दिल से दिल तक----देवी नागरानी

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दिल से दिल तक----देवी नागरानी

Post by admin » Sun Jan 26, 2014 6:52 am

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अनुक्रमणिका
१. मेरी नब्ज़ छू के सुकून दे, ... २७
२. परदेसी है वो कोई भटकता है ... २८
३. दहशत फैली सड़कों पर... २९
४. नज़र आ रहा है धुआँ ही धुआँ... ३०
५. नाज़ो-अदा वो अपनी कैसी दिखा रहा है... ३१
६. दिल से दिल तक जुड़ी हुई है ग़ज़ल... ३२
७. गिरा हूँ मुंह के बल, ज़ख़्मी हुआ हूँ ... ३३
८. सदा धूप में साया बनकर चली है... ३४
९. बादे-बहार आई, ख़ुशबू-ख़ुमार लाई... ३५
१०. सीप में मोती पलते हैं ... ३६
११. अंधेरी डगर, हादसे चल रहे हैं ३७
१२. तपती दोपहरी में हरदम छांव चाहे मेरा मन... ३८
१३. ज़िन्दगी जंग छोटी-सी तो नहीं... ३९
१४. प्यार की यादगार ताजमहल... ४०
१५. दर्द नहीं दामन में जिनके... ४१
१६. ख़ाक हज़ारों बार हुए हो... ४२
१७. सादगी उसकी इस कदर भाई... ४३
१८. ये कौन आ गया यहाँ ... ४४
१९. मर गई आस फिर भी ज़िन्दा हूँ... ४५
२०. बंद पलकों में मेरी सजा रे... ४६
२१. वो जो उम्र थी यूँ ही ढल गई... ४७
२२. कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे... ४८
२३. फकत हूँ देखता पीता कहाँ हूँ ... ४९
२४. याद की डोली उठी थी हर पहर ... ५०
२५. आओ हम तुम ऐसी नगरी में ... ५१
२६. मेरा ईमान सोया है जगा दो ... ५२
२७. कोई आग दिल में लगा गया... ५३
२८. दाँव पर अपने ही दिल को ... ५४
२९. साथ तन्हाइयों के रहते हैं... ५५
३०. जान पहचान के वे लोग कहाँ... ५६
३१. तवील जितना सफर ग़ज़ल का... ५७
३२. घर से तन्हा जो आप निकलेंगे... ५८
३३. कहीं कूडे करकट में झूठन है डाली... ५९
३४. सोच के अंकुर उगेंगे फिर नये... ६०
३५. सच कहाँ वो बोलता है... ६१
३६. आदमी को कहाँ ख़ुद की पहचान है... ६२
३७. बैल कोल्हू का बनता रहा है बशर... ६३
३८. पुरानी सदी की हूँ मैं इक कहानी... ६४
३९. ढ़ूँढ़े मिलता नहीं मंज़िलों का निशां... ६५
४०. अपनी पहचान पा गयी, यारो... ६६
४१. बढ़ रही हैं चोंचलों की आजकल... ६७
४२. ख़ामशी में जो अश्क पले... ६८
४३. दिल न माने कभी तो क्या कीजे... ६९
४४. हमने पाया तो बहुत कम है, ... ७०
४५. ये है पहचान, एक औरत की... ७१
४६. ख़ुदा तू है कहाँ ये ज़िक्र ही सबकी ... ७२
४७. उजड़ा हुआ है मेरा चमन, ... ७३
४८. आमद आमद हुई घटाओं की... ७४
४९. किसी को किसी से शिकायत न होती... ७५
५०. गहराइयों में दिल की दुनिया नई बसी है... ७६
५१. पामाल हो गए सब अरमान कुछ किये बिन... ७७
५२. कई साज़ों से हमने आज महफल ... ७८
५३. बस्तियाँ भी परेशाँ-सी रहती वहाँ... ७९
५४. मौन भाषा को हमारी तर्जुमानी दे गया... ८०
५५. मैं तो साहिल पे आकर रहा ढूँढता... ८१
५६. मन ही बड़ा अपना दुश्मन है... ८२
५७. जब दुख में अबला रोती है... ८३
५८. मैं ख़ुशी से रही बेख़बर... ८४
५९. मुझे दे पाक दिल मौला... ८५
६०. हो जो तौफीक तो ज़रा देखो... ८६
६१. तेरी रहमतों की ख़बर नहीं... ८७
६२. चमन में ख़ुद को ख़ारों से बचाना ... ८८
६३. है जाना पहचाना-सा वो शीशा... ८९
६४ तैश में जो वो आ गया होगा... ९०
६५. सच की दौलत जो तुम कमाओगे... ९१
६६. घर में वो जब आया होगा... ९२
६७. वैसे तो अपने बीच नहीं है ... ९३
६८. वो दिल ही क्या धड़के न कभी... ९४
६९. कहाँ हार कर जा रहा है ... ९५
७०. ख़्वाबों को सज़ा दी जाती है... ९६
७१. झूठ के साथ सच ये कैसे हैं... ९७
७२. गुलशनों पर शबाब है उसका... ९८
७३. उम्र बहुत अब जी ली जी ली... ९९
७४. ख़ुद ही ख़ुद से मात खाती आ रही है... १००
७५. शोर दिल में न यूँ मचा होगा... १०१
७६. अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं... १०२
७७. वो मासूम ख़्वाहिश भी है याद मुझको... १०३
७८. कहते हैं रूह जिसको पलकर ... १०४
७९. कब, कहाँ लेकर उड़ी है बारहा, ... १०५
८०. तारे गिन गिन के शब परेशां है... १०६
८१. चमन में भी रहूँ तो क्या, ... १०७
८२. जो कुद्रत की इस पर इनायत न होती... १०८
८३. लोग कहते हैं मैं भी कैसी हूँ... १०९
८४. तुझसे ऐ दिल, न मैं ख़फा होता... ११०
८५. यह बेरुख़ी का सिलसिला, अच्छा लगा... १११
८६. मुहब्बत की राहों में दुनियां खड़ी है... ११२
८७. मुझको पागल बना रहे हो तुम... ११३
८८. अनबन ईंटों में कुछ हुई होगी... ११४
८९. मुहब्बत की यही तस्वीर कस्मत ... ११५
९०. शीशे के मेरे घर के हैं दीवारे-दर सभी... ११६
९१. बिलोड़ा सोच का सागर, ... ११७
९२. उम्र भर की सज़ा बन गई ज़िन्दगी... ११८
९३. जख़्म दिल का है हर इक हरा आजकल... ११९
९४. आये हो तुम यहाँ क्यों हाथों में लेके पत्थर... १२०
९५. ढब हैं अब तो ये मालदारों के... १२१
९६. ज़िन्दगी के चन्द लम्हे मैं चुरा कर आई हूँ... १२२
९७. आँसुओं की कहकशां पर ... १२३
९८. इल्म के नाम पर मैं धब्बा हूँ... १२४
९९. जीवन का है अर्थ अनोखा... १२५
१००. आईने पे पड़ी जो नज़र, हम तो रो पड़े... १२६
१०१. तुमको बसा लूँ दिल में, ... १२७
१०२. आलम में गूँजता हुआ तेरा ही नाम है... १२८
१०३. मन को भाती थीं जो सावन की ... १२९
१०४. रहे जो ज़िन्दगी भर साथ ऐसा... १३०
१०५. सफर सूए-मंज़िल चला रफ्ता-रफ्ता... १३१
१०६. मात खाकर ज़िन्दगी होगी बसर... १३२
१०७. सहरा भी गुलज़ार भी तो हैं... १३३
१०८. उसीसे रूबरू मैं हो रहा हूँ... १३४
१०९. अब कहाँ ईमान का कुछ दाम है... १३५
११०. कोई भी सूरत नहीं उनको ... १३६
१११. है कशिश कितनी आबो दानों में... १३७
११२. न जाने रोज़ कितनी बेबसी बर्दाश्त ... १३८
११३. हादसों के हैं मुकाबिल हौसले... १३९
११४. तमन्ना ख़ाक होकर जब उड़ेगी १४०
११५. बिछड़े हैं उन्हें ढूंढें कैसे... १४१
११६. दिल जलाने की दिल दुखाने की... १४२
११७. न करना सोग या मातम, ... १४३
११८. मेरे वतन की ऐ हवा, आएगी ... १४४


ग़ज़लः ०
मुझे भा गई, मेरे साक़ी ग़ज़ल
कि है सोमरस की पियाली ग़ज़ल

पिरोकर वो शब्दों में अनुभूतियाँ
मेरी सोच को है सजाती ग़ज़ल

नई मेरी शैली, नया है कथन
है इक अनसुनी-अनकही-सी ग़ज़ल

मचलती है अश्कों-सी पलकों पे वो
मेरे मन की है बेक़रारी ग़ज़ल

सभी के जो सुख-दुःख में शामिल रहे
उसी को तो कहते हैं अच्छी ग़ज़ल

अधर आत्मा के भी थर्रा उठे
तरन्नुम की धुन पर जो थिरकी ग़ज़ल

कभी धूप-सी है, कभी छांव-सी
कभी दूधिया चाँदनी-सी ग़ज़ल

गुलों की है इसमें तरो-ताज़गी
मैं लायी हूँ इक महकी-महकी ग़ज़ल

न वो उसको छोड़े, न ‘देवी’ उसे
है तन्हाइयों की सहेली ग़ज़ल.०
दिल से दिल तक/26
॰॰
ग़ज़लः १
मेरी नब्ज़ छू के सुकून दे, वही एक मेरा हबीब है
है उसीके पास मेरी शफ़ा वही बेमिसाल तबीब है

हुआ संगदिल है ये आदमी कि रगों में ख़ून ही जम गया
चला राहे-हक़ पे जो आदमी, तो उसीके सर पे सलीब है

ये समय का दरिया है दोस्तो, नहीं पीछे मुड़के जो देखता
सदा मौज बनके चला करे, यही आदमी का नसीब है

यूँ तो आदमी है दबा हुआ यहाँ एक दूजे के कर्ज़ में
कोई उनसे माँगे भी क्या भला, यहाँ हर कोई ही ग़रीब है

न तमीज़ अच्छे-बुरे की है, न तो फ़र्क ऐबो-हुनर में ही
बड़ी मुश्किलों का है सामना कि ज़माना ‘देवी’ अजीब है.

दिल से दिल तक/27
॰॰
ग़ज़लः २
परदेसी है वो कोई भटकता है शहर में
गांवों को याद करके सिसकता है शहर में

मिलना बिछड़ना यह तो मुक़द्दर की बात है
किससे गिला करे वो झिझकता है शहर में

ज़ालिम चुरा के लाया है गुलशन की आबरू
वह गुल-फरोश सबको खटकता है शहर में

दीवारो-दर को कैसे बनाऊँ मैं राज़दाँ
ये प्यार मुश्क है जो महकता है शहर में

ख़्वाबों से घर सजाते हैं पलकों पे लोग क्यों
दिल जिनको याद करके हुमकता है शहर में

जिसको समय की आँधी उड़ा ले गई कभी
मेरा हसीन ख़्वाब चमकता है शहर में

‘देवी’ कुछ ऐसे रंग में करती है शायरी
हर शे’र बनके फूल महकता है शहर में.

दिल से दिल तक/28
॰॰
ग़ज़लः३
दहशत फैली सड़कों पर
सैर को निकला है क्या डर

ग़फलत का ख़मयाजा है
तलवारों के नीचे सर

आँखों में कुछ ख़्वाब तो हों
सहमी-सहमी शामो-सहर

अब ख़तरों का खौफ किसे
जल कर ख़ाक हुआ जब घर

वहमो-ग़ुमाँ के मारे सब
मेरा भरोसा है सच पर

दीवारें सब जानें है
क़ातिल को जिसकी न ख़बर

‘देवी’ थे कल ख़ुश, पर आज
गुमसुम हैं दीवारो-दर.

