बाहर औ' भीतर मेरे, रहती है जैसे हवा--रवीन्द्र गोयल

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बाहर औ' भीतर मेरे, रहती है जैसे हवा--रवीन्द्र गोयल

Post by admin » Fri Oct 23, 2015 5:17 am

अहसास '

बाहर औ' भीतर मेरे, रहती है जैसे हवा,
कुछ इसी तरह से, जहां तुझ में है रवां ।

मुस्कराहट है तेरी, या गुम - सुम तू खड़ा,
नज़ारा है खूबसूरत, या फिर गर्दिशों भरा ।

' रवीन्द्र '
मुम्बई ; २२-१०-२०१५
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