है मुझसा पत्थर कोई नहीं---धर्मेन्द्र मिश्र

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है मुझसा पत्थर कोई नहीं---धर्मेन्द्र मिश्र

Post by admin » Sat Nov 25, 2017 10:04 am

1- पत्थर खामखा गुमान पाले बैठा है मुझसा पत्थर कोई नहीं .
आ देख इन पत्थर दिल इंसानो को इनसे पत्थर तू भी नहीं .
2-
सायर हूँ हर बात को दिली जज्बात से जोड़ कर देखता हूँ .
तेरे दर्द को भी अपना जान के जीता हूँ.
3-
उम्र गुजर गई बात-करते लगता है कोई बात हुई नहीं ,चेहरे पर झुर्रिया पड़गई मगर दिल की ताजगी गई नहीं .
4-
मुझे आपसे मोहब्बत है अपनी जुबा से बस इतना ही कहना है ,इससे आगे तो मेरे आंसुओं को ही कहना है .
5-मिलजाती मुझे भी चाहने वाली कोई गर तो रात मैंने मैखाने में न गुजारी होती .
6-तेरे हाँथ का खिलौना ही सही खुस हूँ मैं थोड़ी देर के लिए ही सही .
7-रह गुजर जायूँगा तेरे दिल में इक फ़साना छोड़ जायूँगा तेरे दिल में ,तू मिले न मिले इक कसक छोड़ जायूँगा तेरे दिल में .
8-मुझे सराब की आदत नहीं सराब को मिरि आदत हो चली है ,तनहा ,अकेला देख मुझे ही पिने लगी है .
9-महफूज है तिरि बफा मीरे दिल के आसियाने में ,आल्हद है तिरि अदा जो दीवाना बनगाई इक ही इसरो में .
10-चेहरे पे तिरि ये उदासी अच्छी नहीं लगती गम खाये हुए लगते हो ,तभी तो रौनक- ए-महफ़िल में भी बुझे -बुझे से दीखते हो .
11-मोहब्बत हम किसी से नहीं करते बस यूँ ही दिल्ल्गी कर लेते है ,खता होगी उनसे नादा जो ठहरे दिल्ल्गी को मोहब्बत का नाम दे बैठे ,हम तो दिल फेक आशिक़ है जो हर हंसी चेहरे पे मर मिटा करते है.
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