दिल से दिल तक/29
॰॰
ग़ज़लः४
नज़र आ रहा है धुआँ ही धुआँ
कोई नज़्रे-आतिश है बस्ती वहाँ

सरासर हैं झूठे वो सारे बयाँ
लगे दोष तो क्या कहे बेज़ुबाँ

वहाँ कैसे महफूज़ कोई रहे
दरिंदे खुले आम घूमें जहाँ

फिरा ढूँढता सहरा-सहरा मगर
न मिल पाया प्यासे को कोई कुआँ

जो ज़ुल्मों के साए ज़मीं पर पड़े
नज़र उठ गई जानिबे-आसमाँ

ख़ुशामद करें जो मिलेंगे हज़ार
कहाँ मिलते ‘देवी’ मगर कद्रदाँ

ठिकाने बदलती है ‘देवी’ अगर
नज़र बिजलियों की गई है वहाँ. ४
दिल से दिल तक/30
॰॰
ग़ज़लः ५
नाज़ो-अदा वो अपनी कैसी दिखा रहा है
बेपर की शोख़ियों में उड़ता ही जा रहा है

वो मुस्करा रहा है कलियों के होंठ छूकर
झोंका हवा का देखो क्या गुल खिला रहा है

हर चाल में है सौदा, हर चीज़ की है क़ीमत
रिश्वत का दौर अब तो दुनिया चला रहा है

पहचान आज पूरी होकर भी है अधूरी
चहरा बदल के आदम उलझन बढ़ा रहा है

बरसों की वो इमारत अब हो गयी पुरानी
करके वो रंगो-रौग़न उसको सजा रहा है

बुझते चराग़े-दिल में, किसने ये जान डाली
फिर से हवा के रुख़ पर ये झिलमिला रहा है

अपना ही अक्स ‘देवी’ देखूँ तो मान भी लूँ
आईना अक्स मुझको तेरा दिखा रहा है.
दिल से दिल तक/31
॰॰

ग़ज़लः ६
दिल से दिल तक जुड़ी हुई है ग़ज़ल
बीच में उनके पुल बनी है ग़ज़ल

छू ले पत्थर तो वो पिघल जाए
ऐसा जादू भी कर गई है ग़ज़ल

सात रंगों की है धनुष जैसी
स्वप्न-संसार रच रही है ग़ज़ल

सोच को अपनी क्या कहूँ यारो
रतजगे करके कह रही है ग़ज़ल

रूह को देती है सुकूं ‘देवी’
ऐसी मीठी-सी रागिनी है ग़ज़ल

दिल से दिल तक/32
॰॰
ग़ज़लः ७
गिरा हूँ मुंह के बल, ज़ख़्मी हुआ हूँ
लगा कर झूठ के पर जब उड़ा हूँ

गंवा कर होश आता जोश में जब
मैं जीती बाज़ियाँ तब हारता हूँ

मुझे पहुँचायेंगी साहिल पे मौजें
मैं तूफानों में घिरकर सोचता हूँ

मिलन का मुंतज़र हूँ मौत आजा
मुझे जीना था उतना जी लिया हूँ

उधर देखा नहीं आँखें उठाकर
नज़र से जब किसी की मैं गिरा हूँ

लगाईं तोहमतें बहरों ने मुझ पर
वो समझे बेज़ुबाँ मैं हो गया हूँ

रही हर आँख नम महफ़िल में ‘देवी’
मैं बनकर दर्द हर दिल में बसा हूँ.
दिल से दिल तक/33
॰॰
ग़ज़लः८

सदा धूप में साया बनकर चली है
उसे जैसे मुझसे मुहब्बत बड़ी है

जरा सोच लो दोष देने के पहले
क्या इक हाथ से कोई ताली बजी है

कभी गर्व से ऊँचा सर है किसी का
कभी शर्म से कोई गर्दन झुकी है

वो दुश्मन है या दोस्त जानूँ मैं कैसे
ये उलझन-भरी इम्तहाँ की घड़ी है

वो आधा अधूरा है आदम न जिसकी
कभी आरज़ू कोई पूरी हुई है

रही बंध के मैं इस तरह मामता में
कोई गाय खूंटे से जैसी बँधी है

रहे कैसे पुख़्ता वो दीवार ‘देवी’
जहाँ ईंट से ईंट निस दिन लड़ी है.
दिल से दिल तक/34
॰॰
ग़ज़लः९
बादे-बहार आई, ख़ुशबू-ख़ुमार लाई
ख़ुशियों का है ये मौसम, परिवार को बधाई

सूरजमुखी खिली है, ख़ुश रंग हैं फज़ाएँ
बादे-सबा ने कैसी प्यारी ग़ज़ल बनाई

भंवरो की गुनगुनाहट कोयल की कूक प्यारी
उनसे चुराके सरगम, ये धुन मधुर बनाई

चंचल-सी एक तितली चूमे सुमन सुमन को
शरमा के हर कली भी, जाने क्यों मुस्कराई

बरसात भीनी-भीनी उस पर घनी घटायें
शबनम की ओस जैसे मन को भिगोने आई

चारों तरफ हैं झूमे झोंके हवा के ‘देवी’
मदहोश होके जैसे फस्ले-बहार आई

गुलज़ार महके ‘देवी’ दिल दिल को दे दुआएँ
मंथन किया जो मन का अनुभूति सुख की पाई.

दिल से दिल तक/35
॰॰
ग़ज़लः१०

सीप में मोती पलते हैं ज्यूँ , रख सीने में दर्द सजाकर
रुसवा अपना प्यार न करना, पागल अपने अश्क बहा कर

घोर निराशा के अंधियारे, घेरें जब-जब तुझको, ऐ दिल
रौशन राहें कर ले अपनी, आशाओं की शम्अ जला कर

आँसू एक न ज़ाया करना, ये दौलत अनमोल है प्यारे
दिल के जख़्मों को सीना है, इस पानी को तार बनाकर

श्रद्धा और विश्वास ही तो हैं, इन्सानी जीवन के जौहर
मूँद के अपनी आँखे बंदें, प्रीतम का दीदार किया कर

नूर उसी इक रब का ‘देवी’, हम दोनों के अंदर बसता
देख ख़ुदा को मन ही मन में, क्या करना है बाहर जाकर.

दिल से दिल तक/36
॰॰

ग़ज़लः ११
अंधेरी डगर, हादसे चल रहे हैं
जिगर के दिए ख़ून से जल रहे हैं

अजब ढंग के हैं जवानी के तेवर
बुज़ुर्गों को ये बेवजह खल रहे हैं

टपकता है दिल से लहू कतरा-कतरा
कि तेरे दिये ज़ख़्म यूँ पल रहे हैं

परायों की नज़रों को भाए हैं, लेकिन
हमारे ही अपने हमें छल रहे हैं

न कसमें, न वादे, न हसरत, न अरमां
जो सपने थे वो अश्क में ढल रहे हैं

गए थे वो ख़ुद रूठ कर मुझसे ‘देवी’
पशेमाँ हैं अब हाथ क्यूँ मल रहे हैं.
दिल से दिल तक/37
॰॰
ग़ज़लः १२

तपती दोपहरी में हरदम छांव चाहे मेरा मन
गुनगुनी-सी धूपको फिर पल में तरसे मेरा मन

जब क्षितिज के पार देखा कशतियों को डूबते
साथ उनके डूबते सूरज-सा डूबे मेरा मन

शोखियाँ यौवन की, बचपन की शरारत बेशुमार
देखकर यादों का शीशा तिलमिलाये मेरा मन

गर्दिशों की धूल में धँसते हैं मेरे पांव जब
छटपटाता छूटने को चंगुलों से मेरा मन

बेवफाई, बेरुख़ी उसकी रही आदत सदा
चुपके-चुपके तन्हा बैठा आज रोए मेरा मन

बारहा यादों की अंगनाई में घूम आती हूँ मैं
लाख उनको मैं मनाऊँ पर न माने मेरा मन

आंधियों में भी जले हैं आस के दीपक सदा
साये में उनके ही ‘देवी’ झिलमिलाए मेरा मन.
दिल से दिल तक/38
॰॰
ग़ज़लः १३
ज़िन्दगी जंग छोटी-सी तो नहीं
सिर्फ जाना है, मैं लड़ी तो नहीं

उससे पहचान है पुरानी-सी
दर्द अपना है अजनबी तो नहीं

इल्म से दिल-दिमाग़ रौशन हैं
इससे बेहतर भी रोशनी तो नहीं

अजनबी को मैं कैसे अपनाऊँ
जान-पहचान भी बनी तो नहीं

हादसों से शिकायतें मत कर
हौसलों की डगर बुरी तो नहीं

अपने ही शहर में है खोई क्यों
राह इतनी भी अजनबी तो नहीं

पार कर के वो तोड़े पुल ‘देवी’
इतना इन्सान मतलबी तो नहीं.
दिल से दिल तक/39
॰॰

ग़ज़लः १४
प्यार की यादगार ताजमहल
फ़न का इक शाहकार ताजमहल

जो रहा बादशाह के दिल में
आरज़ू का ग़ुबार ताजमहल

देखकर बेरुख़ी ज़माने की
आज है अशकबार ताजमहल

है अमर प्यार का वो इक तोहफा
हुस्न की यादगार ताजमहल

मौत को जिसने मात ही दे दी
है गुहर आबदार ताजमहल

आके मुमताज़ से मिले कोई
करता है इन्तज़ार ताजमहल

अहले-दिल को दिला रहा ‘देवी’
प्यार का ऐतबार ताजमहल.
दिल से दिल तक/40
॰॰

ग़ज़लः१५
दर्द नहीं दामन में जिनके
ख़ाक वो जीते, ख़ाक वो मरते

जान के भी लहरों को फरेबी
घर है बने कितने रेतों के

नादानो ! धन, दौलत, घर को
अपना-अपना क्योंकर समझे

उनसे क्यों डरते हो साहिब
यूँ न झुको तुम ज़ुल्म के आगे

ढूँढ सको तो ढूँढ लो उसको
काटों में ख़ुशबू जो महके

दिल पत्थर है जिस इन्साँ का
कैसे किसी के दर्द से धड़के

किस्से उम्र के करते बयाँ हैं
चाँदी जैसे बाल ये सर के

खोई-खोई-सी ये ‘देवी’
अपना घर दर-दर है ढूँढे.
दिल से दिल तक/41
॰॰
ग़ज़लः १६
ख़ाक हज़ारों बार हुए हो
शमअ पे फिर भी क्यों जलते हो

ज़िक्र ज़मीरों का न करो तुम
बेचके जिनको तुम जीते हो

जिनके लिए थे ग़ैर हमेशा
उनको अपना क्यों कहते हो

रातों को काली करतूतें
दिन में भले बनकर फिरते हो

भेद न चहरों का खुल जाये
दिन के उजालों से डरते हो

अपनी नज़र के आईने में
देखो तुम कितने बौने हो

काट के पेट सदा औरों का
ठाठ अमीरी के करते हो

देखके ये हैरान है ‘देवी’
ख़ून बहाकर ख़ुश होते हो
दिल से दिल तक/42
॰॰

ग़ज़लः १७
सादगी उसकी इस क़दर भाई
क्या ज़रूरत ग़ज़ल को सजने की

काम कुछ भी नहीं है परदे का
लाज आँखों में चाहिये उसकी

उसकी तर्ज़े-बयां का क्या कहना
है फ़िदा उसके फन पे हर कोई

ज़िन्दगी में वो कामरां होगा
चाहिये दिल को हिम्मत-अफ़जाई

कितना दिलगीर दिल है मेरा आज
काटने दौड़ती है तन्हाई

दर्द ‘देवी’ कराहता जब-जब
उसको सहलातीं उंगलियाँ मेरी
दिल से दिल तक/43
॰॰
ग़ज़लः १८

ये कौन आ गया यहाँ कि छा गया ख़ुमार है
बहार तो नहीं मगर नफ़स-नफ़स बहार है

न दोस्तों न दुश्मनों में उसका कुछ शुमार है
क़तार में खड़ा हुआ वो आज पहली बार है

मैं जिस ज़मीं पे हूँ खड़ी ग़ुबार ही ग़ुबार है
दिलों में सबके नफरतें, ख़ुलूस है न प्यार है

चमन में कौन आ गया जिगर को अपने थामकर
तड़प रही हैं बिजलियाँ, घटा भी अश्कबार है

मुकर रहे हो किस लिये, है सच तुम्हारे सामने
तुम्हारी जीत, जीत है, हमारी हार, हार है

है कौन जिससे कह सकूँ मैं अपने दिल का माजरा
मैं सबको आज़मा चुकी कोई न राज़दार है
दिल से दिल तक/44
॰॰

ग़ज़लः १९
मर गई आस फिर भी ज़िन्दा हूँ
देखो मुझको मैं इक करिश्मा हूँ

मैं तो ख़ुद से न मिल सका अब तक
मैं किनारा किसी नदी का हूँ

मुझसे क्यो बच के सब निकलते हैं
आदमी मैं भी इस सदी का हूँ

क्यों अंधेरों ने मुझको घेरा है
हिस्सा मैं भी तो चाँदनी का हूँ

हर तरफ से है घेरे हुस्न मुझे
मैं तो मुश्ताक भी उसी का हूँ

सुख का सागर छलक रहा घट में
मैं भी उसका ही एक कतरा हूँ

मेरा ईमान, सादगी मेरी
हर नुमाइश से दूर रहता हूँ

राख समझें न ये जहाँ वाले
‘देवी’ अंदर से मैं तो शोला हूँ
दिल से दिल तक/45
॰॰

ग़ज़लः २०
बंद पलकों में मेरी सजा रे
मेरी उम्मीद के कुछ नज़ारे

झिलमिलाते गगन के सितारे
मेरी आँखों के आँगन में आ रे

मेरे बच्चों के मामा तुम्हीं हो
चंदा मामा हो सब के दुलारे

जैसे ममता सुनाती है लोरी
प्यार से थपथपाकर सुला रे

वो तो महकाएगी मेरी बगिया
रातरानी को जाकर बुला रे

दिन उजालों में अब है नहाया
देख सूरज नया है उगा रे

देख कर मस्त नज़रें किसी की
बिन पिए ही वो मदहोश था रे

रात ‘देवी’ कटी तारे गिन-गिन
ले किरण आ गई, मुस्करा रे.

दिल से दिल तक/46
॰॰
ग़ज़लः २१
वो जो उम्र थी यूँ ही ढल गई
वो तो रेत जैसी फिसल गई

जो थी बंद तन के मकान में
मेरी जान कैसे निकल गई

वो तो तीरगी की ही कोख में
ये जो रौशनी थी वो पल गई

करो शुक्रिया क्यों न मौत का
कि जो डर के ज़ीस्त संभल गई

रही सुबह आस की ताज़गी
उड़ी ख़ुशबू शाम जो ढल गई

मेरी सोच में वो निखार था
मेरी ज़िन्दगी ही बदल गई

था असर ग़ुरूर में आग-सा
मेरी ख़ाकसारी ही जल गई.

दिल से दिल तक/47
॰॰
ग़ज़लः २२
कुछ न कह कर भी सब कहा मुझसे
जाने क्या था उसे गिला मुझसे

देखकर भी किया था अनदेखा
वो सरे-राह जो मिला मुझसे

जो भरोसे को मेरे छलता है
वो ही उम्मीद रख रहा मुझसे

क्या लकीरों की कोई साज़िश थी
रख रही हैं तुझे जुदा मुझसे

ख़ुद तो ढाता है वो जफ़ा मुझपर
चाहता फिर भी है वफ़ा मुझसे

चंद साँसों की देके मुहलत यूँ
ज़िंदगी चाहती है क्या मुझसे

कितनी ज़ालिम थी ख़ामुशी ‘देवी’
एक पत्थर गई मिला मुझसे.

