भौंर्या मो----डॉ. पूर्णेन्दु वसिष्ठ

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भौंर्या मो----डॉ. पूर्णेन्दु वसिष्ठ

Post by admin » Sun Dec 25, 2016 12:39 pm

आंचलिक परिवेश में संवेदना और यथार्थ के बीच जूझती कहानियां

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(कहानी संग्रह– भौंर्या मो)
'भौंर्या मो' शीर्षक से कथाकार और व्यंग्यकार कमलानाथ कायह नया कहानी संग्रह 2015के अंत में ऑनलाइन गाथा -द अनएन्डिंग टेल, लखनऊ से पेपरबैक और ई-बुक के रूप में प्रकाशित हुआ है।इस संग्रह में कुल 15 कहानियां हैं, जिनमें 6लघु कथाएं और एक लंबी कहानी ‘भौंर्या मो” शामिल है।कृत्रिमता से परे ये कहानियां शब्दों के अर्थहीन जंजाल में लपेट कर न तो मदारी के खेल की तरह कोई शाब्दिक चमत्कार पैदा करने का दावा करती हैं और न समीक्षकों की ‘अंतर्दृष्टि’ को सहलाने उभारने के लिए तथाकथित ‘नई’ कहानी के‘ओपन-एंडेड’ विषयों और प्रसंगोंकी ऊलजलूल बुनावट का सहारा लेकर कोई अलग तकनीक या मुहावरा गढ़ने का प्रयास।लगता है, ये कुछ सिद्ध करने के लिए नहीं, बल्कि ‘कहानी’ की शैली में ही पाठककी संवेदना छूकर उसके मन के अनछुए कोने तलाशने का प्रयत्न करती हैं।
संग्रह की कहानी ‘भौंर्या मो’ सबसे प्रसिद्ध कहानी है जो कुछ पत्रिकाओं में और अन्यत्र भी छप और चर्चित हो चुकी है। संस्मरणात्मक शैली में लिखी यह कहानी इस तरह बहती है जैसे किसी गाँव में आसपास हो रही रोज़मर्रा की घटनाएं सामने से निकल रही हों। एक बाल-पात्र के रूप में लेखक ने अपने नज़रिए से साठ-पैंसठ वर्षके पहले के काल खंड में अपने इर्दगिर्द पात्रों को गढ़ कर सरल और रोचक भाषा में उस समय के ग्रामीण समाज का चित्र उभारा है।
कहानी की शुरुआत ‘भौंर्या मो’ से सम्बंधित एक दुर्घटना से होती है।पूरी कहानी में यह अज्ञात पात्र ‘भौंर्या मो’ एक तिलस्मी, अदृश्य, अजीबोगरीब, खौफ़नाक ‘एंटिटी’ की तरह कहानी के अंत तक बना रहता है। इसका रहस्य कहानी की अंतिम पंक्तियों में ही खुलता है। शुरुआत और अंत के बीच हैं बहुत सी छोटी मोटी घटनाएँ, गाँव की आम ज़िंदगी में होते घटना क्रम, अपनी अपनी खूबियां और विचित्रता समेटे कई पात्र, वगैरह।ग्रामीण सृष्टि की हलचल, किरदारों के बीच और उनकी रुचियों से जुड़े उनके मनोरंजक कार्यकलाप कहानी को पात्रों और घटना-क्रमों में जोड़े रखते हैं।जयपुर के नज़दीक ही किसी गाँव ‘महापुरा’ के तत्कालीन आंचलिक परिवेश पर अधारित इस कहानी का हर किरदार अपनी विशेषता लिए होता है और उसीखासियत के साथ सामने आता है।कहानी का पात्र किशनू एक बालनायक और सूत्रधार की तरह गाँव में चलती रहने वाली हलचल और कही-अनकही, पोशीदा या ज़ाहिर ‘कहानियों’ के जागरूक दर्शक या कभी उनमें मौजूद खुद एक नुमाइन्दे की तरह दिखाई देता है, चूँकि वह गाँव में ही रहता है और वहाँ हुई हर घटना का साक्षी रहा है।