रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश"---समीक्षिका किरण मिश्रा

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रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश"---समीक्षिका किरण मिश्रा

Post by admin » Thu Dec 07, 2017 6:27 am

विश्व का प्रथम रेंगा संग्रह "कस्तूरी की तलाश" श्रृंखलित पद्य संग्रह
समीक्षिका - किरण मिश्रा
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हाइकु हिन्दी साहित्य जगत के देदीप्यमान रत्नदीप "आदरणीय प्रदीप कुमार दाश "दीपक" जी के कुशल संपादन एवं अद्भुत संयोजन से , 66 हाइकु लेखकों को एक साथ लेकर अपने कुशल नेतृत्व में उनकी रचनाओं के समन्वित मेल से सजी "कस्तूरी की तलाश" विश्व काव्य जगत में प्रथम श्रृंखलित पद्य रेगा संग्रह का संकलन है ।

आकर्षक आवरण पृष्ठ और उत्कृष्ट हाइकु और तांका के मेल से सुसज्जित और 66 हाइकुकारों के सुन्दर भावों से सुशोभित 100 रेंगा कविताओं का अद्भुत समन्वय और संकलन की मेल है ।
आदरणीय प्रदीप जी के इस प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है! जिन्होने विभिन्न प्रान्त के हिन्दी हाइकुकारों को एक साथ एक मंच पर लाकर न केवल उनकी रचनात्मकता को निखारा है अपितु हिन्दी हाइकु मंच पर उनकी रचनाओं को प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है!

मित्रों रेंगा हाइकु और तांका का समन्वित रूप यानी 5/7/5/7/7 के वर्ण क्रम में आगे बढाते हुए तांका के स्वरूप में विषय और भाव की अनुरूपता के साथ सम्पन्न करते हैं इसमें असीमित तांका हो सकते हैं !
यूँ तो "कस्तूरी की तलाश" में हर रेंगा बेहद खूबसूरत और भावमयी है जो आपको इसे पढ़नें की यात्रा में विश्राम नहीं लेने देते... पर कुछ रेंगा बेहद खूबसूरत बन पढ़े हैं जिनमें लेखक गण ऐसे रम जाते हैं कि उस कविता का अन्त ही नहीं आता... बस वह मीठी नदी की भाँति अपने लय और ताल से ताल मिलाती कलकल करती आगे बढ़ती रहती है तो कहीं झरने के शोर सी बरबस आनन्द पान कराती पूर्ण तृप्ति की अहसास देती है, कहीं जीवन धुन गुनगुनाती है, तो कहीं माँ की ममता उड़ेलती, कहीं जीवन राग सुनाती,सत्य के धरातल का अहसास कराती,जीवन के हर उतार चढ़ाव ,सुख दुःख की सुन्दर परिभाषा और उनके मर्म को समझाती , प्रकृति की गोद में मचलती अपने मनोहारी दृश्यों से मन मोहती ,प्रेम और नफरत जैसे रिश्तों पर सुंदर संदेश देती!

कस्तूरी की तलाश में निकले 66 रचनाकारों की भावनाओं को काव्य गलियों के विभिन्न मार्गों से भ्रमण कराती अपनी सुगंध से सुवासित करती अदुभुत,अनुपम और अलौकिक कस्तूरी की तलाश के रूप में प्रस्तुति उनके भावों के तलाश को एक नया आयाम दे मन को प्रफुल्लित एवं प्रसन्नचित कर लेखनी को विराम देती है...!

कस्तूरी की तलाश में कुछ रेंगा में प्रयुक्त हायकु और तांका बहुत ही मन भावन और मनोहारी हैं

कस्तूरी की तलाश शुरू होती है #प्रदीप कुमार दाश जी के हाइकु कि निम्न पंक्तियों से...रेंगा क्र. 01

जीवन रेखा
रेत रेत हो गयी
नदी की व्यथा * प्रदीप कुमार दाश'दीपक'
नारी सम थी कथा
सदियों की व्यवस्था *चंचला इंचुलकर सोनी

और तलाश खत्म होती है ...रेंगा क्र. 100 : किरण मिश्रा की निम्न पंक्तियों पर....जाकर

दुर्गम पथ
बढ़ते ही जायेंगे
जीवन रथ *देवेन्द्र नारायण दास
मन डोर पकड़
आगे बढ़ता ही चल *किरण मिश्रा

दोस्तों यूँ तो कस्तूरी की तलाश के हर रेंगा अनमोल रत्न है पर यहाँ पर मैं कुछ प्रमुख रेंगा की पंक्तियों को उल्लेख कर रही हूँ जो कस्तूरी की तलाश के अनुशीलन की यात्रा में मुझे बेहद आकर्षित की...

