एक गाँव मेरे भीतर मिटने लगता है(ब्रजेश क़ानूनग़ोजी)---दीपक गिरकर (समी०)

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एक गाँव मेरे भीतर मिटने लगता है(ब्रजेश क़ानूनग़ोजी)---दीपक गिरकर (समी०)

Post by admin » Fri Feb 23, 2018 10:42 am

एक गाँव मेरे भीतर मिटने लगता है----ब्रजेश क़ानूनग़ोजी
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श्री ब्रजेश क़ानूनग़ोजी ने अपने कविता संग्रह `कोहरे में सुबह` में अपने जीवन के कई अनुभवों को समेटने की कोशिश की हैं. ब्रजेशजी ज़मीन से जुड़े हुए एक वरिष्ठ कवि हैं. `धूल और धुएं के परदे में` (1999), `इस गणराज्य में` (2014), `चिड़िया का सितार` (2017) के बाद `कोहरे में सुबह` श्री ब्रजेश क़ानूनग़ोजी की कविता यात्रा का चौथा पड़ाव हैं. `कोहरे में सुबह` एक ऐसा कविता संग्रह है जो कई मुद्दों और विषयों पर प्रकाश डालता हैं. इस संग्रह में कुल 70 कविताएं हैं. इन कविताओं में ब्रजेशजी की बैचेनी और व्यथा महसूस की जा सकती हैं. आजकल रिश्ते जीवंतता खोते जा रहे है. `इंतजार करती माँ`, `घर की छत पर बिस्तर`, `क्षमा करें` इत्यादि भावपूर्ण कविताएं रिश्तों की अहमियत पर प्रकाश डालती हैं. `उसका आना` कविता की पंक्तियाँ `हरे चने के पुलाव और मैथी की महक से, दब गई सूनेपन की उदास गंध` बेटी के घर आने पर उनके द्वारा लिखी गई कविता बेटी के प्रति एक पिता के लगाव को महसूस कराती हैं.
`एक टुकड़ा गाँव` कविता की पंक्तियाँ `पढ़ता हूं अख़बार में जब विकास की कोई नई घोषणा एक गाँव मेरे भीतर मिटने लगता है.` एवं `छुट्टी मनाते गाँव के बच्चे` नामक कविता पाठकों को अंदर तक झकझोर देती हैं. ग्रामीण परिवेश इन कविताओं में बोलता-बतियाता सुना जा सकता हैं. महानगरों में आजकल चारो ओर सीमेंट के जंगल ही जंगल दिखाई देते है और बिल्डरों द्वारा जो विशाल अट्टालिकाएं बनाई जा रही है उनमें जो मजदूर काम कर रहे है वे गाँवों से ही इन महानगरों में आए है. इन मजदूरों ने खाली पड़े हुए ज़मीन के टुकड़ों पर छोटी-छोटी टापरी बना ली है और अपने परिवार के साथ मस्ती में जीवन व्यतीत कर रहे हैं. यह देखकर कवि को अपने गाँव की और अपने बचपन की बातें याद आ जाती हैं. इस कविता संग्रह की कुछ कविताएं कवि के गाँव के साथ लगाव को उजागर करती हैं. क़ानूनग़ोजी ने इन कविताओं के माध्यम से सही प्रश्न उठाया है कि जिसे हम आज विकास का नाम दे रहे है क्या इससे गाँवों में आर्थिक समृद्धि होगी. आज विकास के नाम पर आपसी रिश्तों के बीच खोखले विकास की दीवार खड़ी हो गई हैं.
इस संग्रह में प्रकृति, प्रेम, गाँव और ग्रामीण जीवन की स्थितियों को अभिव्यक्त करती कविताएं हैं. आभासी दुनिया में, तुम लिखो कवि, चीख आदि कविताओं में ब्रजेशजी कला और साहित्य के प्रति व्यथित दिखते हैं. धर्म के नाम पर हिदुस्तान में इंसानों के बीच जो नफ़रत की दीवार खड़ी की जा रही है उस पर भी ब्रजेश जी चिंतित दिखते हैं. संग्रह की कुछ कविताओं `चीख` एवं `गारमेंट शो रूम में` व्यंग भी है क्योंकि कवि एक व्यंगकार भी हैं. कवि के तीन व्यंग संग्रह भी प्रकाशित हो चुके हैं. `डायरी`, `देहरी की ठोकर` और `चकमक` कविताओं में कवि के मन के भीतर चल रही उठा पटक महसूस की जा सकती हैं. ब्रजेशजी की लेखनी का कमाल है कि उनकी रचनाओं में वस्तु, दृश्य, संदेश, शालीनता और मर्यादा सभी मौजूद है एवं उनके कहने का अंदाज भी निराला है क्योंकि वे एक व्यंगकार भी हैं. यह काव्य संग्रह भारतीय कविता के परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल हुआ हैं. 120 पृष्ठ का यह कविता संग्रह आपको कई विषयों पर सोचने के लिए मजबूर कर देता हैं. ब्रजेशजी की कविताएं मानवीय संवेदनाओं से भरी हुई हैं. कविता संग्रह `कोहरे में सुबह` लिखने के लिए ब्रजेश क़ानूनगोजी और इसे प्रकाशित करने के लिए बोधि प्रकाशन बधाई के पात्र हैं.
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दीपक गिरकर
समीक्षक
28-सी, वैभव नगर, कनाडिया रोड,
इंदौर- 452016
मोबाइल : 9425067036
मेल आईडी : deepakgirkar2016@gmail.com
दिनांक : 22.02.2018

पुस्तक : कोहरे में सुबह
लेखक : ब्रजेश क़ानूनगो
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, सी-46, सुदर्शनपुरा, इंडस्ट्रियल एरिया एक्सटेंशन, नाला रोड, 22 गोदाम, जयपुर-302006
मूल्य : 120 रूपए
पेज : 120
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