स्त्री विमर्ष - चुनौतियाँ ... डाँ० दीप्ति परमार

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स्त्री विमर्ष - चुनौतियाँ ... डाँ० दीप्ति परमार

Post by admin » Fri Jan 11, 2013 3:59 pm

स्त्री का आत्मसंघर्ष अपनी निरन्तरता में प्रत्येक युग में विद्यमान रहा है । जैविक भिन्नता स्त्री की स्थिति पुरुष से भिन्न रखने में सहायता करती है । परंपरागत द्दष्टि से स्त्री के प्रति व्यवस्था में उसकी स्थिति पुरुष के अधिनस्थ की भूमिका असमानता को जन्म देती है और शोषण एवं दोयम दर्जे के अवसर प्रचुर हो जाते है । बदलते समय की पृष्ठभूमि में बदलते सामाजिक संदर्भो में अपनी अधीनस्थ की भूमिका, शोषण, असमानता से मुक्ति के प्रयत्न एवं दोहरे मानदंड के बीच अपनी बदलती सामाजिक भूमिका के बावजूद स्त्री के प्रश्न नहीं बदले ।
स्त्री की अपनी प्राकृतिक विशेषताएँ हैं, परंतु दोहरे सामाजिक मानदंडो ने जो शर्मनाक स्थिति पैदा की है वे स्त्री को मात्र स्त्रीत्व के बंधन में बाँधते हैं । किसी सभ्य समाज के विकास की प्रक्रिया में स्त्री को अलग थलग ही नहीं बल्कि ‘हेय’ माने जाने के अनेक उदाहरण मिलते है । जैसे क्यूसीडायडीज की सम्मति थी कि ‘ जिस प्रकार किसी सभ्य स्त्री का शरीर उसके मकान के अन्दर बंद रहता है वैसे ही उसका नाम भी बंद रहना चाहिए ’ सुकरात यह मानते थे कि ‘ नारी सभी बुराइयों का मूल है, उसका प्यार पुरुषों की घृणा से अधिक भयावह है । ’ अरस्तु के अनुसार ‘ नारी की तुलना में पुरुष स्वभावतः श्रेष्ठ होता है , क्योंकि नारी इच्छा शक्ति में निर्बल, नैतिकता में शिथिल और विचार-विमर्ष में अपरिपक्व होती है ।
चाणक्य ने नारी के अवगुणों को इस प्रकार दर्शाया है - ‘ असत्यं साहसं माया मात्सर्य चाति लुब्धता ।
निर्गुणत्वम शोचत्वं स्त्रीणा दोष स्वभावजा ।। (धर्मपाल ‘ नारी एक विवेचन ’ पृष्ठ- 1)
अर्थात् असत्य, साहस, माया, भय, चपलता, अविवेक, अशोच, तथा लुब्धता नारी के स्वभाव जन्य दोश होते है । प्राचीन मान्यता के अनुसार नारी स्वभाव से ही अपवित्र होती है तथा पति सेवा से ही उसे सद्गति मिलती है । इस प्रकार की बात शिवपुराण में कही गयी है -
‘ क्लीवं च दुखस्थ च व्याधित वृद्धमेव च ।
सुखितं दुखितं चापि पतिमेकं न लंघयेत ।। (शिवपुराण, पार्वती खंड, अध्याय 54)
आचार्य शंकराचार्य ने नारी की निंदा करते हुए कहा है - ‘ द्वारं किमेक नरकस्य नारी ’ अर्थात नारी नरक का द्वार है । मनु स्मृति में उसे पुरुष रक्षित बनाकर रखा गया है-
‘ पिता रक्षति कौमारे भार्त रक्षति यौवने ।
रक्षन्ति स्थविरै पुत्रा न स्त्री स्वतन्भ्यमर्हति ।। (मनु स्मृति 9/3 पृष्ठ-479)
तुलसीदास की द्दष्टि में नारी अति अधम है - ‘ अधम से अधम अति नारी ।’ (तुलसीदास, ‘ रामचरित मानस ’ अरण्यकांड - 30 )

