मजदूर-- आदिल रशीद तिलहरि

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मजदूर-- आदिल रशीद तिलहरि

Post by admin » Tue May 01, 2012 7:51 am

मज़दूर दिवस
खोखले नारों से दुनिया को बचाया जाए
आज के दिन ही हलफ इसका उठाया जाए
जब के मज़दूर को हक़ उसका दिलाया जाए
योम ए मज़दूर उसी रोज़ मनाया जाए

खुदकुशी के लिऐ कोई तो सबब होता है
कोई मर जाता है एहसास ये तब होता है
पेट और भू्ख का रिश्ता भी अजब होता है
जब किसी भू्खे को भर पेट खिलाया जाए
योम ऐ मज़दूर उसी रोज़ मनाया जाए

असल ले लेते हैं और ब्याज भी ले लेते हैं
कल भी ले लेते थे और आज भी ले लेते हैं
दो निवालों के लिए लाज भी ले लेते हैं
जब के हैवान को इंसान बनाया जाए
योम ए मज़दूर उसी रोज़ मनाया जाए

बे गुनाहों की सज़ाएं न खरीदी जाएं
चन्द सिक्कों में दुआएँ न खरीदी जाएं
दूध के बदले में माँएं न खरीदी जाएं
मोल ममता का यहाँ जब न लगाया जाऐं
योम ए मज़दूर उसी रोज़ मनाया जाऐ

अदलो आदिल कोई मज़दूरों की खातिर आऐ
इन के हक़ के लिऐ कोई तो मुनाज़िर आऐ
पल दो पल के लिऐ फिर से कोई साहिर आऐ
याद जब फर्ज़ अदीबों को दिलाया जाऐ
योम ए मज़दूर उसी रोज़ मनाया जाऐ
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