आलिमो के अंजुमन में मेरा क्या काम---धर्मेन्द्र मिश्र

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आलिमो के अंजुमन में मेरा क्या काम---धर्मेन्द्र मिश्र

Post by admin » Fri Nov 24, 2017 10:26 am

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1-आलिमो के अंजुमन में मेरा क्या काम .

मैं ठहरा काफिर भला खुदा से क्या काम .

2-ऐ खुदा रहम कर मिरि मोहब्बत है तिरि जागीर नहीं

मिरि किस्मत का फैसला कर मिरि मोहब्बत का नहीं

3-दिन में काम तलाशता हूँ ,रात में आसियाना तलाशता हूँ .

मज़दूर हूँ ऐ खुदा औरो की तरह तिरि रहम पे नहीं जीता हूँ .

4-पपीहा भी प्यासा मैं भी प्यासा ,दोनों की प्यास है की बुझती नहीं .

5 -एक जमीं दूजा आसमान में भटके ,दोनों का कोई मुकमल जंहा नहीं .

6- तिरि दुनिया छोड़ ,लो अपनी दुनिया आ गया .

पहले भी सिफर था ,देखो सिफर ही रह गया .

7- मुख चंद्र सा देख नयन तृप्त हो जाय .

ऐसी सुन्दर काया देख मन उपबन होजाय .

9-कौन कहता है खूबसूरत सिर्फ तिरि आंखे है .

रूठ कर नजरे चुराने पर भी तू क़यामत है .

10-बदबख्त तड़पते गरीब को दो- चार लानते देता हर कोई ,

रोटी की जगह नसीहते देता हर कोई .

11-रक्त रंजीत कर धरा को खून से भिगो दिया .

जन्नत की चाह में इंसानो ने इंसानो का खून बहा दिया .

12-क़त्ल तो मेरा कब का होगया अब तो लाश बनके घूमता हूँ ,

इन्ही चेहरों में छिपा है मेरा कातिल ,मगर नाम नहीं लेता हूँ .

13-सब के भाव आसमान में है ,सुना है आजकल सब के पास काम है ,

किसी को ट्विटर पे तो किसी को फेसबुक पे ,किसी की माँ बहन करना भी तो एक काम है .
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