एक गाँव की बायोग्राफी के ‘जोनर’ में लिखी यह कहानी इतनी स्वाभाविक शैली में लिखी हुई है कि हर चरित्र सचमुच जीवन्त लगता है और पाठक से साक्षात्कार करता सा नज़र आता है।कहानी के शीर्षक “भौंर्या मो” का रहस्य अंत में बड़े नाटकीय अंदाज़ में खुलता है।इस लंबी कहानी को जानेमाने लेखक और संपादक असद ज़ैदी ने अपनी पत्रिका “जलसा” के संकलन 3-2012 में भी छापा है और इसे “हिंदी की आंचलिक-कथा में एक अद्भुत और अधिकृत स्वर” के रूप में माना है।
‘रावी के उस पार’ कहानी मैंने पहले भी किसी पत्रिका में पढ़ी है। यह कहानी हिमाचल की प्राकृतिक पृष्ठभूमि में उभरती है, जहाँ बिजली पैदा करने के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में लेखक का दौरा होता है। उसकी मुलाकात एक हादसे के दौरान कहानी की नायिका से होती है जोबकरियां चराने वाली एक भोलीभाली, पर बिंदास, 18-19 वर्ष की अल्हड़ लड़की है।उसकी अगले साल सगाई होने वाली है और वह अपने भावी साथी के खयालों के झूलों में झूलती हुई लेखक से रू-ब-रू होती है और हिमाचल की लोक संस्कृति से जुड़ी बातें बताती है।डेढ़ वर्ष बाद जब लेखक जब दुबारा दौरे पर जाता है तब उत्सुकतावश उसी लड़की के बारे में जानना चाहता है। उससे भेंट होती भी है और लड़की फिर से हिमाचल की लोक-कथाओं के पात्रों के बारे में बातें करती है। यह लड़की जो बेहद जीवंत थी, इस बार बेहद बुझी हुई और उदास नज़र आती है। पता चलता है कि उसकी सगाई ही नहीं हुई। वह अपने मंगेतर को देने के लिए लेखक को एक छल्ला देती है और ‘रावी के उस पार’ लौट जाती है। बाद में पता चलता है कि उसकी और उसके मंगेतर की तो एक हादसे में पिछले साल ही नदी में डूबने से मौत हो चुकी थी! यह रोमांचक कहानी भी बहुत विश्वसनीय तरीके से उभर कर आई है और अंत में पाठक को चौंका कर परा-वास्तविक संसार में पहुंचा देती है।
कहानी ‘पास तक फ़ासले’ पहले ‘परिकथा’ पत्रिका में छप चुकी है और ऐसे ग्रामीण परिवेश का चित्रण करती है जिसकी नायिका लिछमा एक नयी नवेली शादीशुदा 17-18 वर्ष की नव-युवती है।वह अपने पति से बेहद प्रेम करती है और अपने ससुराल में इस नई ज़िम्मेदारी से अपनी जगह बनाने के लिए उत्सुक है। उसी गाँव से हर रोज़ अपने ऊँटों को लेकर एक नौजवान बांका रैबारी गुज़रता है और पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए अलगोजे पर मधुर धुनें बजाता है।लिछमा को वह अच्छा लगता है। उसे लगता है जैसे वह उससे सहज रूप से मन की बातें कर सकती है।गाँव की सामाजिक व्यवस्था रैबारी को खुद कुएं से पानी पीने की इजाज़त नहीं देती, इसीलिए कभी कभी जब लिछमा वहाँ पानी भरने के लिए आई होती है, वह रैबारी को पानी पिलाती है।लिछमाअपनी गृहस्थी में जैसे ही ठहराव पर पहुँचने को होती है कि अचानक एक दुर्घटना में उसका पति मर जाता है।