल हमें शौकिया शायर समझते है।

दम घुट सा जाता है तुम बिन जीने में।
जानती हो कब्रिस्तान दफन है सीने में।

जो हुए रौशन रौशनी से उन्हें भी जलना पड़ता।
सोना यूँ ही नही चमकता उसे भी तपना पड़ता।
---प्रणव मिश्र'तेजस'
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