इससे यह स्पष्ट है कि नारी को पाश्चात्य एवं भारतीय सभ्यता में कभी सम्मानपूर्ण द्दष्टि से नहीं देखा गया । यहाँ तक कि उसे मनुष्य मानने में भी हिचकिचाहट है । जहाँ कहीं नारी को देवी के रूप में प्रस्तुत किया गया है वहाँ भी उसके लिए पुरुष की आधिनता एवं पतिव्रता धर्म की मान्यता स्थापित की गयी है । अर्थात् पुरुष की हो कर रहनेवाली नारी ही पूज्य है । इस प्रकार सारे विधि शास्त्र और व्यवस्था में स्त्री अपनी देह की ही ‘ अनधिकारिणी ’ होती है जैसे वह देह उसकी नहीं एक व्यवस्था की है, जिसका संचालन पुरुष प्रधान समाज के हाथों में है ।

सारे विमर्ष के केन्द्र में मुख्य चिन्ता यही है आखिर स्त्री के लिए समाज में हीन द्दष्टि क्यों है ? समाज में दोहरे मानदंड क्यों है ? क्या कोई रास्ता है जिस पर स्त्री अपनी संपूर्ण अस्मिता के साथ चल सके ।

नारीवादी लेखिका जेन मिल्स ने उन विशेषणों का संग्रह किया है जो पुरुषों द्वारा पुराने जमाने से स्त्रियों के लिए प्रयुक्त किये जा रहे है । जैसे- चोकलेट, चालु, हलुवा, कोल्ड, होट, फटाको, बैरी, नथवाली, और उच्चवर्गीय शब्द ‘ अखंड सौभाग्यवती प्रयुक्त किये जाते है । अंग्रेजी में स्त्री के लिए डम्ब, अेनीमल, बर्ड, बीच, फीली, बिल्सी, केट जैसे विशेषण प्रयुक्त किये जाते हैं । जेन का मानना है कि पुरुष के लिए नारी सिर्फ शयन कक्ष में भोगने की चीज है । जेन मिल्स का कहना है कि अनैतिक संबंध रखनेवाले पुरुष के लिए कोई विशेषण नहीं है, किन्तु स्त्री के लिए-डिस्ट्रोयर, डीसीवर, प्रेमिस्क्युअस, सेक्स सिम्बोल, स्नेचर आदि शब्द प्रयुक्त किये जाते है । अगर कोई पुरुष ऐसा करता है तो उसे कासानोवा या रोमियो की उपाधि से सम्मानित किया जाता है । ऐसे कई उदाहरण है जिसमें किसी देवता, राजा या बलशाली पुरुष ने अपनी इच्छा से स्त्री का वरण करके ख्याति प्राप्त की है । वाल्मिकी ‘ रामायण ’ का एक प्रसंग है जिसमें शुर्पणखा लक्ष्मण और राम के प्रति आकर्षित होती है । इसमें कोई अनहोनी नहीं थी क्योंकि युवा स्त्री का पुरुष में आकर्षण होना सहज बात थी । अगर कोई पुरुष दो स्त्रियों से प्रेम व्यक्त करता तो यह सहज बात हो सकती थी । किन्तु यह एक स्त्री थी अतः उसे अपमानित किया गया और भावी पीढ़ी में पुरुषों के प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए लक्ष्मण उसका नाक काट लेता है । आज भी समाज में यह उदाहरण बार-बार दिखाई सुनाई देते है कि स्त्री को प्रेम की सजा के रूप में अमानुषिक शारीरिक यातनाओं का भोग बनना पड़ रहा है ।

