व्यथा-----अर्चना सोनवर्षा

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व्यथा-----अर्चना सोनवर्षा

Post by admin » Mon Sep 24, 2018 10:14 am

व्यथा...
शरीयत के इतने पाबन्द,

नीरव अंधकार छाया है।

मरे को क्या मारे,

ऐ इंसान!

तूने मां को ग़लत ठहराया है।।

जर्जर आकृति की भांति,

टूट गया है मेरा मन।

हृदयाकाश का पता नहीं,

पर निस्पन्द हो गया था मेरा तन।।

विष बोया तूने,

नदी- कुआं ठिकाना बना मेरा।

चिंगारी छोड़ भाग गया,

आग बुझा रहा मेरा साया।।

अपकीर्ति और कलंक के साथ,

ग्लानि बनीं मेरी सखी।

पुरुषत्व की चरम सीमा,

उस दिन पिशाच से कम न थी।।

-अर्चना सोनवर्षा
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