साँप दूध पी---समकालीन हाइकु VII

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साँप दूध पी---समकालीन हाइकु VII

Post by admin » Sun Sep 03, 2017 6:50 am

25. मनोहर शर्मा

साँप दूध पी
उगले न जहर
संभव नहीं ।

जिंदगी जीना
आसान काम नहीं
वेदना पीना ।

संवेदनायें
हो रहीं अवधूत
हुए हैं भूत ।

आधी गागर
छलकत जाये रे
गधा गाये रे ।

26. शैल रस्तोगी

सोई है धूप
तलहटी जागती
थकी लड़की ।

फूले कनेर
महकी यादें, मन
टीसती पीर ।

लिखती धूप
फूल फूल आखर
भागती नदी ।

आँखें पनीली
धुँधलाया आकाश
दिखे ना चांद ।

27. रमेश कुमार सोनी

मौत तो आयी
जिंदा कोई न मिला
वापस लौटी ।

याद रखना
भीड़ पैमाना नहीं
कद माप का ।

अकेला चाँद
साथ मेरे चलता
रात में डरे ।

पत्थर पूजा
ईश्वर मानकर
कुछ न मिला ।

28. कमलेश भट्ट

गर्मी बढ़ी तो
बढ़ा ली पीपल ने
हरियाली भी ।

आग के सिवा
और क्या दे पाएगा
दानी सूरज ।

खुद भी जले
धरा को जलाने में
ईर्ष्यालु सूर्य ।

टंगे रहेंगे
आसमान में मेघ
कितनी देर ?

29. डॉ. सुनील कुमार अग्रवाल

पत्थर भी क्या
सज सकते कभी
डालियों पर ।

हाथ से गिरे
मोती कूदते हुए
दूर हो गये ।

रेत समेटे
गिलहरियाँ घूमे
राम न चूमे ।

नदी थी नीली
अब नाला हो गई
पाप धो गई ।

30. रमेशचन्द्र शर्मा

धँसा सो फँसा
दलों का दलदल
मुक्ति कठिन ।

लीला वैचित्र्य
पल-पल प्रसन्न
प्रभु के भक्त ।

वर्जित शब्द
गूढ़ रहस्य मृत्यु
अस्तित्वहीन ।

आतंकवाद
बेटा ही बाप बना
गले की फाँस ।

31. डॉ. मिथिलेश दीक्षित

चाँद शिशु है
चाँदनी में है खिली
उसकी हँसी ।

बुझ न जाएँ
टिमटिमाते दीप
जागो जिन्दगी ।

पानी की कमी
आँसू टपका रही
पानी की टंकी ।

मानव तन
क्षित, जल, पावक
वायु, गगन ।
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