वर्तमान विज्ञापन के क्षेत्र में स्त्री की भूमिका औजार की है , पुरुष उपभोक्ता को ढेर करने के लिए स्त्री का उपयोग चारे की तरह किया जाता है । विज्ञापनों में भी सौन्दर्य के सम्बन्ध में स्त्री और पुरुष के लिए असमान मानदंड देखे जा सकते है । उदाहरण के लिए झीरो फिगर और श्वेत सौम्य स्कीन ही नारी की सुंदरता का मानदंड माना गया है और पुरुषों के मजबूत शरीर सौष्ठव पर जोर दिया जाता है । पुरुष को अपने आंतरिक अंग की लंबाई चैडाई का कोई प्रदर्शन नहीं करना पड़ता, जबकि स्त्री के लिए अपने उरोजो का प्रदर्शन करना अधिका्शतः अनिवार्य होता है । गंभीर चिंतन करने वाले सामायिक एवं अखबारों में भी यह देखा जाता है । ” स्त्री चूँ कि अपने रूप के मानकों की स्वामिनी नहीं रहने दी गयी है, इसलिए उसकी छवि के कोई भी फैसले उसके नहीं होते । स्त्री छवि मूलतः मर्दो की दुनिया द्वारा लगातार गढ़ी गई और लगातार बरती गई छवि है और यह धन्धा सदियों से जारी है । ” (सुधीश पचैरी ‘ स्त्री की बदलती छवि ’ हिन्दुस्तान 22 दिसम्बर 1999 )

पुरुष सेलिब्रिटी या राजकीय पुरुष के विषय में उसकी भूमिका, कार्य-शैली, निर्णय शक्ति जैसे मुद्दों पर ही अधिक चर्चा होगी , किन्तु ऐसी ही शक्तिशाली महिला के कपड़े, हेरस्टाइल और व्यक्तिगत जीवन की चर्चा ही अधिक सुनी जायेगी । हिलेरी क्लिन्टन, डिल्मा रुशेफ, इन्द्रा नूयी, सोनिया गांधी, मिशेल ओबामा जैसी पावरफूल स्त्रियाँ भी इसकी अपवाद नहीं है ।

जहाँ पुरुष अपनी प्रतिभा का उपयोग अपने लिए उच्चपद प्राप्ति के लिए करता है । अपनी अलग पहचान बनाने के लिए महत्त्वाकांक्षी एवं द्दढ़ निश्चयी होता है तो उसकी प्रशंसा होती है । वहीं ऐसी ही वृतिवाली स्त्री को आक्रमक और स्वकेन्दीय कह कर उसकी अवगणना की जाती है । जिस स्थान को पुरुष आसानी से प्राप्त कर लेता है , उसी स्थान को प्राप्त करने के लिए स्त्री को अनेक संघर्षो से गुजरना पड़ता है । स्त्री यदि असाधारण व्यवसायों के प्रति आकृष्ट हो (जो परंपरागत रूप से पुरुष व्यवसाय के क्षेत्र रहे है ।) तो उसका संघर्ष बढ़ जाता है । अति महत्त्वाकांक्षा के संदर्भ में जनमानस कभी भी स्त्री के पक्ष में वक्तव्य नहीं देता । नैना साहनी, जेसिका लाल, षिवानी भटनागर की हत्या को न्याय संगत घोषित किया जाता रहा है, स्त्री की महत्त्वाकांक्षा के अपराध में ।

अपने व्यवसाय एवं अन्य पदों पर आसीन महिलाओं को अब सिर्फ पारिवारिक ही नहीं, किन्तु प्रोफेशन के सम्बन्धों को भी निभाना पड़ता है । सह कर्मचारी के अच्छे बुरे प्रसंगो में उनके साथ रहने से सम्बन्धों की अर्थवता बढ़ती है । कुछ व्यवसाय ऐसे होते है जिसमें टीम वर्क बहुत जरुरी होता है, जिसमें टीम के सदस्यों के बीच घनिष्ठता बढ़ती है । पुरुषों के ऐसे सम्बन्धों को जिस सहजता से लिया जाता है उसी सहजता से स्त्री के सम्बन्धों को नहीं लिया जाता । पुरुष स्वयं ऐसे सम्बन्ध रखता है, फिर भी वह अपनी पत्नी, बहन या पुत्री के ऐसे सम्बन्धों को अस्वीकार करता है । स्त्री के लिए प्रोफेशनल रिलेस्शन्स निभाने मुश्किल होते है । यह बात कभी-कभी स्त्री की पद -प्रतिष्ठा एवं उन्नति में हानिकारक सिद्ध होती है ।

