``तांका की महक”( प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’) ---सुशील शर्मा

Post Reply
User avatar
admin
Site Admin
Posts: 21569
Joined: Wed Nov 16, 2011 9:23 am
Contact:

``तांका की महक”( प्रदीप कुमार दाश ‘दीपक’) ---सुशील शर्मा

Post by admin » Mon Jun 18, 2018 4:10 pm

Sushil Sharma

Attachments11:40 AM (4 hours ago)

to me
ताँका की महक -सुगंध बिखेरती कवितायेँ
(पुस्तक समीक्षा )
सुशील शर्मा
जापानी साहित्य से हमारे परिचय का इतिहास लगभग ६५-६६ वर्ष पुराना है। महाकवि टैगोर सन् १९१६ में जापान गये और वहाँ के अनुभवों पर उन्होंनें ’जापान-यात्रा‘ शीर्षक से पुस्तक लिखी, जो १९१९ में प्रकाशित हुई। टैगोर ने पुनः १९२४ तथा १९२९ में जापान की यात्राएँ की और वहाँ के जन-जीवन एवं साहित्य को निकटता से देखने की चेष्टा की। जापान में पहले वाका ही लिखा जाता था | वाका का अर्थ ही जापानी कविता या गीत है | ‘वा’, अर्थात जापानी; ‘का’, अर्थात गीत | जापानी तांका इकतीस अक्षर वाली कविता है, जिसे परंपरागत रूप से एक ही अखंड रेखा में लिखा जाता है। वाका, जापानी गीत या कविता का एक रूप है इसे "लघु गीत" के रूप में भी जाना जाता है।तांका कविता सबसे पुराने जापानी गीतों के रूपों में से एक है। तांका की उत्पत्ति सातवीं शताब्दी में हुई थी, और न केवल यह जापानी शाही अदालत में पसंदीदा कविता रूप बन गई, बल्कि जापान के उच्च घराने भी तांका प्रतियोगिताओं में भाग लेते थे , तांका महिलाओं और पुरुषों के प्रेम प्रसंग में भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए एवं अंतरंग संचार के लिए आदर्श गीत बन गया था ; प्रेमियों अक्सर कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए इसका प्रयोग करते थे।तांका निर्बाध कविता है और इसमें पांच, सात, पांच, सात, और सात अक्षरों की इकाइयां हैं, जिन्हें परंपरागत रूप से एक अखंड रेखा के रूप में लिखा जाता था।

