हास्य-व्यंग नाटिका ‘चलें पोरबन्दर’---रामदेव लाल ‘विभोर’

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हास्य-व्यंग नाटिका ‘चलें पोरबन्दर’---रामदेव लाल ‘विभोर’

Post by admin » Sat Jun 03, 2017 7:09 am

हास्य-व्यंग नाटिका ‘चलें पोरबन्दर’ के प्रति दो शब्द

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गद्य, कविता, कहानी, लेख, नाटक, नौटंकी विधाओं पर साहित्य-लेखन करने वाले साहित्यकार प्रदीप कुमार सिंह कुशवाह विरचित हास्य-व्यंग नाटिका ‘चलें पोरबन्दर’ नयनेन्द्रियों का विषय बनने वाले काव्य-रूप अर्थात् दृष्य-काव्य के अन्तर्गत है। इसकी कथा-वस्तु नट-नटी के आपस के संवादों के माध्यम से व्यक्त है। इसका कार्य व्यापार मूर्त एवं चाक्षुश है। इसका मंचीय विधान एक से अधिक अंकों में विभक्त है। इसकी संवाद योजना में वस्तु-विधान का अंग उत्पाद्य है अर्थात् जो वस्तु कवि-मस्तिष्क की उपज (कल्पना) होती है जिसमें जीवन-बिम्बों का समावेश होता है उसे उत्पाद्य वस्तु कहते हैं।
इस नाटिका में नेता या नायक के रूप में मुख्य पात्र नट (नायक) व नटी (नायिका) ही हैं। कतिपय स्थलों पर कुछ सहयोगी पात्र भी नट-नटी के संवादों में आ टपकते हैं जो व्यंग के तेवर में अभिवृद्धि करते हैं। संवादों में मुहावरे, चटपटी भाषा व तीक्ष्ण तेवर प्रभाविकता रोचकता उत्पन्न करने में कमाल का काम करते हैं। नाटिका में आद्योपान्त अधिकांशतः वाचिक अभिनय ही है। वाचिक अभिनय के अन्तर्गत वाणी द्वारा उच्चरित ध्वनि-संवाद आदि आता है। प्रसंगानुकूल निहित भावों पर आधारित पात्रों का बोलना, बोली में उतार-चढ़ाव लाना, थिरकन, कंपन, गायन आदि ध्वनियों का समुचित प्रयोग वाचिक अभिनय कहलाता है। नाटिका में मंचन के माध्यम से ऐसा कर पाने में नट-नटी प्रायः सक्षम दिखते हैं।
नाटिका का रचयिता ईश-भक्त व देश भक्त है। फलतः उसने प्रथमतः ईश्वर, राष्ट्र व भारत माता को कृति का समर्पण किया है। उसने मुक्त छन्दों के माध्यम से गणेश-वन्दना, ईश वन्दना व पत्रकार होने के नाते प्रेस-वन्दना भी सरस-सरल खड़ी बोली में प्रस्तुत किया है। कृतिकार आम पन्थ का पक्षधर है। धर्मनिरपेक्षता का भी पक्षधर होने के कारण वह सहयोगी पात्र के रूप में राम, रहीम, गोविन्द व जॉन नाम के चार बालकों को नाटिका में प्रस्तुत करता है। मानवता में व्याप्त विविध अवगुणों को केन्द्र में रखकर तमाम ज्वलन्त प्रकरणों पर व्यंग भरे स्वर नाटिका की कथा वस्तु है। असहिष्णुता, पुरस्कार, महंगाई, महिला आरक्षण, साम्प्रादयिकता, अहिंसा, दुराचरण पर तीखे संवाद, कटाक्ष व व्यंग नाटिका का कलेवर है। नाटिका की सरल व चटपटी भाषा में प्रभावोत्पादकता है। सामाजिक विघटन को नाटिका में प्रभावी ढंग से उकेरा गया है। कृतिकार ने अन्यार्थ (व्यंगार्थ) के माध्यम से देश व समाज के सुधार हेतु बहुत कुछ कहा है जिसके लिए वह बधाई का पात्र है।
रामदेव लाल ‘विभोर’
565 क/141, अमरूदही बाग, आलमबाग
लखनऊ- 226005
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