शीशा वो शीशा--समकालीन हाइकु VIII

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शीशा वो शीशा--समकालीन हाइकु VIII

Post by admin » Sun Sep 03, 2017 6:53 am

32. उर्मिला कौल

शीशा वो शीशा
टूटता आदमी भी
कण चुगूँ मैं ।

बीज अंकुरा
पात-पात पुलका
आया पावस ।

यादों के मोती
चली पिरोती सुई
हार किसे दूँ ?

कुहासा भरा
मन, कहाँ झुकूँ मैं
मंदिर गुम ।

33. कमलाशंकर त्रिपाठी

माँ की छवि मैं
क्या कुछ अन्तर है
कोई कवि में ।

पावस घन
उतरे नीलाम्बर
हरषे मन ।

आ गये कंत
पावस के संग ज्यों
आया बसंत ।

कामना वट
आश्रय पाते आये
तृष्णा के खग ।

34. डॉ. इन्दिरा अग्रवाल

भारत ! राम
विजय सुनिश्चित
पाक ! रावण ।

गीता का स्वर
तरंग जल स्वर
स्निग्ध मधुर ।

मेरा जीवन
ज्वालामुखी का फूल
आग ही आग ।

मन भटके
यत्र-तत्र-सर्वत्र
तृषा न बुझे ।

35. जवाहर इन्दु

महुआ बाग
रस पीती कोयल
पंचम राग ।

तृषा अधूरी
कब होती है पूरी
हमेशा दूरी ।

मौसम गाये
गली-गली महकी
पाहुन आये ।

नदी बहेगी
आँसू नहीं अमृत
दर्द सहेगी ।

(इन हाइकुओं का संकलन सृजन-सम्मान के सरिया विकासखंड (रायगढ़ जिला) के अध्यक्ष श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" ने अपनी पत्रिका 'हाइकु मंजूषा' में किया है । वे छत्तीसगढ़ के युवा हाइकुकार हैं ।

- जयप्रकाश मानस
रायपुर ( छत्तीसगढ़ )
30/03/2006 आलेख
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