"प्रकृति की गोद में''--- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित

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"प्रकृति की गोद में''--- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित

Post by admin » Sun Jan 08, 2017 5:52 am

"प्रकृति की गोद में" प्रकृति बोध से सम्पन्न, संवेदना के उच्च धरातल पर रचित प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी का हाइकु संग्रह ।
समीक्षिका : --- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित
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हिन्दी काव्य - परम्परा में हाइकु कविता सर्वाधिक चर्चित लघु कविता है । गहन अनुभूति की सरल-सहज और संक्षिप्त हाइकु कविता लय, ध्वनि लक्षार्थ, बिम्ब, विशिष्ट प्रयोजन से अधिक प्रभावपूर्ण हो जाती है ।अभिव्यक्ति - सौन्दर्य की दृष्टि से प्रदीप जी की हाइकु कविताएँअपने लक्षार्थ में अत्यंत जीवंत और सम्प्रेषणीय हैं । "प्रकृति की गोद में" प्रकृतिपरक हाइकु का महत्वपूर्ण संकलन है ।अधिकांश संकलित हाइकु बिम्बों के नूतन प्रयोगों के कारण अधिक प्रभावी हो गये हैं । विवरण अथवा वर्णन की अपेक्षा इनमें प्रकृति का चित्रण लाक्षणिक और संश्लिष्टात्मक अधिक है ।
प्रदीप जी के अनेक हाइकु जीवंतता का संदेश देते हैं । रात का अंधकार चाहे जितना गहरा हो, एक नन्हाँ दीपक अपने उजाले से उसकी औकात बता देता है ।नदी अपनी संघर्षरत लहरों के साथ भी गुनगुना उठती है और जीने की सीख देती है ।यहाँ व्यंजना का सुंदर निर्वाह हुआ है । लहरें पीड़ा की प्रतीक हैं । नदी कल - कल ध्वनि से जीवन के गीत गाती है और अपनी गतिमयता से आगे बढ़ने का हौसला देती है । 'दिया' और 'नदी' ऐसे प्रतीक हैं जो अपने अस्तित्व और प्रवाह से मनुष्य को जिजीविषा का संकेत देते हैं।
विकट रात/एक दिया बताये/उसे औकात ।
संघर्ष गीत/नदी गुनगुनाती/जीना सिखाती ।
कठिन जीवन के लम्बे सफर को बड़ी सावधानी से तय करना होता है । चाँद को छूना भले ही असंभव हो, परंतु कोशिश जरुरी है ।
लम्बा सफर/टूटती जिन्दगानी/सँभल चल ।
शायद छू लें/आओ कोशिश करें/चाँद छूने की ।
कविता में स्मृति, कल्पना आदि का भी महत्व होता है । अनेक हाइकु स्मृतियों के मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं, तो अनेक हाइकु कल्पना के द्वारा बिम्बों को सजीव कर देते हैं । कहीं - कहीं उच्च कोटि का दर्शन भी व्यक्त हुआ है ।
गहन वन/स्वयं को ढूंढ रहा/अस्थिर मन ।
भारतीय काव्य साहित्य में, मानवीय परिप्रेक्ष में प्रकृति चित्रण की सुदीर्घ परम्परा रही है । प्रकृति चित्रण में ऋतु-संकेत का सुनियोजन जापानी हाइकु में भी प्रमुखता से हुआ है । प्रदीप जी के प्रकृतिपरक हाइकु में पर्याप्त ऋतु-संकेत हैं । सूर्य, धूप, चाँदनी, झरने, नदी, पक्षी, फूल-पत्तियाँ, लता, वृक्ष, कोंपलें, चाँद, तारे आदि के मानवोचित् क्रिया व्यापारों की कलात्मक प्रस्तुति इनके अनेक हाइकु में दृष्टिगत हो रही है ।
उलीच रही/आँसुओं को आँखों से/धूप अकेली ।
फैलाये डैने/पहाड़ की कोख से/फूटे झरने ।
शिशिर रात/खाँसता रहा चाँद/तारे उदास ।
जानते दुःख/झरे हुए पत्ते ही/पतझर का ।
सीमाएँ टूटीं/नयी पत्तियाँ अब/इठला फूटीं ।
इसप्रकार हाइकुकार ने प्रकृति के अनेक पदार्थों को नये-नये प्रतीकों से, बिम्बों से, उपमानों से सज्जित किया है । धरती को लालिमा बाँटता सूर्य, परियों को थपकियाँ देती चाँद की धूलि, आँखों से आँसुओं को उलीचने वाली एकाकी धूप, प्रभात को बुलाने के लिए स्वागत-गीत गाता हुआ सूरज, सुबह से पहले ही धूप बीनने वाला पर्वत, वृक्षों के कक्षों से इठला कर फूटने वाली नयी कोंपलें, पहाड़ की कोख से फूटते हुए झरने, सूखे हुए तालाब, धरती के तृषित प्राण, माँ की गोद में अग-जग भूलने वाला सूर्य-शिशु, टूटी हुई शाखों पर बसेरा ढूंढती चिड़ियाँ, लोकगीत की लय चुराने वाला पवन, विदा के गीत गुनगुनाते टूटते पत्ते, बादलों के छा जाने पर रूठे चाँद-सूरज को मनाती हुई हवा, मुट्ठी में धूप लिये सबको सुखी करने वाला सूर्य, परिमल बाँटने वाला मलय आदि-आदि मानव की समान्तरता में ही अपने अस्तित्व का प्रकटन करते हैं ।
अन्त में, आशा, विश्वास और नैरन्तर्य को संकेतित करता हाइकुकार का एक उत्कृष्ट हाइकु दृष्टव्य है --
नयी कोंपलें
लगी है निकलने
जगी उम्मीदें ।
प्रकृति-बोध से सम्पन्न, संवेदना के उच्च धरातल पर रचित 'प्रकृति की गोद में' संग्रह के हाइकु अपने कथ्य एवं शिल्प में विशिष्ट हैं, जिनका हिन्दी काव्य साहित्य में, निश्चित ही, महत्वपूर्ण स्थान रहेगा । ऐसी प्रस्तुति के लिए श्री प्रदीप कुमार दाश "दीपक" बधाई के पात्र हैं । अनेकानेक मंगलकामनाओं के साथ ।
--- डाॅ. मिथिलेश दीक्षित
जी - 91, सी, संजय गाधी पुरम
लखनऊ -226016 (उ.प्र.)
मो. 9412549904
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