बसंत ----सुशील शर्मा

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बसंत ----सुशील शर्मा

Post by admin » Sun Jan 21, 2018 7:03 pm

हाइकु -123

बसंत

आया बसंत
पतझड़ का अंत
मधु से कंत

ऋतु वसंत
नवल भू यौवन
खिले आकंठ

शाल पलाश
रसवंती कामिनी
महुआ गंध।

केसरी धूप
जीवन की गंध में
उड़ता मकरंद

कुहू के स्वर
उन्माती कोयलिया
गीत अनंग।

प्रीत पावनी
पिया हैं परदेशी
रूठा बसंत।

प्रिय बसंत
केसरिया शबाब
पीले गुलाब
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