ख़ामुशी देवी क्या है ये जाना
शख़्स पत्थर सा जो मिला मुझसे

ख़ामुशी ‘देवी’ कितनी ज़ालिम थी
पत्थरों को गई मिला मुझसे
दिल से दिल तक/48
॰॰
ग़ज़लः २३
फकत हूँ देखता पीता कहाँ हूँ
चलन सीखा अभी उसका कहाँ हूँ

लड़ाई आज तक जारी है उससे
अभी तक मौत से जीता कहाँ हूँ

कहीं कुछ लड़खड़ाहट है ज़रा-सी
न थामो मुझको, मैं गिरता कहाँ हूँ

करे गुमराह, हूँ वो रास्ता मैं
बहुत पुरपेच हूँ सीधा कहाँ हूँ

सुना करता हूँ लोगों से हमेशा
मैं अब तक होश में आया कहाँ हूँ

गलतफहमी हुई है उनको ‘देवी’
है वो तो राम, मैं सीता कहाँ हूँ

दिल से दिल तक/49
॰॰

ग़ज़लः २४

याद की डोली उठी थी हर पहर बरसात में
जख़्म दिल के थे हरे उस चश्मे-तर बरसात में

याद की हर शाख़ पर हो ख़ुशनुमा कोई सुमन
ये ज़रूरी तो नहीं आए नज़र बरसात में

आग पानी में भी लग जाए तो कोई क्या करे
आग दिल में जो लगी हो तर बतर-बरसात में

रात-रानी जिस तरह महकाए रातों को मिरी
उस तरह महके मेरा ज़ख़्मे-जिगर बरसात में

राहतें भी कब निराशाओं का झुरमुट दे सकीं
आस बिरहन बनके भटके दर-ब-दर बरसात में

लोरियाँ गा गा के रिमझिम मुझको सहलाती रहीं
नींद आकर भी न आई रात भर बरसात में

वो शजर जिसके तले तरसा किए हम छाँव को
टूट कर ‘देवी’ गिरा था वो मगर बरसात में

दिल से दिल तक/50
॰॰

ग़ज़लः २५
आओ हम तुम ऐसी नगरी में नया इक घर बनाएँ
हों जहाँ के लोग ज़िन्दा, ज़िन्दा उनकी भावनाएँ

थरथराते होंठ मेरे कुछ कहें, कुछ कह न पाएँ
सुनते आए हम तो लोगों से कई ऐसी कथाएँ

दिल ही दिल में आज़माने की तमन्ना छोड़ कर भी
आइने से असलियत चहरों की हम कैसे छुपाएँ

क्यों लगाया बेबसों की उन कतारों में मुझे भी
सह नहीं पाता है दिल देखूँ जो उनकी वेदनाएँ

सोच के अंकुर जो फूटे हैं ख़यालों में अभी
शब्द के सुर ताल पर नाचें हैं मेरी भावनाएँ

गीत जो गहराइयों में मैंने खोकर पा लिया था
गूँज उसकी घेरे मुझको ऐसे जैसे अर्चनाएँ

दूर तक ग़म के घरौंदे देखकर घबरा गया दिल
अब ख़ुशी के हीरे-मोती हम कहाँ से ढूँढ लाएँ

कर दिया मायूस क्यों ‘देवी’ को तू ने ज़िन्दगी से
तेरी चौखट पर न जाने कितनी की हैं प्रार्थनाएँ
दिल से दिल तक/51
॰॰
ग़ज़लः २६
मेरा ईमान सोया है जगा दो
उसूलों से उसे फिर से मिला दो

जहाँ पल कर हुआ है झूठ कुंदन
उसी आतिश में सच को भी जला दो

कोई झोंके जो धूल आँखों में सच की
मुझे तुम उसके चंगुल से छुड़ा दो

किया रुस्वा मेरी मजबूरियों को
कभी पहचान शोहरत से करा दो

धरम-मज़हब को क्यों हो दोष देते
न क्यूं बलि नफरतों की ही चढ़ा दो

न ‘देवी’ हो दया की भावना जब
तो रुख़ से झूठ का पर्दा उठा दो
दिल से दिल तक/52
॰॰

ग़ज़लः २७
कोई आग दिल में लगा गया
कोई आग दिल की बुझा गया

वो जो कटघरे में खड़ा था ख़ुद
वही दोष मुझपे लगा गया

जो जड़ें थी पुख़्ता यक़ीन की
वो यक़ीन शक से हिला गया

वो जो बहका-बहका था झूठ से
उसे अब फरेब है भा गया

वो जो आशना था मेरा वही
मुझे रुस्वा करके चला गया

जो न झूठ सच को सका परख
वही ख़ुद को देखो ठगा गया

रहा पी के साकी न होश में
कोई ऐसा जाम पिला गया

रहे ज़ख़्म जिसके हरे-भरे
वही ज़ख़्म मेरे सुखा गया
दिल से दिल तक/53
॰॰

ग़ज़लः २८

दाँव पर अपने ही दिल को हम लगाकर देखते हैं
चाहते हैं जिनको उनसे मात खा कर देखते हैं

आगे खाई पीछे खाई अब बचे तो कोई कैसे
इस मुसीबत में मुकद्दर आज़मा कर देखते हैं

हम हंसे आसानियों में खिलखिलाकर खूब, लेकिन
मुश्किलो में भी चलो हम मुस्कराकर देखते हैं

देखते थे हम तमाशा घर जला जब दूसरों का
अब तो घर की आग से दामन जला कर देखते हैं

आज़माते जो रहे अरसे से हमको उनको भी हम
आज मौका जो मिला तो आज़माकर देखते हैं

नाचते थे बनके कठपुतली कभी हम जिनके आगे
आज उनको हम इशारो पर नचा कर देखते हैं

नाचते थे बनके कठपुतली कभी हम जिनके आगे
आज उनको हम इशारो पर नचा कर देखते हैं

नाचते थे हम जिनके आगे बनके कठपुतली कभी
आज उनको हम इशारो पर नचा कर देखते हैं

रोशनी करते कभी हम ज़ुल्मतों में दिल जलाकर
तो कभी दीपक दुआओं के जलाकर देखते हैं

पांव में मजबूरियों की है पड़ी ज़ंजीर ‘देवी’
चाल की रफ्तार लेकिन हम बढ़ा कर देखते हैं
दिल से दिल तक/54
॰॰

ग़ज़लः २९
साथ तन्हाइयों के रहते हैं
ऐ जहाँ वालो हम मज़े से हैं

आँधियों से न अब तो डरते हैं
जब से तूफान घर को घेरे हैं

जब निकलते हैं अपने घर से वो
देखने वाले भी संभलते हैं

फूल तो फूल हैं चलो छोड़ो
फूल लफ्ज़ों के दिल में चुभते हैं

ग़म तो हर वक्त साथ-साथ रहे
ग़म कहीं अपना रुख़ बदलते हैं

आईना बनके जब भी वो आए
हम उन्हें देख कर संवरते हैं

हम भला किस तरह से भटकेंगे
हम तो रौशन ज़मीर रखते हैं

यादें-माज़ी फरेब हैं ‘देवी’
हम तो सच्ची डगर पे चलते हैं

दिल से दिल तक/55
॰॰

ग़ज़लः ३०
जान पहचान के वे लोग कहाँ
हैं परायों में अपने लोग कहाँ

मुस्कराहट ही देखते हैं बस
आहे-दिल देखें ऐसे लोग कहाँ

सिसकियों का ये सिलसिला तोड़ें
दें दिलासा जो ऐसे लोग कहाँ

घर जला है कि दिल, धुआँ कैसा
जाके देखें वहाँ वे लोग कहाँ

मेरी तन्हाइयों को सहलाएँ
धूप में साया बनके, लोग कहाँ

घर में तो वो पनाह देते हैं
दिल का दर खोलें, वैसे लोग कहाँ

उनपे झट से यकीन हम कर लें
हैं भरोसे के इतने लोग कहाँ

हादसों का शिकार सब ‘देवी’
उनसे बच निकलें ऐसे लोग कहाँ
दिल से दिल तक/56
॰॰
ग़ज़लः ३१
तवील जितना सफ़र ग़ज़ल का
कठिन है मंज़िल का पाना उतना

ये कैसी ख़ुशबू है सोच में भी
कि लफ़्ज़ बन कर गुलाब महका

कभी अंधेरों के सांप डसते
कभी उजाला न मन को भाता

वो चुलबुलाहट, वो खिलखिलाहट
वो मेरा बचपन न फिर से लौटा

कहीं तो मिलती नहीं है फि़तरत
तो दिल से दिल भी कहीं है जुड़ता

है दीप मंदिर का ये मेरा दिल
जो भक्ति के तेल से है जलता

ये झूठ इतना हुआ है हावी
कि सच भी आकर गले में अटका

गुमाँ हुआ ये क्षितिज पे ‘देवी’
जमीं पे यूँ आसमाँ है झुकता
दिल से दिल तक/57
॰॰
ग़ज़लः ३२
घर से तन्हा जो आप निकलेंगे
हादसे साथ-साथ चल देंगे

हौसलों को न मेरे ललकारो
आंधियों को भी पस्त कर देंगे

हर तरफ हादसों का है जमघट
मौत के घाट कब वो उतरेंगे

उनपे पत्थर जो फेकें अपने ही
क्यों न शीशे यकीं के टूटेंगे

होगा जब साफ आइना दिल का
लोग तब ख़ुद को जान पायेंगे

जो मुकम्मल हो आशियां दिल का
फिर तो हम-ब-दर न भटकेंगे

रेत पर घर बने हैं रिश्तों के
तेज़ झोंकों से वो तो बिखरेंगे

तब कलेजा फटेगा आदम का
खून इन्सानियत का देखेंगे

दिल से दिल तक/58
॰॰

ग़ज़लः ३३
कहीं कूड़े करकट में झूठन है डाली
कहीं पेट निर्धन का रहता है खाली

रक़ीबों की किसको ज़रूरत पड़ी है
जहाँ डोर ये दोस्तों ने संभाली

हर इक मोड़ पर होते देखी तिजारत
हमेशा रही गूंजती धन की ताली

किये जो भी सौदे किये सादगी से
मगर चाल थी जो वो हंसकर छुपाली

उसे देखकर डर गई सारी कलियां
कि उनमें से नोचेगा किस किस को माली

बग़ावत पे उतरी है क्यों सोच ‘देवी’
ग़ज़ल आज क्यों तेवरी ने उठाली

दिल से दिल तक/59
॰॰


ग़ज़लः ३४
सोच के अंकुर उगेंगे फिर नये
रिशता उनका ताज़गी से जब जुड़े

यूँ तो योद्धा, ख़ुद को हम समझा किये
क्या कभी हम बेज़मीरी से लड़े

सब्र की पलकों पे बंधे हों बाँध जब
आँसुओं के रुक गए हैं सिलसिले

भूख से है भीख का नाता जुड़ा
भीख के यूँ ही कहाँ आदी बने ?

छीनते हैं हक जो औरों का, वही
‘काम ये अच्छा नहीं’ कहते रहे

यूँ चली धोखाधड़ी बाज़ार में
अब खरों के साथ खोटे चल पड़े

आके आँखों में निराशा भर गई
ख़ाली आशाओं के जब दामन हुए

ये ज़वाल आएगा सब पर एक दिन
सामने जो शाख़ से पत्ते गिरे
दिल से दिल तक/60
॰॰
ग़ज़लः ३५
सच कहाँ वो बोलता है
झूठ उसका मश्ग़ला है

मौत थी उसकी सियासी
कह रहे हैं हादसा है

हो गया माहौल रौशन
जाने किसका घर जला है

दोस्त दुश्मन बन के बैठा
क्या किसीको ये पता है

उससे वो बचकर रहेगा
खौफ़ को पहचानता है

कर गया घाटे का सौदा
खुद को उसने तो ठगा है

रिश्ता ‘देवी’ कैसे तोडूँ
मेरा दिल उनसे जुड़ा है
दिल से दिल तक/61
॰॰
ग़ज़लः ३६
आदमी को कहाँ ख़ुद की पहचान है
अपने फन से, हुनर से भी अनजान है

बन न पाया है वो एक इन्सान तक
आदमी हैं कहाँ वो तो शैतान है

वो जो इन्सान था इक फरिश्ता बना
आदमीयत का अब वह निगहबान है

अपने मुँह का निवाला मुझे दे दिया
वो ख़ुदा है, ग़रीबों का रहमान है

लड़खड़ा कर उठा, गिर गया, फिर उठा
हाँ यहीं आगे बढ़ने की पहचान है

जाँ की परवाह न की, सरहदों पर लड़ा
देश की आन से बढ़के क्या जान है ?