जीवन और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, यही दोनों की इयत्ता भी है और इसीलिये ये दोनों जिस तत्व से सम्पूर्णता पाते हैं वह तत्व है- प्रेम-राग। सृजन के तुलसी क्षणों में अपनी ऋचा-दृष्टि के साथ शब्दों को अपनी छंदबद्ध कविताओं में उनकी स्वाभाविक लय के साथ इस करीने से रखा है कि वे अनहतनाद का सात्विक मंजुघोष बन गए हैँ । कवि की भावुकता ही वह वस्तु है जो उसकी कविता को आकार देती है; क्योंकि सौंदर्य न केवल वस्तु में होता है, बल्कि भावक की दृष्टि में भी होता है। कविवर बिहारी भी यही कहते हैं "समै-समै सुन्दर सबै रूप कुरूप न होय/मन की रूचि जैसी जितै, तित तेती रूचि होय।" ये तांका कविताएं सामाजिक अनुषंगों से आबद्ध वे शब्द-चित्र हैं जो कवियों ने धूप के पृष्ठों पर छांव की तूलिका से उकेरे हैं।
कल की यादें / रह रह सताती / फूल तितली / अलि कलि चुम्बन / संध्या गीत सुनाती (शिव डोयले),
रवि रश्मियां /धरा पर उतरीं /चित्र उकेरे /कहीं विरही धूप /कहीं मिलन छांव। (नरेंद्र श्रीवास्तव )
साहित्य शब्दों का अभयारण्य है, गौरतलब है कि गद्ध्यात्मक्ता की प्रतिष्ठापना ने यथातथ्यात्मकता को अधिक बढ़ावा दिया है परंतु आज की पीढ़ी मन के भावों को पद्य (गीत) रूप में अधिक प्राथमिकता दे रही है। पद्य साहित्य का भावतरल गतिआयाम है, परंतु आज काव्य शब्द साहित्य के पद्य पक्ष के लिये रूढ़ हो गया है। आज काव्य साहित्य शब्द का एक अंग मात्र बनकर रह गया है, इसे शब्द का अर्थापकर्ष कहा जाता है।पाठक के काव्य-माधुर्य को काव्य-प्रेमी हृदय अपनी स्मृति में सहज ही अंकित कर लेते हैं ।
इन तांका कविताओं में यह प्रेम सौंदर्य वाह्य तथा आन्तरिक दोनों स्तरों पर दृष्टिमान है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सौंदर्य का संतुलित समावेश कर सारभौमिक तत्व को उजागर करते हुए कवि संघर्ष और शान्ति (वार एन्ड पीस) जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों से जीवन में आए संत्रास को खत्म करना चाहता है; क्योंकि तभी कलरव (प्रकृति) रूपी मूल्यवान प्रेम तक पहुँचा जा सकता है।
अलसाई सी / सुबह सुहागन / उतर रही / अम्बर की छत से / पायल झनकाती || (आशा पाण्डेय ‘ओझा’)।
चिनार-वृक्ष / हिम्रंजित वन / धरा वृक्ष पे / घूमते बादलों की / मीठी सी है छुअन || (कुमुद रामानंद ‘बंसल)
नभ का नीर / धो रहा सावन को / हरता पीर / ये हरित आलोक / करे हिया अशोक || (कमल कपूर),
मैं मृण्मयी हूँ / नेह से गूँथ कर / तुमने रचा / अपना या पराया / अब क्या मेरा बचा || (डा.ज्योत्सना शर्मा)
सृजन की सार्थकता को केंद्र में रखकर एक नहीं अपितु कई- कई सार्थक अर्थ ढूंढ़ लेती है और मानो कहती है कि जीवन बासी नहीं होता, जब तक सांसें हैं, जब तक धड़कने चल रही हैं, तब तक जीवंतता है, तब तक जीवन अनमोल है, आलौकिक है, ओजस्वी है। मेरी स्वयं की 24 ताँका कवितायेँ इस अद्भुत संग्रह में प्रकशित हैं जिनमें से कुछ निम्न हैं
पिघला चाँद /चांदनी की सरिता /बहता रूप /अलसाई आँखों में /रुपहले सपने (सुशील शर्मा ),
सच की मंडी /खूंटों पर लटका /बिकता सच /सच के मुखोटों में /झूठ भरे चेहरे।
मासूम सच /मजहबी गिरोह /इन्तजार में /कुछ तेरे कातिल /कुछ मेरे कातिल (सुशील शर्मा )
कुछ तांका कविताओं को पढ़ने, पढ़कर समाप्त कर देने के बाद ऐसा लगता है कि उस कविता की दुबारा शुरुआत हो रही है, एक भाव है जो पुन : जागृत होना चाहता है, एक विचार है जो पनप रहा है, स्थायित्व की कसौटी पर खरा उतरने की चेष्ठा कर रहा है, अपना विम्ब बना रहा और इसी के मध्य में कहीं एक कविता जन्म ले रही है।
‪‎धूप सेंकती / सर्दी से ठिठुरती / दुपहरियां / आँगन में बैठी हों / ज्यों कुछ लड़कियां || (रेखा रोहतगी),
प्रेम सिंचित / कांटे भी देते पुष्प / नागफनी से / चुम्बक मीठी वाणी / अपना ले सभी को || (ज्योतिर्मयी पन्त) ,
बंद किताब / कभी खोलो तो देखो / पाओगे तुम / नेह भरे झरने / सूरज की किरणे (रा. का. “हिमांशु”)
कुनमुनाता /चल पड़ा अकेला /चाँद तनहा /झील की पगडण्डी /मुस्कुरा रही आज (प्रदीप कुमार दाश )
जीवन के अंतर्द्वंद्वों की कविताई करना इतना सरल भी नहीं है। उसके लिए कठिन तपश्यर्चा की आवश्यकता होती है। कवि यह सब जानता है। माध्यम से उन्होंने जिस बदलते परिवेश, बदलते आयाम, समीकरण और समाज की बात की है, उसे देखने, समझने, उस तक पहुंचने के लिए जो दृष्टिकोण चाहिए वह विरले लोगों में ही दिखाई देता है। सभ्यता, संस्कृति, परम्पराएं सदा से ही हमारे जीवन और समाज को जोड़ने की मजबूत कड़ी के रूप में परिलक्षित होती रही हैं। इतना वृद्ध /कि छोड़ गए मित्र /सारे के सारे /बरगद पुराना /देता रहा सांत्वना (डॉ सुरेंद्र वर्मा ),
बनी जो कड़ी / ज़िंदगी की ये लड़ी / खुशबू फैली / मन होता बावरा / खुशी जब मिलती || (डा. जेनी शबनम),
दर्द किताब / लिखी है ज़िंदगी ने / भूमिका हूँ मैं / आग की लकीर सी / हर इक दास्ताँ की || (हरकीरत ‘हीर’)
तांका कविता के माध्यम से कवियों ने बदलते मानव मूल्यों को उभारने, उन्हें सामने लाने की कोशिश करती है। हमारे समाज के ऐसे लोग जो सभ्य होने की आड़ में अपने आसपास इतने सारे आवरण बुन लिए हैं कि उनकी मोटी होती चमड़ियों के नीचे संवेदना और भावना का तत्व कहीं गहरे तूप से दब सा गया है।सम्पूर्ण मनोयोग से सम्पादित इस पुस्तक "तांका की महक " के लिये आदरणीय प्रदीप कुमार दाश "दीपक "का हार्दिक अभिनंदन और बधाई के पात्र हैं। इस तांका संग्रह में सभी कवियों ने एक खास अंतर्दृष्टि विकसित की है, जो अंदर के भी बहुत अंदर की बात खींच कर निकालती है। पूरे विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि तांका की महक की तांका कवितायेँ पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगी। संग्रह की तांका कवितायेँ पठनीय और शिल्प के लिहाज से मुकम्मल हैं।"तांका की महक" सिर्फ पठनीय ही नहीं है, संग्रहणीय भी हैं। !!!

पुस्तक -तांका की महक
संपादक -प्रदीप कुमार दाश "दीपक "
पकाशक -अयन प्रकाशन ,नई दिल्ली
मूल्य -500 रूपये
Image
Mail your articles to swargvibha@gmail.com or swargvibha@ymail.com

Post Reply