यह पाषाढ़ शिलाएं पर्वत की--dhanendra kumar

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यह पाषाढ़ शिलाएं पर्वत की--dhanendra kumar

Post by admin » Tue Jan 05, 2016 8:03 am

यह पाषाढ़ शिलाएं पर्वत की, यूँ मोम की तरह नहीं पिघलती...
पर निर्मल धाराएं निर्झर की, इन्ही चट्टानों के सीने से निकलती....
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