पेट पर लात ‘देवी’ न मारो कभी
छीनता है जो रोटी वो शैतान है
दिल से दिल तक/62
॰॰
ग़ज़लः ३७
बैल कोल्हू का बनता रहा है बशर
बोझ बनती हुई ज़िन्दगी झेलकर

ज़िन्दगी की तरह बेवफा दर्द भी
ले चला है मुझे मौत के घाट पर

कुछ हैं मजबूरियाँ, कुछ हैं दुश्वारियाँ
मुशकिलों से भरी प्यार की है डगर

टूटते हैं कहीं दिल, कहीं आइने
घात से पत्थरों के रहो बाख़बर

निर्धनों के न कष्टों की बातें करो
कोई धनवान छोड़े कहाँ है कसर

कितने जन्मों से भटके हैं सहराओ में
अनबुझी प्यास ले आत्मा के अधर

काँच का टुकड़ा समझा जहाँ ने जिसे
था वो हीरा चढ़ा पारखी की नज़र

रोटी-पानी के ‘देवी’ जो लाले पड़ें
भूख को मारकर ज़हर पीता बशर
दिल से दिल तक/63
॰॰


ग़ज़लः ३८
पुरानी सदी की हूँ मैं इक कहानी
नई सोच की हूँ नई तर्जुमानी

वो अल्हड़-सी दुल्हन लगे मेरी आशा
जो शोख़ी से अंगड़ाइयाँ ले जवानी

फरेबों की साज़िश से अब तक घिरी है
रिहा जाने कब हो सके ज़िन्दगानी

तमन्ना उड़ी ख़ाक बनकर है जब-जब
तड़प ने वहीं है सदा खाक छानी

घरौंदे वहाँ नफरतों के बनेंगे
शुरू ज़ुल्म की हो जहाँ भी कहानी

कुचल डालो चाहे, मुझे मार डालो
रुकेगी न मेरे कलम की रवानी

ये औरत की ‘देवी’ भी क्या दास्तां है
कभी है वो सीता, कभी वो भवानी
दिल से दिल तक/64
॰॰

ग़ज़लः ३९
ढ़ूँढ़े मिलता नहीं मंज़िलों का निशां
आके तूफाँ उन्हें ले गया है कहाँ

उनसे दो पल की खुशियाँ न देखी गईं
ग़म हमें आके देने लगे धमकियाँ

जाने क्या वो समझता रहा है मुझे
इक भिखारी भिखारी का है राजदां

आँक पाये न कीमत कभी ज़ीस्त की
बस उन्हें तो रही फ़िक्रे-सूदो जियाँ

दर्द जाना न उसका किसीने कभी
अनसुनी रह गई दर्द की दास्ताँ

कुछ बजाता है मुतरिब रबाब इस तरह
एक आलम पे छाई हैं मदहोशियाँ

जब ये दुनिया उसे खुल के रोने न दे
क्यों न रह-रह के ‘देवी’ भरे सिसकियाँ
दिल से दिल तक/65
॰॰
ग़ज़लः ४०
अपनी पहचान पा गयी, यारो
मेरी हस्ती ही जब मिटी, यारो

साथ में था हुजूम सोचों का
भीड़ से मैं घिरी रही, यारो

बन गई एक ख़ुशनुमा टीका
धूल माथे से जब लगी, यारो

मैं जो डूबी कभी ख़यालों में
इक ग़ज़ल मुझसे हो गयी, यारो

बादलों में छिपा लिया चेहरा
शर्म-सी चाँद को लगी, यारो

देख कर अक्स आईना चौंका
थी ये ‘देवी’ कहाँ छिपी, यारो
दिल से दिल तक/66
॰॰

ग़ज़लः ४१
बढ़ रही हैं चोंचलों की आजकल गुस्ताख़ियाँ
लोरियाँ गाती हैं ख़ाली पालनों को दादियाँ

दिन दहाड़े छीन लेता है समय आसानियाँ
कर रही हैं हुक्मरानी आजकल दुश्वारियाँ

रक्स करती हैं अंधेरों में बसी बरबादियाँ
रोशनी में भी दिखाई देती हैं तारीकियाँ

क्या हुआ क्यों डर रहे हैं आजकल के ये बुज़ुर्ग
इनकी आँखों की हुईं गुल क्या सभी ताबानियाँ

उनकी चीखें गूँजती हैं वादियों में इस तरह
अनकही-सी दास्तानें कह रही हों वादियाँ

सोच पर ताले लगे हैं, होठ भी सिल-से गए
यूँ ज़बां की छीन लीं ‘देवी’ सभी आज़ादियाँ
दिल से दिल तक/67
॰॰
ग़ज़लः ४२

ख़ामशी में जो अश्क पले
क्या छुपते मुस्कान तले

दिल में धुआँ-सा उठता है
जैसे होली कोई जले

ढलता सिन, ढलता सूरज
चाँद न आया रात ढले

आशा की किरणें डूबीं
साँसों का सूरज जब भी ढले

रौशन होती हैं राहें जब
दीपों में मेरा खून जले

दुनिया क्यों बेनूर हुई
आइने को ये बात खले

पत्थर का धड़के जब दिल
ख़्वाब को जैसे ख़्वाब छले
दिल से दिल तक/68
॰॰
ग़ज़लः ४३
दिल न माने कभी तो क्या कीजे
दिल करे दिल्लगी तो क्या कीजे

थे मेरे आस-पास सारे ग़म
रश्क करती खुशी तो क्या कीजे

अपनी परछाईं से वो ख़ाइफ था
ना-समझ हो कोई तो क्या कीजे

इन्तहा दर्द की न रास आई
वो करे ख़ुदकुशी तो क्या कीजे

खुशबयाँ किस कदर हूँ मैं अब भी
ये है ख़ुशकस्मती तो क्या कीजे

ग़मे-दुनिया की तर्जुमाँ ‘देवी’
है मेरी शाइरी तो क्या कीजे

दिल से दिल तक/69
॰॰

ग़ज़लः ४४
हमने पाया तो बहुत कम है, बहुत खोया है
दिल हमारा लबे-दरिया पे बहुत रोया है

कुछ न कुछ टूट के जुड़ता है यहाँ तो यारो
हमने टूटे हुए सपनों को बहुत ढोया है

अर्सा लगता है जिसे पाने में वो पल में खोया
बीज अफसोस का सहरा में बहुत बोया है

तेरी यादों के मिले साए बहुत शीतल से
उनके अहसास से तन-मन को बहुत धोया है

होके बेदार वो देखे तो सवेरे का समां
जागने का है ये मौसम वो बहुत सोया है

बेकरारी को लिये शब से सहर तक ये दिल
आतिशे-वस्ल में तड़पा है, बहुत रोया है

इम्तहाँ ज़ीस्त ने कितने ही लिये हैं ‘देवी’
उन सलीबों को जवानी ने बहुत ढोया है
दिल से दिल तक/70
॰॰

ग़ज़लः ४५
ये है पहचान, एक औरत की
माँ, बहन, बीवी, बेटी या देवी

अपने आंचल की छाँव में सबको
दे रही है पनाह औरत ही

दरिया अश्कों का पार करती वो
ज़िन्दगी के भंवर में जो रहती

दुनिया वाले बदल गये लेकिन
एक मैं ही हूँ जो नहीं बदली

जितनी ऊँची इमारतें हैं ये
मैं तो लगती हूँ उतनी ही छोटी

बेनकाबों की भीड़ में ‘देवी’
ख़ुद को पर्दानशीं नहीं करती
दिल से दिल तक/71
॰॰
ग़ज़लः ४६
ख़ुदा तू है कहाँ ये ज़िक्र ही सबकी ज़ुबाँ पर था
जमीं पर तू कहाँ मिलता हमें तू आसमां पर था

वफ़ा मेरी नज़र अंदाज़ कर दी उन दिवानों ने
मेरी ही नेकियों का ज़िक्र कल जिनकी जुबाँ पर था

भरोसा दोस्त से बढ़कर किया था मैंने दुश्मन पर
मेरा ईमान हर लम्हा मक़ामे-इम्तहां पर था

बड़ा ज़ालिम लुटेरा था वो जिसने नोचली इस्मत
मगर इलज़ाम बदकारी का आख़िर बेज़ुबाँ पर था

ये आँसू, दर्दो-ग़म, आहें सभी हैं मस्अले दिल के
मुहब्बत का ज़माना बोझ इक क़लबे-जवाँ पर था

गुज़ारी ज़िन्दगी बेहोश होकर मैंने दुनियाँ में
मेरा विश्वास सदियों से न जाने किस गुमाँ पर था

बहुत से आशियाने थे गुलिस्ताँ में, मगर ‘देवी’
सितम बर्क़े-तपां का सिर्फ मेरे आशियाँ पर था
दिल से दिल तक/72
॰॰
ग़ज़लः ४७
उजड़ा हुआ है मेरा चमन, या मिरे ख़ुदा
मुरझाये याद के है सुमन, या मिरे ख़ुदा

जलता है आग में ये बदन, या मिरे ख़ुदा
ओढ़े बिना ही अब तो कफन, या मिरे ख़ुदा

कोई गया जहान से तो आ गया कोई
लेकर नया वो एक बदन, या मिरे ख़ुदा

मंज़ूर वो ख़ुशी से किया जो मिला मुझे
आया है बख़्शने का चलन, या मिरे ख़ुदा

अपने वतन से दूर मेरा रो रहा है दिल
अटका हुआ उसी में है मन, या मिरे ख़ुदा

मिट्टी मिले जो देश की तो प्राण मैं तजूँ
दिल में लगी यही है लगन, या मिरे ख़ुदा

‘देवी’ है दरिया आग का दिल में मिरे रवाँ
महसूस कर रही हूँ जलन, या मिरे ख़ुदा
दिल से दिल तक/73
॰॰

ग़ज़लः ४८
आमद आमद हुई घटाओं की
ठंडक अच्छी लगी हवाओं की

लोग निकले हैं सुर्ख़रू होकर
सर पे जिनके दुआ है मांओं की

डर से पीले हुए सभी पत्ते
आहटें जब सुनी ख़िज़ाओं की

बेगुनाही तो मेरी साबित है
फिर सज़ाएँ हैं किन ख़ताओं की

कहके ‘देवी’ मुझे पुकारा है
गूँज अब तक है उन सदाओं की
दिल से दिल तक/74
॰॰

ग़ज़लः४९
किसी को किसी से शिकायत न होती
अगर इस जहाँ में ये ग़ुरबत न होती

मुहब्बत की ईंटें न होती जो उसमें
तो रिश्तों की पुख़्ता इमारत न होती

कभी बाज़ आती न ज़ुर्मों से दुनियाँ
अदालत के ऊपर अदालत न होती

दरिंदों का होता यहाँ बोलबाला
जो इन्सानियत की इबादत न होती

सितारे, न धरती, न आकाश होता
जो दुनिया पे उसकी इनायत न होती

जो अपने उसूलों से गिरती न दुनिया
तो आज उसकी बद्तर ये हालत न होती

अगर ‘देवी’ लाते न उनको अमल में
उसूलों की फिर तो हिफ़ाजत न होती
दिल से दिल तक/75
॰॰
ग़ज़लः ५०
गहराइयों में दिल की दुनिया नई बसी है
रेशम के जाल कितने अब तक वो बुन चुकी है

हस्ती ही मेरी तन्हा इक द्वीप-सी रही है
चारों तरफ है पानी, फिर भी बची हुई है

जज़्बात हो रहे हैं अहसास में नुमायाँ
रिश्तों की रेख-रेखा कितनी उलझ रही है

घेरा है मस्तियों ने तन्हाइयों को मेरी
महसूस हो रहा है फिर भी कोई कमी है

ठेस और ठोकरों का ये सिलसिला है जारी
हर बार बचके ‘देवी’ हँस-हँस के रो पड़ी है

अब रुह में उतरकर मोती समेट ‘देवी’
दिल सीप बन गया है और सोच भी खुली है

दिल से दिल तक/76
॰॰
ग़ज़लः ५१
पामाल हो गए सब अरमान कुछ किये बिन
ख़मयाज़ा हमने भुगता कुछ बोले, कुछ कहे बिन

मुश्ताक चाँदनी की मैं कल थी आज भी हूँ
पर चाँद जाने क्योंकर, वापस गया मिले बिन

कुछ तो मलाल दिल में इस बात का रहा है
बादे-सबा भी लौटी बूए-वफा दिये बिन

इतने रक़ीब मेरे, इक तो रफ़ीक़ होता
जो लौट कर न जाता, मुझसे मिले जुले बिन

इक पल न दिल मेरा ये, महरूम याद से था
मुशकिल था साँस लेना, यूँ आह भी भरे बिन

बचना मुहाल ‘देवी’ फुरकत की आग से है
मुमकिन नहीं सलामत, अरमाँ रहें जले बिन

दिल से दिल तक/77
॰॰

ग़ज़लः ५२
कई साज़ों से हमने आज महफ़िल को सजाया है
ज़बां शब्दों को देकर ख़ूबसूरत गीत गाया है

नहीं हालात बस में जब कभी इन्सान के होते
क़फ़स में फिर वो इक पंछी के जैसा छटपटाया है

सभी मजबूर होते हैं कभी कोई, कभी कोई
सभी को वक्त ने इक दिन शिकार अपना बनाया है

नहीं होती हैं पूरी चाहतें सब की ज़माने में
सुकूने-मुस्तकिल कोई बताए किसने पाया है

भरोसा करने से पहले ज़रा तू सोचती ‘देवी’
कि सच में झूठ कितना उस फ़रेबी ने मिलाया है
दिल से दिल तक/78
॰॰
ग़ज़लः ५३
बस्तियाँ भी परेशाँ-सी रहती वहाँ
आदमी आदमी से ख़फा है जहाँ

मौत की बात तो बाद की बात है
ज़िन्दगी से अभी तक मिली हूँ कहाँ ?

देर से ही सही दिल समझ तो गया
वक़्त की अहमियत हो रही है जवाँ

भीड़ रिश्तों की चारों तरफ़ है लगी
ख़ाली फिर भी है क्यों मेरे दिल का मकाँ ?

