एक मतला दो शे'र--प्रणव मिश्र'तेजस'

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एक मतला दो शे'र--प्रणव मिश्र'तेजस'

Post by admin » Fri Dec 11, 2015 7:32 pm

एक मतला दो शे'र
Pranav kumar mishra
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29-11-2015
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pranavkumar016@gmail.com

एक मतला दो शे'र--

छलकता नीर आँखों से किसी की ये निशानी है
मुकद्दर में लिखी है हार,अपनी ये जुबानी है।

बड़ा बदनाम करता है जमाना इस मुहब्बत को
हमें लगता ज़माने की ठनी रंजिस पुरानी है।

मुहब्बत फिर भी जिंदा है कयामत तक लड़ेगी ये
किसी की आँख का पानी हमारी ही कहानी है।

©प्रणव मिश्र'तेजस'
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