वर्तमान समय में अर्थोपार्जन में भी स्त्री को जोड़ दिया गया है । पुरुष को सिर्फ अपनी आँफिस या अपने व्यवसाय का काम ही देखना पड़ता है, जबकि स्त्री को घर, आँफिस और बच्चें तीनों की जिम्मेदारी अपने कंधे पर उठानी पड़ती है । महानगरों के ट्राफिक में फँस जाना आँफिस के कामों में देर हो जाना पुरुष के लिए सहज है किन्तु अगर स्त्री के साथ यही परिस्थिति उपस्थित हो तो उसे तानों और शंकाओं का सामना करना पड़ता है । कभी-कभी तो स्त्री के मोबाइल, पर्स जैसी व्यक्तिगत चीजों को जाँच कर पुरुष अपनी बोसगीरी का प्रदर्शन भी करता है । वैसे अधिकांश पुरुष स्त्री को अपनी संपत्ति मानते है, फिर उसकी व्यक्तिगत जीवन शैली और चीजों पर स्त्री का अधिकार कैसे ? हाँ, अगर स्त्री पुरुष पर ‘ बोसगीरी ’ करे तो वह उसे अपमान मानकर हंगामा खड़ा कर देता है ।

टी०वी ० सीरियल और शोपिंग में अपना समय बितानेवाली महिला की हमेशा हाँसी उडायी जाती है, तो दूसरी तरफ क्रिक्रेट, टेनिश, फूटबोल मेच देखने के लिए टी ०वी ० के सामने चीपके और शेयर बाजार में आकंठ पुरुषों को कोई कुछ नहीं कहता । क्या किसी एक का पूर्वाग्रह दूसरे से अच्छा या बुरा, अधिक बौद्धिक या मूर्खतापूर्ण है ? कौन कहेगा ?

राजगद्दी पर अपने पुत्र को बैठाने की इच्छा रखनेवाले धृतराष्ट्र की या अन्य राजाओं की कितनी टिका हुई है ? तो फिर कैकेयी अपने पुत्र को राजा बनाना चाहती थी तो उसमें बुरा क्या था ? उसकी इसी इच्छा के कारण उसे आज भी दुराचारी और स्वार्थी नारी के रूप में चित्रित किया जाता है । जबकि इतिहास के अधिकांश राजा ऐसी ही इच्छा रखते थे ।

पुरुष अपनी इच्छा आकांक्षा की अभिव्यक्ति सहजता से कर सकता है, वहीं अधिकांश स्त्रियाँ यह पूछने का साहस भी नहीं जूटा पाती कि क्या मेरी संवेदनाओं, मेरी इच्छाओं, मेरी आकांक्षाओं, मेरी बुद्धि का किसी को पता है ? क्या मेरा भी कोई व्यक्तित्व है ? सच तो यह है कि स्त्री के व्यंिक्तत्व एवं उसकी अनुभूतियों के लिए कहीं कोई स्थान नहीं है । महादेवी वर्मा ने लिखा है -
विस्तृत नभ का कोई कोना
मेरा न कभी अपना होना (महादेवी वर्मा ‘ मैं नीर भरी दुःख की बदली ’ - काव्य से )
समाज के दोहरे मानदंडो ने स्त्री की स्थिति विडम्बनापूर्ण बना दी है । वे मात्र स्त्री को ‘ स्त्रीत्व ’ के बंधन में बांधते है । “ स्त्री का व्यक्ति के रूप में प्रकाशित हो सकना, अपनी संपूर्णता में जी सकना मनुष्य जाति के बीच रहने की षर्त है । यह अकारण नहीं है कि इला भट्ट जैसी स्त्री चिन्तक स्त्री मुक्ति के रास्ते मानव जाति की मुक्ति का सपना देख रही है ।
” (अनामिका ‘ स्त्रीत्व का मानचित्र , प्रस्तावना से पृष्ठ, 11 सारांश प्रका्शन 1999 )


डाँ० दीप्ति परमार , राजकोट , गुजरात :idea:
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