खेलते हैं खुले आम खतरों से जो
हौसलों ही पे उनके टिका है जहाँ

दिल के आकाश में देखा जो दूर तक
कहकशाँ से परे भी थी इक कहकशाँ
दिल से दिल तक/79
॰॰

ग़ज़लः ५४
मौन भाषा को हमारी तर्जुमानी दे गया
एक साकित-से कलम को फिर रवानी दे गया

वलवले पैदा हुए हैं फिर मेरे एहसास में
जाने वाला मुस्करा कर इक निशानी दे गया

दाँव पर ईमान और बोली ज़मीरों पर लगी
कोई शातिर शहर को यूँ बेईमानी दे गया

डूब कर ही रह गई हूँ आँसुओं की बाढ़ में
ग़म का बादल हर तरफ पानी ही पानी दे गया

उसके आने से बढ़ी थीं रौनकें चारों तरफ
जब गया तो वो हमें दर्दे-निहानी दे गया

दे गया जुंबिश मिरे सोए हुए जज़्बात को
मुझको ‘देवी’ आज कोई ज़िन्दगानी दे गया
दिल से दिल तक/80
॰॰


ग़ज़लः५५
मैं तो साहिल पे आकर रहा ढूँढता
बाद उसके न सूझा कोई रास्ता

पार मौजों ने की मेरी कश्तीए-ग़म
देखता रह गया नाम का नाख़ुदा

चलके अपने ही दम पर सफर तय करूँ
नक्शे-पा और कब तक रहूं ढूँढता

चैन से बैठ सकता नहीं आदमी
फ़िक्रे-दुनिया लिये घूमता है सदा

इन ख़्यालों के जंगल से ‘देवी’ निकल
गुलशने-लफ्ज़ो-मा’नी के मंगल में आ
दिल से दिल तक/81
॰॰

ग़ज़लः ५६
मन ही बड़ा अपना दुश्मन है
सोचों की बाहम अनबन है

जब दुख ही है दुख का मदावा
फिर क्या खुशियों में अड़चन है

जिसके लिए औरों से लड़ी मैं
वो मेरा जानी दुशमन है

जो ग़ैरों को अपना कर ले
समझो उसमें अपनापन है

अक्स लड़ा है आईने से
कैसा ये दीवानापन है

महकी-महकी फिरती ‘देवी’
क्या तेरे दिल में मधुबन है
दिल से दिल तक/82
॰॰

ग़ज़लः ५७
जब दुख में अबला रोती है
क्यों ख़ून की बारिश होती है

उड़ जाती हैं नींदे रातों की
जब कस्मत मेरी सोती है

बेचैनी देखके रातों की
करवट करवट क्यों रोती है

ख़ुद के कांधों पर बोझ लिये
क्यों नारी चिता पर सोती है

है दुख के साहिल पर कश्ती
फिर दर्द नया क्यों ढोती हैं

जब डूब चुका है दिल ‘देवी’
अब खड़े-खड़े क्यों रोती है
दिल से दिल तक/83
॰॰

ग़ज़लः ५८

मैं ख़ुशी से रही बेख़बर
ग़म के आँगन में था मेरा घर

रक्स करती थीं ख़ुशियाँ जहाँ
ग़म उन्हें ले गया लूटकर

आशियाँ ढूँढते-ढूँढते
खो दिया मैंने अपना ही घर

गुफ़्तगू जिनसे होती रही
उनको देखा नहीं आँख भर

चोट चाहत को ऐसी लगी
टुकड़े-टुकड़े हुई टूट कर

कैसे परवाज़ ‘देवी’ करे
नोचे सैयाद ने उसके पर
दिल से दिल तक/84
॰॰
ग़ज़लः ५९
मुझे दे पाक दिल मौला
न धन माँगू न मैं सोना

विकारों से हैं मन मैले
शरीरों को है क्या धोना

वो पारस क्या जिसे छूकर
न लोहा बन सके सोना

ग़मों को मैंने चुन-चुन कर
सजाया दिल का हर कोना

न ऐसी चाह रख दिल में
जिसे पाकर पड़े खोना

ग़मों को जब हंसी आई
ख़ुशी को आ गया रोना

ये कैसी ज़िन्दगी ‘देवी’
सलीबों को जहाँ ढोना
दिल से दिल तक/85
॰॰
ग़ज़लः ६०

हो जो तौफ़ीक तो ज़रा देखो
संग में भी बसा ख़ुदा देखो

अब जिये भी तो क्या जिये कोई
एक महशर-सा है बपा, देखो

दिल के जज़्बात मैं लिखूँ कैसे
कम है लफ़्जों का सिलसिला देखो

ख़्वाहिशें रक्खो ज़िन्दा तुम वर्ना
ज़िन्दगी होगी बेमज़ा देखो

छंट गया है ग्रहण ग़ुलामी का
मस्त आज़ादियाँ ज़रा देखो

दस्तकें देके दिल के दर पर यूँ
ये हवा कह रही है क्या देखो

सुबह के इंतजार में ‘देवी’
रात जागी है क्या ज़रा देखो
दिल से दिल तक/86
॰॰
ग़ज़लः ६१
तेरी रहमतों की ख़बर नहीं
मेरी बंदगी में असर नहीं

सदा जिसकी नेकी निहां रहे
कहीं कोई ऐसा बशर नहीं

जहाँ छाँव सुख की मिले मुझे
वहाँ ऐसा कोई शजर नहीं

वो तो ढूँढे बिन ही मिले थे ग़म
मिलीं ख़ुशियाँ ढूँढे मगर नहीं

जिसे लोग कहते हैं ज़िन्दगी
वो तो इतना आसाँ सफर नहीं

दिल से दिल तक/87
॰॰


ग़ज़लः ६२
चमन में ख़ुद को ख़ारों से बचाना है बहुत मुश्किल
बिना उलझे गुलों की बू को पाना है बहुत मुश्किल

किसी भी माहरू पर दिल का आना है बहुत आसाँ
किसी के नाज़ नख़रों को उठाना है बहुत मुश्किल

न छोड़ी चोर ने चोरी, न छोड़ा सांप ने डसना
ये फ़ितरत है तो फ़ितरत को बदलना है बहुत मुश्किल

किसी को करके वो बरबाद ख़ुद आबाद हो कैसे
चुरा कर चैन औरों का तो जीना है बहुत मुश्किल

गले में झूठ का पत्थर कुछ अटका इस तरह ‘देवी’
निगलना है बहुत मुशकिल, उगलना है बहुत मुश्किल
दिल से दिल तक/88
॰॰
ग़ज़लः ६३
है जाना पहचाना-सा वो शीशा
लगे है क्यों अजनबी-सा चहरा

ख़ुशी की किरणें भी छू न पाईं
उदासियों का घना अंधेरा

ये सोच की डालियों के पंछी
उड़े जो बेपर हआ अचंभा

न शम्अ जलती न ये पतिंगे
न होता जलना न ये जलाना

अमीर ग़ुरबत को जब ख़रीदे
तो कस्रे-ईमां है डगमगाता

गुनाह करके सज़ा न पाये
कि जिसने अपना ज़मीर बेचा
दिल से दिल तक/89
॰॰

ग़ज़लः ६४

तैश में जो वो आ गया होगा
ख़ुद का नुकसान ही किया होगा

झूठ के पांव क्यों न ठिठकेंगे
देखकर सच को वो डरा होगा

वो भविष्य और अतीत के हाथों
जाने क्यों, कैसे, कब बिका होगा

सलवटें कह रही हैं चादर की
रात बेचैन वो रहा होगा

आसमाँ टूट कर गिरा जिस पर
वो तो तक़दीर से बचा होगा

सच तो अब इक गुनाह ठहरा है
इससे बढ़कर बुरा भी क्या होगा

है वो इन्साफ की अगर ‘देवी’
फिर तो इन्साफ ही किया होगा
दिल से दिल तक/90
॰॰

ग़ज़लः ६५
सच की दौलत जो तुम कमाओगे
दिल के अंदर सुकून पाओगे

क्या निभाओगे ग़म के मारों से
तुम फ़रेबी हो भाग जाओगे

मैं हूँ पत्थर न मुझसे टकराना
तुम बहर-तौर टूट जाओगे

रब ने बख़्शा मुझे दिल-ए-आगाह
कौन-सा राज़ तुम छुपाओगे

मैं दुखों का पहाड़ काटूँगी
क्या मेरा साथ तुम निभाओगे

सच ही कहते हैं, दिलरुबा हो तुम
और कितनों का दिल उड़ाओगे

खून मांगे है दोस्ती ‘देवी’
क्या उसे खूने-दिल पिलाओगे
दिल से दिल तक/91
॰॰

ग़ज़लः ६६
घर में वो जब आया होगा
ख़ुशबू से घर महका होगा

उसने ज़ुल्फ को झटका होगा
प्यार का सावन बरसा होगा

साँसों में है उसकी ख़ुशबू
इस जानिब वो गुज़रा होगा

कलियाँ सारी मुस्काती हैं
उनपे यौवन आया होगा

झन-झन-झन झनकार करे दिल
उसने साज़ बजाया होगा

मुझको संवरता देख के दर्पण
मन ही मन शरमाया होगा

दिल के दर्पण में ऐ ‘देवी’
अक्स निराला आया होगा

दिल से दिल तक/92
॰॰
ग़ज़लः ६७
वैसे तो अपने बीच नहीं है कोई ख़ुदा
लेकिन ख़ुदी ने दोनों में रक्खा है फासला

कोशिश वो भूलने की करे लाख तो भी क्या
डर बनके दिल में पलती है इन्सान की ख़ता

ये ज्वार-भाटे आते ही रहते हैं ज़ीस्त में
हर रोज़ आके जाते हैं देकर हमें दग़ा

तेरे ही ऐतबार में डूबी हुई थी मैं
तुझ पर ये ऐतबार ही मुझको डुबो गया

भंवरों के इन्तज़ार में मुरझा गए सुमन
देखा किये हैं फिर भी वो भंवरों का रास्ता
दिल से दिल तक/93

॰॰

ग़ज़लः ६८
वो दिल ही क्या धड़के न कभी
जो साज़ को सरगम दे न कभी

वो आँख ही क्या जो रो न सके
गुलशन दिल का सींचे न कभी

हम लाख ग़मों से खेले हैं
ख़ुशियों से मगर खेले न कभी

वो सोच अधूरी कैसे सजे
लफ्ज़ों का लिबास ओढ़े न कभी

हम खेल रहे हैं किनारों पर
गहरे दिल में डूबे न कभी

तारों से सजी महफि़ल ‘देवी’
बिन चाँद के वो भाये न कभी
दिल से दिल तक/94
॰॰

ग़ज़लः ६९
कहाँ हार कर जा रहा है दिवाने
हैं कितने अभी इम्तिहाँ, कौन जाने

कभी साथ चलने का वादा किया था
तो क्यों साथ अब छोड़ने के बहाने

भरोसा था दोनों का इक दूसरे पर
ग़लतफहमियाँ आईं कैसे न जाने ?

चमन छोड़ कर जा रहे हैं परिंदे
ख़बर है जलेंगे यहाँ आशियाने

सहर से हुई दोपहर अब तो ‘देवी’
कहाँ शाम होगी ये भगवान जाने
दिल से दिल तक/95
॰॰

ग़ज़लः ७०
ख़्वाबों को सज़ा दी जाती है
बस नींद उड़ा दी जाती है

आँखों में सवालों का तांता
आवाज़ दबा दी जाती है

चाँद को पाना नामुमकिन
परछाईं दिखा दी जाती है

सच झूठ की जंग छिड़े जब-जब
दीवार गिरा दी जाती है

ख़्वाबो में सँवरने की कोशिश
ज़िन्दा चुनवा दी जाती है

ग़म के झूले में दिल की ख़ुशी
सहला के सुला दी जाती है

रिश्वत से ग़ुरबत की ‘देवी’
हर नींव हिला दी जाती है
दिल से दिल तक/96
॰॰

ग़ज़लः ७१
झूठ के साथ सच ये कैसे हैं
हम यकीनो-गुमाँ में रहते हैं

दिल में अहसास भी कुछ ऐसे हैं
मुझको अक्सर जो ज़िन्दा रखते हैं

ग़म की बुनियाद पर है गुलशन जो
उस चमन में भी फूल खिलते हैं

उलझी-उलझी-सी हूँ यहाँ मैं भी
उलझे-उलझे वहाँ वो बैठे हैं

आइना राज़दां रहा अपना
दिल की हम उससे बात करते हैं

सोचती हूँ कि छोड़ दूँ उनको
मुझसे जो बेवजह उलझते हैं

हमपे साया बडों का है ‘देवी’
ख़ुद को महफूज़ यूँ भी रखते हैं
दिल से दिल तक/97
॰॰
ग़ज़लः ७२
गुलशनों पर शबाब है उसका
ये करम बेहिसाब है उसका

अश्क कितने मिले, खुशी कितनी
उलटा-सुलटा हिसाब है उसका

मौत तो उसकी ओट लेती है
ज़िन्दगी इक नक़ाब है उसका

ये ख़ुदाई जो देखते हैं हम
कुछ नहीं, एक ख़्वाब है उसका

तन की चादर महीन है इतनी
बस मुरव्वत हिजाब है उसका

साज़ सरगम समाए हैं घट में
दिल की धड़कन रबाब है उसका

कौन समझा है ज़ीस्त को ‘देवी’
ढंग ही लाजवाब है उसका
दिल से दिल तक/98
॰॰
ग़ज़लः ७३
उम्र बहुत अब जी ली जी ली
नब्ज़ चले है ढीली ढीली

डूब रही है दिल की धड़कन
आँखें हुई हैं नीली नीली

ख़ौफ दिया है किस आहट ने
पड़ गई रंगत पीली पीली

कहता क्या गुड़ खाकर गूँगा
जिसने जबाँ ही सी ली सी ली

यूँ तो सहरा है मेरा दिल
फिर भी है आँखें गीली गीली

तिनकों जैसा तन है मेरा
आग लगाये तीली तीली
दिल से दिल तक/99
॰॰

ग़ज़लः ७४
ख़ुद ही ख़ुद से मात खाती आ रही है ज़िन्दगी
दीखती आज़ाद लेकिन कैद-सी है ज़िन्दगी

कश्मकश के जाल में हर शख़्स है उलझा हुआ
दायरों ही दायरों में घूमती है ज़िन्दगी

ज़िन्दगी की कद्र करना सीख ले नादान कुछ
ये करम उसका है जो तुझको मिली है ज़िंदगी

शोर की इन बस्तियों में कहकहे मीठे कहाँ
ख़ुशनुमा ख़ामोशियों में रागिनी है ज़िन्दगी

हौसले हों गर जवां तो रास्ते पुरख़म नहीं
मुश्किलों की धूप में भी चाँदनी है ज़िन्दगी

दौड़ती ही वो रही है इक खिलाड़ी की तरह
उम्र के इस मोड़ पर अब हांफती है ज़िन्दगी

दूर तक सहराओं में भटका किये हम उम्र भर
प्यास ‘देवी’ कैसी लेके चल रही है ज़िन्दगी
दिल से दिल तक/100
॰॰
ग़ज़लः ७५
शोर दिल में न यूँ मचा होगा
कुछ न कुछ तो उसे हुआ होगा

कुछ ज़मीं में कशिश रही होगी
आसमां इसलिये झुका होगा

उसके मन में झिझक हुई होगी
झूठ ने सच को जब छुआ होगा

ख़्वाब दुनिया को बांटता है वो
इससे बढ़कर सवाब क्या होगा

हो गवाहों का जो करम उस पर
हक में कातिल के फैसला होगा

जो परिंदों के पर कतरता है
वो दरिंदों का सरग़ना होगा

कौन देता है दर्द को आँसू ?
इतना हमदर्द कोई क्या होगा ?