नवयुवती लिछमा का अंतर्द्वंद्व यहीं से शुरू होता है और वह सामाजिक परिवेश और जातिगत मान्यताओं का विश्लेषण करने में और अपने भावी जीवन के लिए दूसरी बिरादरी के रैबारी को लेकर किसी भी फ़ैसले के औचित्य के बीचऊहापोह में रहती है। क्या उसे अपने लिए नए जीवन की शुरुआत करने का हक़ है? या उसे अपने समाज की रूढ़िगत व्यवस्था के आगे आत्मसमर्पण कर देना चाहिए?कहानी पैरों में ज़ंजीर लपेटते हुए इन्हीं मूल्यों और विवशताओं पर सोचने को विवश करती है।जैसा आंचलिक वातावरण और आमद-रफ़त गावों में देखने को मिलता है, उसका स्वाभाविक विस्तार कहानी में बखूबी हुआ है। पात्रों के बीच वार्तालाप में स्थानीय राजस्थानी भाषा के शब्दों का प्रयोग कहानी की प्रमाणिकता बढ़ाते हैं।
संग्रह की कुछ दूसरी कहानियों का ज़िक्र भी प्रासंगिक होगा। ‘महानायक’ कहानी समय और परिस्थितियों के अंतरजाल में फंसे एक ऐसे युवक की कहानी है, जो अपने हालातों को तब भी हमेशा ‘पॉज़िटिव’ अंदाज़ में लेता है। वह हर बार अपने आपको किसी युवती या महिला के साथ शारीरिक संबंधों के पाश में जकड़ा हुआ पाता है, पर अपने आप और परिस्थितियों पर उसका अपना मनोवैज्ञानिक विश्लेषण उसे किसी भी सीमा में बांध नहीं पाता। वह उन महिलाओं की शारीरिक आवश्यकताओं को समझते हुए स्थिति को ‘रैशनलाइज़’ कर लेता है। अंत में अपनी उसी ‘पॉज़िटिविटी’ की रौ में वह अपने लिए एक नए ‘वोकेशन’ का विचार भी करता है, जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था के लिए नितांत नया और चौंकाने वाला है – ‘एकल महिलाओं के लिए एस्कॉर्ट सर्विस’।
अन्य कहानियों में मोटे रूप से ‘नियति’, ‘बाप’, ‘घर-बेघर’ और ‘अलविदा जैरी’ मार्मिक कहानियां हैं, जो स्नेह, अपनत्व में गुंथी या उनसे आहत होने का खूबसूरत बयान हैं; छोटी कहानियां ‘कब्र’, ‘भगवत्प्राप्ति’, ‘सत्यनिष्ठ मंत्री’, और ‘कर्णधार’ व्यंग्यात्मक कहानियां हैं; और ‘लच्छो भुआ’ और ‘कंदील का पेड़’भावनात्मक कथाएं हैं, जो विवशता और ममत्व के जाल से बुनी हुई हैं।
कमलानाथ के पूर्व प्रकाशित व्यंग्य संग्रह की शब्दावली से इस संग्रह की कहानियों की उनकी शैली काफ़ी कुछ अलग है, हालाँकि उनकी विशिष्ट साहित्यिक अभिरुचि की झलक इस संग्रह में भी दिखाई देती है।इस संग्रह की विशेषता है कि हरेक कहानी एक अलग कोण, मनोभाव, दृष्टि, सम्वेदना या घटना के अपने संसार का निर्माण करती है और पाठक को नया सोच-सन्दर्भ देती है। उम्मीद है कि ये कहानियां भी पाठक को वैसे ही बाँध पाएंगी जैसी इंटरनेट पर की-वर्ड ‘कमलानाथ’ से ‘गूगल सर्च’ से खोजी जा सकने वाली उनकी अन्य रचनाएं, जो कई ई-पत्रिकाओं और संकलनों में अलग अलग जगह भी पढ़ी जा सकती हैं।
‘भौंर्या मो’ (कहानी संग्रह)
लेखक: कमलानाथ
ISBN :978-93-85818-09-7
प्रकाशक: ऑनलाइन गाथा - द अनएन्डिंग टेल, लखनऊ
पृष्ठ: 236, मूल्य : रु.200(पेपर बैक), रु.99 (ई-बुक)

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डॉ. पूर्णेन्दु वसिष्ठ
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