बेटियाँ मुखाग्नि क्यों नहीं देती

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बेटियाँ मुखाग्नि क्यों नहीं देती

Post by admin » Wed Jul 03, 2013 4:57 am

भारतीय संस्कृति कर्म-सिद्धान्त पर आधारित है .एक ही माता-पिता से जन्म लेने पर भी बालक-बालिका में भेद किये जाते हैं .शिक्षा-दीक्षा,लालन-पालन समानरूप से होने पर भी पुत्र को कुछ कार्य वंशगत सौंप दिये जाते हैं .

वैदिक सनातन,धर्मशास्त्र सम्मत एवं धर्मानुष्ठान ऐसी ही पूजा है जो मानव को श्रेय प्रदान करती है.वेद सहित समस्त शास्त्रों में तीन प्रकार के ऋण बताये गए हैं.देव-ऋण पितृ-ऋण,ॠषि-ऋण(मानव ऋण)इन तीनो ऋणों को पुत्र ही उतार सकता है. पुत्र से मुखाग्नि पाकर सदा सर्वदा के लिये जीवन मुक्त हो जाता है,ऐसा लोगों का मानना है.समाज में कुछ कर्म-कांडी पूजा, पुत्र के द्वारा ही संम्पन्न कराये जाते हैं जैसे क्षौर–कर्म, जप-तर्पण, मुखाग्नि इत्यादि.भारतीय समाज में माता पिता कुछ संस्कार पुत्रो द्वारा ही संपन्न कराना पसंद करते हैं. कुछ विशिष्ट पूजन के तहत स्वस्ति-वाचन,वैदिक शिव- पूजन तथा शालिग्राम पूजन सदा पुत्र ही करते आयें है, पुत्री को ये पूजा करने की अनुमति नहीं दी जाती है .

बेटी को ‘’दुहिता’’ भी कहा गया है अर्थात पति व पिता दोनों की हित चाहने वाली. बेटी सदा दो नावों पर चलती है.विवाहोपरांत मायके में उसे पूरा अधिकार नहीं दिये जाते हैं.परायी कहकर उससे हाथ छुड़ा लिया जाता है .

किन्तु नवरात्र में यही लोग ‘’दुर्गा-सप्तसती ‘’ का पुरे मनोयोग से मंत्र जपते है –‘’या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिता,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नमः.’’तथा नौ दिनों तक शक्ति की आराधना करतें है. लेकिन हकीकत में पुत्रियों के साथ ऐसा कुछ भी नहीं होता.

वैदिक युग में नारियों का बड़ा ही पूजनीय स्थान था.वे असाधारण विचारिका व पंडिता होती थी. वेद की कितनी ही ऋचायें नारियों की रची हुई है .

अचानक नारियों का स्थान समाज में कम होने लगा इसका एक कारण ‘’आचार्य क्षितिमोहनसेन’’ ने लिखा है की जब आर्य-लोग इस देश में आये तब उनके साथ स्त्रियों की संख्या कम रही होगी,इसीलिए उन्होंने आर्य-कुल के बाहर शादियाँ करनी शुरू कर दी .जिससे आर्येतर स्त्रियों की संख्या बढ़ने लगी .अन्तर्जातीय विवाह की परंपरा शुरू हो गयी .अनुलोम व प्रतिलोम विवाह के द्वारा स्त्रियों को शुद्र के श्रेणी में डाल दिया गया,फिर उनसे धीरे-धीरे सभी अधिकार छिना जाने लगा.बेटों को सारे अधिकार दिये जाने लगे व बेटा ही वंशज कहलाने लगा .परन्तु पुत्र के अभाव में पिता के समपत्ति का उतराधिकार पुत्री को प्राप्त होता था .
तबसे यही परंपरा दुहरायी जा रही है .

आमतौर पर यही समझा जाता है कि बेटियों को घर-गृहस्थी में निपुण होना चाहिए.उसे कुलीनता का चिन्ह माना जाता है .किसी परिवार में पुत्र नहीं हो तो लोग अपने भाग्य को कोसतें है .उनकी सोच में मोक्ष की प्राप्ति सिर्फ पुत्रों के द्वारा ही मिल सकती है .ऐसे ही अनेक कुचक्रों में चिर अनंत से पुत्री पिसती चली आ रही है .मिथिला क्षेत्रों में अभी भी लोग पूजा सहित अन्य संस्कार पुत्रों द्वारा ही संपन्न करते है .ऐसी प्रथा की जड़ें उखाड़ना अत्यंत ही कठिन है .इस तथ्य को सहज ही समझा जा सकता है .

गहरे प्रयासों के वाबजूद भी बेटियों को मुखाग्नि देने की हक़ मिले,तो ये न्यायसंगत होगी. माता –पिता खुद भी इस चीज को समझें. सही दिशा प्रदान करना बेहद जरूरी है .प्रगति के द्वार बेटियों के लिए भी खुलने चाहिए .अर्थतंत्र को खड़े होने चाहिए, जो बेटियों को उत्तरदायित्व निभाने की आज्ञा दे.यदि समाज के कर्णधार बेटा-बेटियों में भेद ,असमानता हटाने के लिए प्रयास करने को तत्पर हों, तो ही बदलाव संभव है .आत्मनिष्ठ –बुद्धि के विकसित होने पर धीरे धीरे मनुष्य की जड़ता ,विवेकहीनता ,अहंकार-संकोच और भेद –भाव नष्ट हो सकता है. विचार व आचरण के बीच की गहरी खाई ने धर्म को प्रभाव हीन बना दिया है .किसी भी चीज की समीक्षा में गुण व दोष दोनों ही होते है उसका सार्थक विश्लेषण के द्वारा ही सटीक मार्गदर्शन हो सकता है .आधुनिक राजतन्त्र ने न्याय की अपनी अवधारणा प्रस्तुत की है .भारतीय संविधान अपने समस्त नागरिकों के सामाजिक ,आर्थिक व धार्मिक अधिकारों की रक्षा करता है .विचार- अभिव्यक्ति, विश्वास- श्रद्धा एवं पूजा पद्धिति की रक्षा भी उसी का दायित्व है. बेटियों को अपने माता-पिता के हर दशा का एह्सासहो जाता है.उनके हर कष्ट-परेशानी व दुःख-दर्द को तुरन्त भांप लेती है जबकि बेटा मूक-दर्शक बना रहता है .

समाचार-पत्र के द्वारा कई दृष्टान्त सामने आया है,जिसमे बेटियों ने बढ़-चढ़ के भाग लिया है.उनको सराहा भी गया है. सरबजीत का मुखाग्नि बहन दलवीर ने दिया.अनेक धारावाहिकों में भी लड़कियों को मुखाग्नि देते हुए दिखाया गया है,जिसे लोगों ने खूब पसंद किया है.अतः बेटी अपनी पहचान विकसित करने में समर्थ है. उसे माता-पिता और समाज का अपनापन चाहिए जिससे वो हर कार्य कर सके जो बेटा द्वारा होता आया है.अध्यात्मिक व व्यावहारिक दृष्टि को अपनाने के लिए विराट बहुमत में आगे आना होगा तभी ये कार्य संभव हो सकता है .


नारी तेरी रूप अनोखी ,क्यों तेरा जीवन वन्दिश होती
बेटी बनकर तुम इठलाती ,पुत्रवधू से कुल सवांरती
पत्नी होकर पथ निहारती,माता की गरिमा बन जाती
दादी सी महिमामय होती ,अंतिम क्षण अनंत में सोती.


भारती दास
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