रौशनी फैली दूर तक ‘देवी’
दिल किसी का कहीं जला होगा
दिल से दिल तक/101
॰॰
ग़ज़लः ७६

अब ख़ुशी की हदों के पार हूँ मैं
दर्द पिघला है अश्कबार हूँ मैं

गीत कैसे न सुर में ढल जाते
दोस्तो, साज़े-दिल का तार हूँ मैं

ऐसी पी है तेरी निगाहों से
जो न उतरे वही ख़ुमार हूँ मैं

जिनको माँगे बिना मिले आँसू
उन्हीं लोगों में अब शुमार हूँ मैं

जिससे घायल नहीं हुआ कोई
मोम की इक वही कटार हूँ मैं

सुनती हूँ आहटें ख़िज़ाओं की
जाने वाली है जो बहार हूँ मैं

दिल से दिल तक/102
॰॰

ग़ज़लः ७७
वो मासूम ख़्वाहिश भी है याद मुझको
मुक़द्दर की साज़िश भी है याद मुझको

जिन अश्कों ने आँखों को सैलाब बख़्शा
वो नमकीन बारिश भी है याद मुझको

जलाई अंधेरों में लौ दर्दे-दिल की
उजालों की आतिश भी है याद मुझको

छुपाए फिरूँ आज ख़ुद को हया से
वो कल की नुमाइश भी है याद मुझको

घरों को जलाया था फ़ितनागरों ने
वो शोलों की बारिश भी है याद मुझको

कभी ‘देवी’ इकरारे-उल्फ़त किया था
लबों की वो जुंबिश भी है याद मुझको
दिल से दिल तक/103
॰॰
ग़ज़लः ७८
कहते हैं रूह जिसको पलकर भी पल न पाए
तन का हवन जला पर, ये मन पिघल न पाए

मिलकर बिछड़ने वाले मिलने की आस लेकर
कुछ ऐसे जी रहे हैं, अरमां मचल न पाए

उम्रे-रवां के नख़रे दुल्हन से कम नहीं हैं
जलवा शबाब का ये इक रोज़ ढल न पाए

मेरी नज़र ने तोड़ा हर इक भरम तुम्हारा
ये झूठ के मुखौटे सच में बदल न पाए

उस बेवफ़ा का शिकवा आता नहीं है लब पर
जो ज़िन्दगी से निकला, दिल से निकल न पाए

दातों तले दबा कर उंगली मैं सोचती हूँ
वो हुस्न क्या कि जिस पर आशिक़ फिसल न पाए

दुश्वारियाँ हज़ारों राहे-वफ़ा में, लेकिन
मँज़िल का अज़्म ‘देवी’ फिर भी बदल न पाए
दिल से दिल तक/104
॰॰


ग़ज़लः ७९
कब, कहाँ लेकर उड़ी है बारहा, पूछो ज़रा
तिनका तिनका आशियाने का हवा, पूछो ज़रा

बढ़ गये हैं रंजो-ग़म क्यों इस जहाँ में इस क़दर
बेअसर क्यों हो गई उनकी दुआ, पूछो ज़रा

हाथ उठाकर माँगते थे जो दुआएँ रात-दिन
उनको किस्मत से मिली कब-कब दग़ा, पूछो ज़रा

याद की शाखों के पंछी उड़ गए क्यों यक-ब-यक
क्या हुआ है हादसा कोई नया, पूछो ज़रा ?

हाथ की रेखा कभी क्या ये बता पाई हमें
क्या कभी बदला है क़िस्मत का लिखा, पूछो ज़रा

शोख़ियों के उनके वैसे तो बहुत चर्चे रहे
कान में फिर तितलियों ने क्या कहा, पूछो ज़रा

शानो-शौक़त में रहे जो उम्र भर, उनसे कभी
मुफ़लिसी का ज़ायका होता है क्या, पूछो ज़रा

दिल को जाने क्या समझकर तोड़ते ही वो रहे
क्या मिली उस ज़ुर्म की उनको सज़ा, पूछो ज़रा

कल किसी साज़िश में शामिल तो हुई ‘देवी’ न थी
आज क्यों फिर वार पीछे से हुआ, पूछो ज़रा
दिल से दिल तक/105
॰॰

ग़ज़लः ८०

तारे गिन गिन के शब परेशां है
देखकर चाँद उसको हैरां है

फूल ख़ुश रंग, बू की सुहबत में
मुख़्तसर ज़िन्दगी परेशां है

उसके साथी गए, अकेला वो
जाने कितने दिनों का महमां है

घर तबाही के मोड़ पर आया
अब तो रब तू ही इक निगहबां है

खुशबू घेरे है इस तरह मुझको
मेरी सांसों में इक गुलिस्तां है

नुक्तः-चीनी किया करो अपनी
‘देवी’ अपना भी इक ग़रेबां है
दिल से दिल तक/106
॰॰

ग़ज़लः ८१
चमन में भी रहूँ तो क्या, चुभन काटों के जैसी है
भले हो बात मामूली मगर खंजर-सी लगती है

न रास आई ख़ुशी मुझको जो दस्तक देने आई थी
ग़मों से प्यार है मेरा, उन्हीं के साथ निभती है

ज़रूरत ही नहीं कहने की, मिलती है ख़बर उसको
कहाँ होते हैं कान उसके, मगर दीवार सुनती है

नहीं है लुत्फ़ जीने में, है वीरानी-सी इस दिल में
ये महफ़िल भी मुझे तो सूनी-सूनी-सी ही लगती है

तस्व्वुर में है तू ही तू, नज़र में अक्स है तेरा
जहाँ देखूँ वहीं तेरी, मुझे तस्वीर छलती है

जला हूँ रात भर लेकिन, सवेरा देखना बाक़ी
वो शम-ए-सोज़ां ही क्या जो जलाए बिन ही बुझती है

निशाना क्यों बनी ‘देवी’, लहू दिल से है क्यों टपका
वफ़ा करने के बदले में सज़ा क्यों मुझको मिलती है
दिल से दिल तक/107
॰॰


ग़ज़लः ८२
जो कुद्रत की इस पर इनायत न होती
ज़मीं इस कदर ख़ूबसूरत न होती

नज़ारे न होते, नज़ाकत न होती
अगर ज़िन्दगी में मुहब्बत न होती

अगर चाँद-सी होती बेजानो-वीरां
तो धरती पे जीने की सूरत न होती

न होतीं अगर शोख-चंचल अदाएँ
कयामत से पहले क़यामत न होती

खुले हाथ उसकी अताएँ हैं, वरना
मुझे माँगने की ये आदत न होती

दिलों में सदा पाक जज़्बे उमड़ते
अगर सोच में कुछ कसाफ़त न होती

यकीं होता ‘देवी’ को तेरी वफ़ा पर
जो दुश्मन की इसमें शरारत न होती
दिल से दिल तक/108
॰॰
ग़ज़लः ८३
लोग कहते हैं मैं भी कैसी हूँ
ज़ख़्म खाकर न आह भरती हूँ

जब से देखी है प्यार की शिद्दत
दूर मैं नफ़रतों से रहती हूँ

प्यार की तिश्नगी गज़ब की है
खूब पीकर भी प्यासी रहती हूँ

आशियाने बना के तिनकों से
आंधियों से बचा के रखती हूँ

क्यों तड़पता है वो, ख़ुदा जाने
दिल का मैं हाल जब भी कहती हूँ

धूप में ख़ुद का देख कर साया
अपनी औक़ात याद रखती हूँ

‘देवी’ रिश्ता है क्या नहीं मालूम
जब वो जलता है मैं भी जलती हूँ
दिल से दिल तक/109
॰॰
ग़ज़लः ८४
तुझसे ऐ दिल, न मैं ख़फा होता
मेरा माना अगर कहा होता

वक़्त कुछ तो उसे मिला होता
दर्द ही दर्द की दवा होता

बेअसर हो गई दवा लेकिन
कुछ दुआ का असर हुआ होता

वो समझता ज़रूर मेरा ग़म
ग़म ने उसका जो दिल छुआ होता

अच्छा होता कि याद का पंछी
साथ मुझको भी ले उड़ा होता

रास्ते यूँ न मुझको भटकाते
मंज़िलों का अगर पता होता

दिन न कटते पहाड़ से ‘देवी’
साथ तेरा अगर मिला होता
दिल से दिल तक/110
॰॰

ग़ज़लः ८५
यह बेरुख़ी का सिलसिला, अच्छा लगा
उसने मुझे धोखा दिया, अच्छा लगा

तन्हा रही हूँ मैं जहाँ की भीड़ में
इक पास था मेरा ख़ुदा, अच्छा लगा

आता है मुझको भी मनाने का हुनर
इक दोस्त जब दुश्मन बना, अच्छा लगा

उसकी ख़ुशामद से परेशां थी बहुत
वो छोड़ कर मुझको गया, अच्छा लगा

इक सोच ने ‘देवी’ मुझे जकड़ा बहुत
जब उससे छुटकारा मिला, अच्छा लगा
दिल से दिल तक/111
॰॰
ग़ज़लः ८६
मुहब्बत की राहों में दुनियां खड़ी है
हमीं पर हैं नजरें, बड़ी बेबसी है

वहीं आसमां है, जमीं भी वही है
कहीं ऐशो-इशरत, कहीं मुफलिसी है

वही उलझनों में सरों का पटकना
ये जो कशमकश है, यही ज़िन्दगी है

जहाँ बेयक़ीनी के घर ढह गये हैं
भरोसे की दीवार फिर भी बची है

कभी रूह को ग़ौर से सुन तो लेते
यही है इबादत, यही बंदगी है

मेरे साथ इक भीड़ चलती हैं, लेकिन
मुझे मेरी दुनिया अकेली लगी है

तअक़्कुब में क्यों उनके तूफां है ‘देवी’
सफ़ीनों से ऐसी भी क्या दुशमनी है
दिल से दिल तक/112
॰॰

ग़ज़लः ८७
मुझको पागल बना रहे हो तुम
भीड़ ख़ासी जुटा रहे हो तुम

इस क़दर खो गये हो दौलत में
मुफ़लिसों को रुला रहे हो तुम

अपनी नादानियों पे हो नाज़ां
मुझपे तोहमत लगा रहे हो तुम

दर्ज इतिहास में तो हूँ लेकिन
फिर भी मुझको भुला रहे हो तुम

सबसे मिलते हो सब तुम्हारे हैं
ग़ैर मुझको बना रहे हो तुम

जाने कितने दिलों से खेले हो
कब किसी के सदा रहे हो तुम

ज़ुल्म पर ज़ुल्म क्या कहें ‘देवी’
मेरी चीख़ें दबा रहे हो तुम
दिल से दिल तक/113
॰॰

ग़ज़लः ८८

अनबन ईंटों में कुछ हुई होगी
यूँ न दीवार वो गिरी होगी

पुख़्ता होंगी कहाँ से दीवारें
कुछ मिलावट कहीं रही होगी

बीते कल की थी एक हिस्सा जो
आज इतिहास वो बनी होगी

घर बिखरता है तो यही जानो
टूटी पुख़्ता कड़ी कोई होगी

तेवर उसके कई रहे होंगे
उँगली जब और पे उठी होगी

कथ्य औ’शिल्प का हुआ संगम
कोई अद्भुत ग़ज़ल बनी होगी

दर्द से वो तड़प उठा ‘देवी’
दिल पे चोट ऐसी कुछ लगी होगी
दिल से दिल तक/114
॰॰
ग़ज़लः ८९
मुहब्बत की यही तस्वीर क़िस्मत ने दिखाई है
फ़क़त बहते हुए अश्कों से मेरी आशनाई है

तुम्हारी आँख में झाँका तो देखी ख़ुद की परछाईं
ये अपनी आशिक़ी का मोड़ शायद इंतिहाई है

तुम्हारे ख़त में ताज़ा है अभी भी प्यार की ख़ुशबू
उसीसे तो दिले-बेताब ने तस्कीन पाई है

पुराने ज़ख़्म भी नासूर बनकर दिल लुभाते हैं
लबों पर मुस्कराहट भी उन्होंने ही सजाई है

हवा की शोख़ियों ने भी इसे छोड़ा नहीं लोगो
सरक कर सर से कांधो पर ये चुनरी अब तो आई है

मिलीं नज़रें तो रौशन हो गई अरमान की महफ़िल
तुम्हारे प्यार ने ‘देवी’ मेरी क़िस्मत जगाई है
दिल से दिल तक/115
॰॰

