कोशिशें बहुत की उनको समझाने की--रवि श्रीवास्तव

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कोशिशें बहुत की उनको समझाने की--रवि श्रीवास्तव

Post by admin » Tue Oct 20, 2015 5:08 am

1- कोशिशें बहुत की उनको समझाने की,
अब तो हद हो गई रूठाने मनाने की।
मेरी बातों पर न गौर करना फितरत है उनकी,
मेरी नही उन्हें तो फिकर है जमाने की।
2- मेरे सब्र का इम्तहान लेते रहे,
बेवफाई का हमें इल्जाम देते रहे.
कसूर मेरा इतना चाहा पेपनाह उन्हें,
बस यही सोचकर रातों को रोते रहे.
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