रेंगा क्र.66

उपमानों से
रूठते उपमेय
मनाऊँ कैसे? * प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
शब्दों के गजरे में
प्रीत सजाऊँ कैसे? *किरण मिश्रा
भावों का प्याला
गूथ रही चाँदनी
शब्दों की माला * किरण मिश्रा
जग की नीरसता
गले लगाऊँ कैसे?*अलका त्रिपाठी "विजय"

यूँ तो कस्तूरी की तलाश में गढे़ गये हर तांका बेहद खूबसूरत है पर कुछ तो इतने चित्ताकर्षक हैं जिनका उल्लेख किये बिना मेरा लेखन अधूरा है....

रेंगा क्र. 69

काँच सा मन
ह.. ह.. तोड़ ही दिया
धूप दर्पण * प्रदीप कुमार दाश "दीपक"
कोमल था हृदय
विदीर्ण हुआ मन * गंगा पांडेय भावुक
बेहद खूबसूरत रेंगा

रेंगा क्र. 70

मृग की आस
कस्तूरी की तलाश
कुण्डलि वास *प्रदीप कुमार दाश 'दीपक'
वन वन भटके
व्यर्थ करे प्रयास *मधु सिंघी
भ्रमित मन
ढूँढता मरूजल
जाने ना मर्म *किरण मिश्रा
घट घट में राम
कर भक्ति निष्काम *दाता राम पुनिया

कुछ रेंगा प्रकृति का अनुपम संदेश दे रहे हैं...जैसे

रेंगा क्र. 71 में तांका की निम्न पंक्तियाँ..

धरा के अंग
करेंगे देहदान
झरते पत्ते *सुधा राठौर
नैसर्गिक विधान
परिवर्तन प्राण * डाॅ. अखिलेश गौतम

रेंगा क्र. 72
अद्भुत, अनुपम, बेमिसाल, लाजवाब कलकल मीठी नदी के प्रवाह सा बढ़ता ही जा रहा है ,50 तांका का समिश्रण से 9 पन्नों पर अपनी अद्भुत छठा बिखेरना सुन्दर भावों से सजा मन मोह लेता है...

सर्दीली रात
गीत गा रहा चाँद
कोमल याद * प्रदीप कुमार दाश दीपक
रस की बरसात
ठिठुर रहे गात *डाॅ. अखिलेश गौतम

आओ ना पास
घोल दो साँसों में
रसीली बात * किरण मिश्रा
श.... श..... चाँद करता
कुछ राज की बात * डाॅ. अखिलेश गौतम

रेंगा क्र. 76 प्रकृति का सुन्दर मानवीकरण

लोरी के बीज
नींद वृक्ष उगाने
बोती मातायें * प्रदीप कुमार दाश 'दीपक'
मधुर स्वप्न पले
ममता दीप जले * किरण मिश्रा
स्नेह के छाँव
मीठी नींद के गाँव
आँचल तले * किरण मिश्रा
मखमली स्पर्श
उग जाता है दर्द *डाॅ. अखिलेश वर्मा

रेंगा क्र. 84 शब्दों की रिमझिम बारिश से तन मन भिगोता...

प्यासी है धरा
ओ मतवाले मेघा
आ बरस जा *सुधा राठौर
घुमड़ के घिर आ
भिगो मन की धरा *शुचिता राठी

रेंगा क्र.96 प्रेम की मधुर स्मृति संजोता तांका

नेह की डोरी
बँधी कथा स्मृतियाँ
बाँचते पत्ते *किरण मिश्रा
सबको देता छाँव
पूजता सारा गाँव *मधु सिंघी

प्रकृति के सुन्दर बिम्बों से सुसज्जित, भावनाओं से भरी जीवन मूल्यों का अनमोल खजाना ,पूर्ण लय ताल और भावों से भरी रेंगा कवितायें,मन के तारों को झंकृत करती भाव के प्यासे 66 रचनाकारों के तलाश तो पूर्ण करती ही है मित्रों आप सभी से भी मेरा आग्रह कि "कस्तूरी की तलाश " को एक बार आप अवश्य ही पढें । मुझे विश्वास है कि संग्रह आपको काव्य जगत के एक अलग दुनिया का अनुभव कराने में निश्चय ही सक्षम साबित होगा । आप काव्य रसिक अगर काव्य में भाव और प्रकृति बिम्बों का आनंद लेना चाहते हों तो आपसे मेरा पुनः निवेदन है कि "कस्तूरी की तलाश" रेंगा संग्रह को एक बार अवश्य पढें ।

□ किरण मिश्रा
टावर-ए-9, फ्लैट नम्बर-1506
जे.पी. क्लासिक विशटाउन
सेक्टर -134 नोयडा, उत्तर प्रदेश
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