ग़ज़लः ९०
शीशे के मेरे घर के हैं दीवारे-दर सभी
कैसे कहूँ के संग नहीं आएँगे कभी

तुम तीर तो चलाओ मगर पहले जान लो
आते नहीं है लौट के, वक्त और जाँ कभी

दामन में अपने तुम मेरे आँसू समेट लो
तुमको भी कहकशां नज़र आ जाएगी तभी

जलने को बाक़ी क्या बचा जिसको बचाऊँ मैं
गर्दिश की आँधी राख उड़ा ले गई सभी

आये हैं, बैठिये तो ज़रा, दम तो लीजिये
ख़िदमत का वक्त़ दीजिये ‘देवी’ को भी कभी
दिल से दिल तक/116
॰॰

ग़ज़लः ९१
बिलोड़ा सोच का सागर, लिखा तो ध्यान में आया
समझ में मेरी जो कुछ था, समझ कोई नहीं पाया

सुनामी ने सजाई मौत की महफ़िल फिज़ाओं में
सितम ये भी किया उसने, कोई रो भी नहीं पाया

ग़ज़ब का ज़ुल्म ढाया है, न पूछी आख़िरी ख़्वाहिश
कि छाया लाश के ढेरों पे कैसा मौत का साया

हँसे थे खिलखिला कर जख़्म भी कुछ इस तरह लोगो
ज़मीनो-आस्मां को कहकहों ने और थर्राया

इमारत जो बनी थी खौफ की बुनियाद पर ‘देवी’
गिरी वो भरभरा कर, मिल गया मिट्टी में सरमाया
दिल से दिल तक/117
॰॰


ग़ज़लः ९२
उम्र भर की सज़ा बन गई ज़िन्दगी
जाल में साज़िशों के फँसी ज़िन्दगी

कुंडली भी दिखा दी सभी को मगर
राहतों से बहुत दूर थी ज़िन्दगी

लड़खड़ाई जुबाँ सच को कहते हुए
झूठ के सामने यूँ डरी ज़िन्दगी

बेवफाई का अहसास उसको हुआ
मौत के रू-ब-रू जब हुई ािजन्दगी

चीख़ती ही रहीं उसकी ख़ामोशियाँ
अनसुनी ही मगर रह गयी ज़िन्दगी

कुछ दवा, कुछ दुआ का असर देखिये
मौत को यूँ छकाती रही जि़न्दगी
दिल से दिल तक/118
॰॰

ग़ज़लः९३
जख़्म दिल का है हर इक हरा आजकल
दर्दे-दिल अपनी हद से बढ़ा आजकल

बन गई है कुछ ऐसी फिज़ा आजकल
ज़ुल्म का है बढ़ा सिलसिला आजकल

तूफां आए गए चुप है साहिल मगर
खामशी में है सब-कुछ दबा आजकल

दिल के दीवारो-दर ज़ख़्म-आलूद हैं
सिसकियों का है मेला लगा आजकल

जान-पहचान का है भरोसा किसे
है नकाबों में सब कुछ छुपा आजकल

ठेस कैसे कहाँ, कब लगी क्या पता
दिल की टीसों से पूछा गया आजकल

मेरे सीने में कैसी ये हलचल मची
दिल में जैसे बवंडर मचा आजकल

आसमां की नज़र उसपे रहती है क्यों
है ज़मीं को ये ‘देवी’ गिला आजकल
दिल से दिल तक/119
॰॰

ग़ज़लः ९४

आये हो तुम यहाँ क्यों हाथों में लेके पत्थर
बस्ती है मुफ़लिसों की, शीशे के ये नहीं घर

पाबंदियाँ यहाँ है रस्मों-रिवायतों की
चलती हूँ इसलिये मैं तेरी डगर से हटकर

सहरा की धूप सर पर, तलुओं में भी हैं छाले
शिद्दत है तिश्नगी की, छलते सुराब उस पर

ज़िन्दा ज़मीर जिनका, डरते नहीं वो सच से
चलते हैं खोटे मन के, तो आइनों से बचकर

रहबर बिना किसी को मंज़िल कहाँ मिली है
हम कब से चल रहे हैं राहें बदल-बदल कर

महफ़िल में सबसे ‘देवी’ हँसकर मिली है लेकिन
तन्हाइयों में रोई ख़ुद से लिपट-लिपट कर
दिल से दिल तक/120
॰॰
ग़ज़लः ९५
ढब हैं अब तो ये मालदारों के
दुशमनों के हैं वो, न यारों के

उनके पास आके कशतियाँ डूबीं
कितने कस्से सुने किनारों के

क्या खिज़ाओं से दोस्ती कर ली ?
ढंग बदले हैं क्यों बहारों के

डोलियों की जगह है अब कारें
लद गये दिन वो अब कहारों के

किसपे कब, क्यों गिरें पता किसको
हौसले हैं जवाँ शरारों के

जंग बरबाद करके छोड़ेगी
गुलशन उजड़ेंगे अब बहारों के

कैसी दीमक लगी है रिश्तों को
रेजे ‘देवी’ हैं भाइचारों के
दिल से दिल तक/121
॰॰

ग़ज़लः ९६
ज़िन्दगी के चन्द लम्हे मैं चुरा कर आई हूँ
मौत को भी मीत मैं अपना बनाकर आई हूँ

सैकड़ों थे यूँ तो मुझको आपसे शिकवे-गिले
आपके इसरार पर सारे भुलाकर आई हूँ

ज़िन्दगी से जूझना मुश्किल हुआ इस दौर में
ख़ुदकुशी से ख़ुद को लेकिन मैं बचा कर आई हूँ

जुगनू यादों के तो कुछ रह रहके चमकेंगे ज़रूर
राह में फिर भी चराग़ इक मैं जला कर आई हूँ

गर्द चेहरे पर मिरे यूँ तो उदासी की जमी
सामने दुनिया के मैं कुछ मुस्करा कर आई हूँ

श्रद्धा और विश्वास के हैं फूल पूजा के लिए
उसके चरणों में ये सर ‘देवी’ झुका कर आई हूँ
दिल से दिल तक/122
॰॰
ग़ज़लः ९७
आँसुओं की कहकशां पर नाचती मुस्कान है
दीदनी है ये नज़ारा, क्या ख़ुदा की शान है

काँच का मेरा भी घर है पत्थरों के शहर में
उसपे आंच आये न कोई, उसका अब भगवान है

उसकी ख़ातिर हैं खुले, दिल के दरीचे आज भी
बीता कल, यादों के आँगन में मेरा मेहमान है

दर्द सांझा है सभीका, तेरे, मेरा, ग़ैर का
कौन ग़म से किसके ऐसा है कि जो अनजान है

खींचता है क्यों गुनाहों की हमें दलदल में फिर
दोस्त, पहले ही तेरा हम पर बड़ा अहसान है

कौन-सा डर है दिलों में, सहमे-सहमे हैं सभी
दम हैं सब साधे हुए, ख़तरे में सब की जान है

कड़वे सच की घूँट पीकर दिल हुआ ‘देवी’ धुआँ
ये घुटन दिल में दबा रखना कहाँ आसान है
दिल से दिल तक/123
॰॰

ग़ज़लः ९८
इल्म के नाम पर मैं धब्बा हूँ
छाप लो मुझको मैं अंगूठा हूँ

मैं पुराना हूँ इसलिये शायद
हर नये मोड़ पर अटकता हूँ

मैं तो झूठा गवाह हूँ यारो
झूठ को भी मैं कैश करता हूँ

अस्ल और सूद मुझको ले डूबे
सर से मैं पाँव तक ही डूबा हूँ

तन का कैदी, ग़ुलाम मन का मैं
ख़्वाहिशों से न अब भी छूटा हूँ

लोग कहते हैं धोख़ेबाज़ मुझे
झूठ पर सच का मैं मुलम्मा हूँ

दिन वो पहले से हैं कहाँ ‘देवी’
देखती मैं तो उनका सपना हूँ

दिल से दिल तक/124
॰॰
ग़ज़लः ९९
जीवन का है अर्थ अनोखा
इसको व्यर्थ गँवाते क्यो हो ?

छाया घनी है जीवन-वट की
धूप में ख़ुद को तपाते क्यों हो ?

देखो ऋतु वासंती आई
पतझड़ इसको बनाते क्यों हो ?

सुलझी हुई इस डोर को फिर से
नादानो, उलझाते क्यों हो ?

देह विदेह के अंतरमन में
गहरा अंधेरा लाते क्यों हो ?

रचना की इस सुंदरता में
शब्द असुंदर लाते क्यों हो ?

कोयल कुहु कुहु तान सुनाती
लोगो शोर मचाते क्यों हो ?
दिल से दिल तक/125
॰॰

ग़ज़लः १००

आईने पे पड़ी जो नज़र, हम तो रो पड़े
बिगड़ा हुआ था अक्स मगर, हम तो रो पड़े

सौदा किया तो दाँव पे ख़ुद को ही रख दिया
तुमने न छोड़ी कोई कसर, हम तो रो पड़े

ठहराव की तलाश में भटका किये बहुत
अब ज़िन्दगी गई जो ठहर, हम तो रो पड़े

ख़ुद ही ख़ुदा से मांगते, मिलते ख़ुदा अगर
ढूँढ से भी मिले न मगर, हम तो रो पड़े

दी दस्तकें हज़ार, पुकारा किये मगर
उस पर हुआ न कुछ भी असर, हम तो रो पड़े

‘देवी’ गया वो छोड़ के इक ऐसे मोड़ पर
सूझा न हमको जायें किधर, हम तो रो पड़े
दिल से दिल तक/126
॰॰
ग़ज़लः १०१
तुमको बसा लूँ दिल में, हसरत ये पल रही है
इक मेरी बेबसी है जो हाथ मल रही है

रिश्तों की ज़िन्दगी में बदलाव ऐसा आया
लगता है जैसे मेरी हस्ती बदल रही है

मुझको गिरा रही है लोगों की बद-निगाही
तुम मिल गए तो मेरी दुनिया सँभल रही है

यह आग की नदी है जलना तो है मुकद्दर
लेकिन ख़ुदा भरोस ये नाव चल रही है

तूफां भी आए तो कुछ चिंता नहीं है उसकी
मौजों से खेलने को, कश्ती मचल रही है

इक मात खाके नालां, इक जीत कर है शादां
हसरत यूँ अपने ‘देवी’ तेवर बदल रही है
दिल से दिल तक/127
॰॰

ग़ज़लः १०२
आलम में गूँजता हुआ तेरा ही नाम है
तेरे बग़ैर सारा ही किस्सा तमाम है

दोनों हैं ख़ाली हाथ मेरे तेरे सामने
कुछ तो बता इलाही ये कैसा मकाम है

सूरज ने की है धूप तो, आकाश ने घटा
हम ख़ूब जानते हैं ये, तेरा ही काम है

ये दर्दो-ग़म से हमको भरा ज़हर दे दिया
हमने ख़ुशी से इसको पिया तेरा जाम है

झूठा जगत है सारा फकत साँचा एक तू
तेरे अनेक नाम मगर तू अनाम है

इन्सानियत को ताक पे रख कर ये, किस लिये
झगड़ा कोई तो ‘देवी’ यहाँ सुबहो-शाम है
दिल से दिल तक/128
॰॰
ग़ज़लः १०३
मन को भाती थीं जो सावन की फुहारों की तरह
अब तो यादें हैं कि चुभती हैं वो ख़ारों की तरह

दूरियाँ हममें कभी थीं जो दरारों की तरह
फैल कर दूर हुई हैं वो किनारों की तरह

लुत्फ मौसम का उन्हें आये तो आए कैसे
अब्रे-ग़म आग जो बरसाये शरारों की तरह

मुझसे मिलता है वो धरती से फलक की मानिंद
तो कभी फासले रखता है सितारों की तरह

भर दिये ज़ख़्म सभी वक्त ने यूँ तो लेकिन
दाग़ अब तक मेरे दिल में हैं मज़ारों की तरह

पढ़ चुका चाहे हज़ारों ही किताबें इंसां
है सुलूक आज भी उसका तो गंवारों की तरह

बेसहारा न कभी फिर तो मैं रहती ‘देवी’
वो सहारा मुझे देता जो सहारों की तरह
दिल से दिल तक/129
॰॰

ग़ज़लः १०४

रहे जो ज़िन्दगी भर साथ ऐसा हमसफ़र देना
मिले चाहत को चाहत वो दुआओं में असर देना

हमें पहुँचाये मंज़िल तक, कोई ऐसी डगर देना
जो तपती धूप में साया घना दे, वो शजर देना

ख़ुदाया, अपने दिल का हाल मैं जिसको सुना पाऊँ
मेरी मजबूरियाँ समझे, मुझे वो इक बशर देना

मकां से लामकां तक का सफ़र सदियों से है जारी
रिहाइश के लिए अब तो, ज़मीं पर एक घर देना

छिपा है तेरा जलवा जो फरेबों के धुंधलकों में
उन्हें मैं चीर कर रख दूँ, मुझे पैनी नज़र देना

अगर हों मुशकिलें तो साथ उसके राहतें भी हों
अंधेरी हों अगर रातें, तो उजली हर सहर देना
दिल से दिल तक/130
॰॰
ग़ज़लः १०५
सफर सूए-मंज़िल चला रफ़्ता-रफ़्ता
हर इक मरहला तय हुआ रफ़्ता-रफ़्ता

छुटी रफ़्ता-रफ़्ता ही पीने की आदत
बना रिंद भी बाख़ुदा रफ़्ता-रफ़्ता

ज़माने में क्या क्या न सरगोशियाँ थीं
मगर राज़ उनका खुला रफ़्ता-रफ़्ता

हटी गर्द आईन-ए-दिल से जब भी
तो सब सामने आ गया रफ़्ता-रफ़्ता

ख़ुशी हो कि ग़म आते जाते हैं ‘देवी’
चला है यही सिलसिला रफ़्ता-रफ़्ता
दिल से दिल तक/131
॰॰

