लोग दोगले-----सक्मकालीन हाइकु VI

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लोग दोगले-----सक्मकालीन हाइकु VI

Post by admin » Sun Sep 03, 2017 6:42 am

18. डॉ. शरद जैन

लोग दोगले
आदर्श खोखले हैं
स्वर तोतले ।

बरसे मेघ
कूक उठी कोयल
मन घायल ।

ये प्रजातंत्र
बंदर की लंगोटी
एक कसौटी ।

शस्त्रों की होड़
बमों में है शायद
शांति की खोज ।

19. नलिनीकान्त

बुझेगा दीप
अंचरा न उघारो
पूरबा मीत ।

धूप का कोट
पहनकर खड़ा
होरी का बेटा ।

सिन्धु से सीखा
गरजना मेघों ने
यही संस्कार ।

सराय नहीं
आसमान में कहीं
बादल लौटो ।

20. अशेष बाजपेयी

गम इसका
नश्वर संसार में
कौन किसका ?

सूर्य ढला है
अंधेरे ने छला है
दुखा पला है ।

फूल जो खिला
घर के आंगन में
भाग्य से मिला ।

यह जीवन
है कठिन प्रमेय
रेखा अज्ञेय ।

21. सूर्यदेव पाठक पराग

यश की ज्योति
अनन्त काल तक
चमक देती ।

ओ प्यारे बीज !
अगर जमना है
मिट्टी से जुड़ो ।

गीता की वाणी
कर्म की संजीवनी
जग-कल्याणी ।

उषा सहेली
हौले से गुदगुदाती
कली मुस्काती ।

22. ओ.पी. गुप्ता

जुड़ना अच्छा
रिश्ते देते सहारा
समीप – आओ ।

दाग लगता
हर बदन पर
पग धरते ।

नून तेल का
भाव बता नहीं है
मौज करेंगे ।

चढ़ोगे यदि
उतरना भी होगा
जीना-मरना ।

23. सदाशिव कौशिक

भोले सूर्य को
निकलते ही फांसे
बबूल झाड़ी ।

पानी बरसें
टपरे वाले लोग
भूखे कड़के ।

उड़ने लगे
पहाड़ हवा संग
राई बन के ।

फूल महके
पौधे बेखबर थे
हवा ले गई ।
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