स्त्री की पीड़ा ----सुशील शर्मा

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स्त्री की पीड़ा ----सुशील शर्मा

Post by admin » Mon Nov 05, 2018 4:07 pm

Sushil Sharma


स्त्री की पीड़ा
सुशील शर्मा

खून में सनी औरतें और बच्चियां हैं ।
क्षतविक्षत और छलनी जिस्म हैं ।
ज़बरन गर्भवती होती स्त्रियाँ
जो टायलेट में , तहख़ानों में
और छावनियों में घसीटी जा रही हैं ।
जो धकेली जा रही हैं सरहदों के पार ,
बेची खरीदी जा रही हैं जानवरों की तरह ।
औरतें जो वहशियों से खुद को बचाने के लिये
नदी में डूब रही हैं।
जमीन में कब्र बनाकर छिप रही हैं।
सीरिया की गोश्त की दुकानों पर
टंगी हैं औरतें नंगी।
कटे हुए जिस्म के लोथड़े।
दर्द से फफक उठते हैं ।
जख्मी जिस्म के अनगिनत घाव
उनके शरीर पर रिसने लगते हैं ।
एकदम मूक और मौन।
न तो लक्ष्मण ने उर्मिला की सोची
और न ही बुद्ध ने यशोधरा की।
राम-रावण युद्ध से लक्ष्मण उभर गए
तो बुद्धत्व को प्राप्त कर बुद्ध निखर गए।
इसी बीच उर्मिला और यशोधरा का योगदान,
उनकी पीड़ा व टीस से किसी को क्या मतलब।
किसी ग्रन्थ किसी वेद में,
नहीं हैं औरत की संवेदनाएं।
सिर्फ तोहमत,
द्रौपदी कारक है महाभारत की ।
सीता ने लक्ष्मण रेखा नाकी।
अहिल्या ने पत्थर बन कर,
भोगा देवत्व का श्राप।
स्त्री का हंसना-बोलना,
उसकी 'हां'- 'ना' सभी कुछ पुरुष तय करता है।
स्त्री का दम घुटता है आत्मा छलनी हो जाती है।
जब पुरुष सब कुछ तय करने के बाद
एक रोटी की तरह स्त्री को खा कर।
स्त्री से पूछता है।
तुम कैसी हो?
तुम क्या चाहती हो?
तुम खुश तो हो न?
मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं।
स्त्री से उसकी इच्छा,
उसकी मर्जी या उसका मत कभी नहीं जाना जाता।
वह क्या चाहती है,
क्यों चाहती है
और क्यों नहीं चाहती,
यह सब पुरुष पर ही निर्भर करता आया है।
स्त्री सिर्फ शब्दों में ही देवी है।
वास्तव में वह वेदी है
जिसमें पुरुष एवं परिवार के लिए
वह कर देती है अपने अस्तित्व को स्वाहा।
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