ग़ज़लः१०६
मात खाकर ज़िन्दगी होगी बसर सोचा न था
ज़हर पी पी कर ही बस होगी गुज़र सोचा न था

क़ाफ़िले का शोर लेकर साथ निकली थी, मगर
ख़ामुशी में तय मेरा होगा सफर सोचा न था

ख़ून आँखों से बहेगा यूँ किसी की याद में
बद्दुआ का इस क़दर होगा असर सोचा न था

शम्अ के जलने की, बुझने की रवायत है, मगर
दिल जलेगा यूँ मेरा शामो-सहर सोचा न था

मैने तो बाँटा था अमृत हर किसी को शौक से
ज़हर वो मुझको पिलायेगा मगर सोचा न था

हम ज़रा हंस-हंस के बोले थे सितारों से मगर
चाँद को होगी जलन ये देखकर, सोचा न था
दिल से दिल तक/132
॰॰

ग़ज़लः१०७
सहरा भी गुलज़ार भी तो हैं
साथ गुलों के ख़ार भी तो हैं

मन को मोहे मस्ती रौनक
संग उनके आज़ार भी तो हैं

क्यों लगती है दुनिया दुश्मन
दोस्त कई दिलदार भी तो हैं

कश्ती साहिल पर आ ठहरी
तूफाँ के आसार भी तो हैं

होंठ हिले बिन बातें होतीं
ऐसे ख़ुश-गुफ्तार भी तो हैं

चलकर भी तय कर नहीं पाते
अहिस्ता-रफ़्तार भी तो हैं

ख़ुशियों की न कमी है ‘देवी’
चिंता के अंबार भी तो हैं
दिल से दिल तक/133
॰॰

ग़ज़लः १०८
उसीसे रूबरू मैं हो रहा हूँ
वो जिसके साए से घबरा गया हूँ

है क़द ऊँचा तुम्हारा जानता हूँ
भले ही उम्र में तुमसे बड़ा हूँ

निवाला जब भी छीना गुरबतों ने
मैं तब से भूख से लड़ता रहा हूँ

है मिलने की बिछड़ने की रवायत
हक़ीक़त से मैं वाकिफ़ हो रहा हूँ

कहाँ संभाल कर रक्खूं उम्मीदें
दिवारो-दर को तकता जा रहा हूँ
दिल से दिल तक/134
॰॰
ग़ज़लः १०९
अब कहाँ ईमान का कुछ दाम है
रिश्वतों का बोलबाला आम है

दुश्मनों को दोस्त समझे इसलिये
ज़ख़्म ही इस भूल का अंजाम है

दोस्त जाने अब कहाँ गुम हो गए
दोस्ती का रह गया अब नाम है

आस की मद्धम-सी लौ जलती है जो
उससे ही रौशन मिरी हर शाम है

रोज़ उसको चूमते रहते हैं हम
जिस हथेली पर सजन का नाम है

राहतें ‘देवी’ ने ठुकराई है बहुत
मुश्किलों ही मुशकिलों से काम है

दिल से दिल तक/135
॰॰

ग़ज़लः ११०

कोई भी सूरत नहीं उनको भुलाने के लिए
दिल में बस जाते है चेहरे याद आने के लिए

अश्क आँखों से छलक कर, कर गये सब कुछ बयां
क्या करे कोशिश भी कोई, ग़म छुपाने के लिए

ठूँठ है चारों तरफ मिलते नहीं तिनके कहीं
हर परिन्दा है परेशां घर बनाने के लिए

मुस्कराकर यूँ न इतराओ बहारों में गुलो
आने वाली है खिज़ां खिल्ली उड़ाने के लिए

जोशे उलफ़त में ये परवाना समझ पाता नहीं
शम्अ जलती है फ़क़त उसको जलाने के लिए

दिल शिक्सता धड़कनों में चाल है बहकी हुई
जिस्म का साबित मकां है बस दिखाने के लिये

हाए वो कातिल-अदा जो चुभ गई है आँख में
होंठ है बेचैन देवी मुस्कराने के लिए
दिल से दिल तक/136
॰॰

ग़ज़लः १११
है कशिश कितनी आबो दानों में
जोश भरती है जो उड़ानों में

शहर की हर सड़क सलामत है
छुप रही दहशतें मक़ानों में

मंज़िलों तक पहुंच न पाएंगे
जो कि बैठे है सायबानों में

हमको फुसलाओगे भला कब तक
रखके सच्चाई तुम बहानों में

होके मायूस रब के दर से हम
आ गए अब शराब खानों में

हम भी नादां नहीं रहे ‘देवी’
बैठते अब है हम सयानों में
दिल से दिल तक/137
॰॰
ग़ज़लः ११२
न जाने रोज़ कितनी बेबसी बर्दाश्त करते हैं
अगर सच पूछिये तो ज़िन्दगी बर्दाश्त करते हैं

किसीको क्या ख़बर जो हमपे गुज़री है मुहब्बत में
लहू के घूंट पीकर आशिकी बर्दाश्त करते हैं

ग़मों के मौसमों में चांद भी कितना अखरता है
कि रखकर दिल पे पत्थर चांदनी बर्दाश्त करते है

बड़े बेबस परिंदे हैं कि उनके पर कतरने पर
सितमरानी भी ये सैयाद की बर्दाश्त करते हैं

सुख़न फहमो का मैं एहसान कैसे भूलती ‘देवी’
जो मेरी बेतुकी-सी शाइरी बर्दाश्त करते हैं
दिल से दिल तक/138
॰॰

ग़ज़लः ११३
हादसों के हैं मुकाबिल हौसले
किस पे किस का देखना है बस चले

मौत के रहमो-करम पर ज़िन्दगी
शम्अ के मानिंद ही तिल-तिल वो जले

क्या इनायत दोस्तों की कम रही
दुश्मन उनसे भी कहीं बढ़ कर मिले

आपसी रिश्तों में जो आये दरार
नींव ही फिर क्यों न उस घर की हिले

उसके मेरे बीच में आई ख़ुदी
बीच में वर्ना कहाँ थे फासले

हाथ मलती रह गईं आबादियाँ
चल पड़े बरबादियों के सिलसिले

आँखें तो ‘देवी’ हैं दिल का आईना
खोलते हैं राज़, आँसू मनचले
दिल से दिल तक/139
॰॰

ग़ज़लः ११४
तमन्ना ख़ाक होकर जब उड़ेगी
तो दिल को चैन भी क्या ख़ाक देगी

सुनारों की हों चोंटे भी हज़ारों
लुहारो की न चोटों से बचेगी

भले रफ्तार कितनी भी बढ़ा लें
फकत दो गज़ जमीं उनको मिलेगी

सुनो जो ध्यान से खामोशियों को
जुबां गूंगो की भाषा पा सकेगी

फरेबों ने हिला दी नींव जिसकी
यकीं पर क्या इमारत वो टिकेगी

बनेगी सीप में मोती यकीनन
रवानी आसुओं की जब थमेगी

जो पलड़ा झूठ का भारी हो ‘देवी’
सदाकत थर थरा कर काँप उठेगी
दिल से दिल तक/140
॰॰

ग़ज़लः ११५
बिछड़े हैं उन्हें ढूँढें कैसे
पहचान ही जिनकी खो बैठे

ख़ामोश मुहब्बत के पंछी
बोलें भी तो वो बोलें कैसे

क्या नींद ख़रीदी जाती है
क्या भूख दिलाती है पैसे

रोटी की तलब हो दे रोटी
हो प्यास अगर तो पानी दे

ग़ुरबत है शराफ़त का ज़ेवर
वो आज कलंक हुआ कैसे

बारिश में मचलती है बिजली
अल्हड़ आशा नाचे जैसे

‘देवी’ इक बोझ हूँ मैं ख़ुद पर
कोई और उठाये भी कैसे
दिल से दिल तक/141
॰॰

ग़ज़लः ११६

दिल जलाने की, दिल दुखाने की
ये तो फ़ितरत है इस ज़माने की

दिल के तहख़ाने में मची हलचल
जो ख़बर आई उसके आने की

जैसे बिजली गिरी मेरे दिल पर
याद जब आई आशियाने की

दोस्त दुश्मन बने हैं पल भर में
नौबत आई जो आज़माने की

मिट गए सारे नक़्श यादों के
अब तो आदत हुई भुलाने की

कितनी वीरानियां हुई आबाद
जब हिली नींव इक घराने की

चहरा पढ़ना भी ‘देवी’ आता है
कुछ ज़रूरत नहीं बताने की
दिल से दिल तक/142
॰॰
ग़ज़लः ११७
न करना सोग या मातम, न मेरी मौत पर रोना
मनाना तुम न हर्गिज़ ग़म, न मेरी मौत पर रोना

छलक पड़ते हैं ये आँसू, न जाने कब कहां कैसे
मगर करना न आँखें नम, न मेरी मौत पर रोना

सजाओ तुम भले अर्थी, उठाओ चाहे कांधो पर
न पसरे सोग का आलम, न मेरी मौत पर रोना

ज़माना आएगा सारा जनाज़ा देखने मेरा
हो दुश्मन, या मिरा हमदम, न मेरी मौत पर रोना

फिज़ा ग़मगीन मत करना, न दिल पर बोझ रखना कुछ
सुरीली छेड़ना सरगम, न मेरी मौत पर रोना

न ठंडी आह तक भरना, न ग़म का ‘देवी’ ग़म करना
रहो ख़ुशहाल तुम हरदम, न मेरी मौत पर रोना
दिल से दिल तक/143
॰॰
ग़ज़लः ११८
मेरे वतन की ऐ हवा, आएगी कब ये तो बता
चंदन-सी लेकर खुशबू आ, आएगी कब ये तो बता

करती नहीं कुछ भी असर, हर इक दवा है बेअसर
छूकर उन्हें देने शिफ़ा, आएगी कब ये तो बता

आँखों में हैं सपने जगे, ऐ शम्अ, तू रोशन रहे
दिल में जलाने इक दिया, आएगी कब ये तो बता

कल-कल बहे नदिया-सी तू, फिर भी रही है तिश्नगी
गागर से अपनी जल पिला, आएगी कब ये तो बता

चुनरी दबा होठों तले, तेरे अधर हंसते रहे
ऐ शोख़-चंचल-सी सबा, आएगी कब ये तो बता

‘देवी’ के दिल में जो बसी, साँसों में वो रच बस गई
तुझको है उसका वास्ता, आएगी कब ये तो बता
दिल से दिल तक/144
॰॰

नाम: देवी नागरानी
परिचय
जन्मः ११ मई, १९४१, कराची, जन्म (तब भारत)
शिक्षाः बी.ए. अलीं चाइल्ड, न्यूजर्सी
सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यूजर्सी, यू.एस.ए.
पति का नाम: भोजराज नागरानी, माँ का नाम; हरी लालवानी । पिता का नाम: किशिन चंद लालवानी, शिक्षाः स्नातक, मातृभाषाः सिंधी, सम्प्रतिः शिक्षिका, न्यू जर्सी.यू.एस.ए(अब रिटायर्ड), भाषाज्ञान: हिन्दी, सिन्धी, उर्दू, मराठी, अँग्रेजी, तेलुगू प्रकाशित कृतियाँ:
कृतियाँ ...
१) ग़म में भीगी ख़ुशी (पहला सिंधी ग़ज़ल-संग्रह, २००४)
२) चराग़े-दिल (पहला हिन्दी ग़ज़ल-संग्रह, २००७)
३) उड़ जा पंछी (सिंधी भजनावली, २००७)
४) आस की शम्अ (सिंधी ग़ज़ल-संग्रह, २००८)
५) दिल से दिल तक (हिंदी ग़ज़ल-संग्रह, २००८)
६) सिंध जी आऊँ जाई आह्याँ (सिंधी काव्य-संग्रह, Karachi-2009)
७) The Journey (English Poetry-2009)
८) लौ दर्दे-दिल की (हिंदी ग़ज़ल-संग्रह, २०१०)
९) भजन-महिमा (भजन संग्रह-२०१२)
१० ) ग़ज़ल (सिंधी ग़ज़ल-संग्रह-२०१२)
11) और मैं बड़ी हो गयी- (सिन्धी से हिन्दी में अनुवाद-कहानी संग्रह(2012),
12) बारिश की दुआ- (हिन्दी से सिंधी में अनुवाद-कहानी संग्रह (2012)
13)अपनी धरती (अरबी सिंधी में हिन्दी कहानिकरों की अनूदित कहानियाँ-2013)
14) माई-बाप और कहानियाँ (सिंधी से हिन्दी में अनुदित कहानी संग्रह-2013 ess)
15)सिन्ध की सिन्धी कहानियां ((सिंधी से हिन्दी में अनुदित कहानी-संग्रह-2014–in press)
प्रसारणः कवि-सम्मेलन, मुशायरों में भाग लेने के सिवा नेट पर भी अभिरुचि. कई कहानियाँ, गज़लें, गीत आदि राष्ट्रीय व अंतराष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित। समय समय पर आकाशवाणी मुंबई से हिंदी, सिंधी काव्य, ग़ज़ल का पाठ. राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं -महाराष्ट्र, दिल्ली, सिंधी राजस्थानी अकादेमी, रायपुर, जोधपुर, हैदराबाद, तमिलनाडू एवं अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं (NJ, NY, Oslo) द्वारा निमंत्रित एवं सम्मानित
यह ज़िंदगी लगी है, हक़ीक़त, कभी तो ख्वाब
वह सामने मेरे खुली, जैसे कोई किताब
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