कबीर पंथी संत अमर दास साहब--- डाॅ0 हरिश्चन्द्र शाक्य

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कबीर पंथी संत अमर दास साहब--- डाॅ0 हरिश्चन्द्र शाक्य

Post by admin » Mon Nov 05, 2018 10:45 am

आलेख
कबीर पंथी संत अमर दास साहब






हमारे देष भारतवर्श में संतों का विषेश स्थान रहा है। उन्होने अपनी साधना द्वारा अपना स्वयं का कल्याण तो किया ही है साथ ही साथ समाज व राश्ट्र को भी कल्याणकारी मार्ग दिखाया है। गौतम बुद्ध, कबीर, नानक, रैदास, दादू, पलटू, मलूक दास, तुकाराम, सूर, तुलसी, मीरा, नामदेव, विवेकानन्द व भदंत आनंद कौषल्यायन जैसे संतों ने यहाँ जन्म लिया है। इन संतों ने अपनी साधना से अमरत्व प्राप्त किया है। विष्व पटल पर हम देखें तो ईसा मसीह, यूहन्ना, मत्ती, मरकुस, लूका, मोहम्मद साहब, अरस्तू, प्लेटो, सुकरात, फाहियान व ह्वेनसांग आदि संत ही हैं जिन्होने विष्व को मानवता का पाठ पढ़ाया और अमरत्व प्राप्त किया। ऐसे ही सच्चे साधक संत हैं उत्तर प्रदेष के मैनपुरी जनपद में निवास कर रहे संत अमर दास साहब।
संत अमर दास साहब सहजता, सरलता व सादगी की प्रतिमूर्ति, ज्ञान के अथाह भंडार, अहंकार से रहित, त्यागी, तपस्वी व साधक संत हैं। आपका जन्म एटा जनपद के गही (गहाई) नामक गाँव में हुआ था। आपके माता-पिता ने आपको अमर सिंह नाम दिया था। आप बचपन से ही सद्गुरु साहब कबीर के दर्षन से प्रभावित रहे और कबीरपंथी संत हो गये। संत होने के उपरान्त आपका नाम अमर दास साहब हो गया। महात्मा कबीर जैसा आभामंडल अमर दास साहब के चेहरे पर झलकता प्रतीत होता है। अनेक संत महात्माओं ने अपनी वाणी को अमरत्व प्रदान करने हेतु लेखनी का सहारा लिया है। संत अमर दास साहब भी ऐसे ही एक संत हैं जो आध्यात्मिक साधक होने के साथ-साथ वाणी के भी साधक हैं। आपने लेखन की गद्य व पद्य दोनों ही विधाओं में अपनी लेखनी चलाई है। आपकी गद्य व पद्य विधाओं में अब तक चैदह पुस्तकें प्रकाषित हो चुकी हैं जिनके नाम क्रमषः आत्म जागृति षतक, सद्गुरु कबीर चालीसा, सद्ज्ञान कुण्डलियां, मानवता पारख पद भजनावली, जागृति के क्षण, मुक्ति की ओर, कबीर परिचय, मन की आँखें, सहज ध्यान योग, सहज ध्यान की झलक, आया है जायेगा, तेरा साईं तुझ में, षांति सागर, व्यवहारिक ध्यान है।
संत अमर दास साहब रज्जोदेवी कबीर आश्रम मैनपुरी के महंत हैं तथा वृद्ध संत सेवा आश्रम कबीर कुटी गही (गहाई) जिला एटा से भी सम्बद्ध हैं। वरिश्ठ कवि डाॅ0 दीन मोहम्मद ‘दीन‘ ने महंत अमर दास साहब के बारे में लिखा है ‘‘परम संत अमर साहब अपने कबीर आश्रम में प्रत्येक रविवार को सत्संग का आयोजन करते चले आ रहे हैं। इसमें मैनपुरी ही नहीं अन्य जनपदों यदा एटा, इटावा, फर्रूखाबाद, कन्नौज आदि जनपदों के भक्त गण सम्मिलित होते रहते हैं। अमर दास साहब एक त्यागी-तपी, साधक संत हैं उनकी सहजता, सरलता तथा सादगी, एक महान संत का स्वयं प्रमाण देती है। व्यक्ति नहीं व्यक्ति का आचरण स्वयं बोलता है और वह सद्भावना एवं सदाचरण अमर दास साहब में निहित है। उनके प्रेम-कृपा और स्नेहिल भाव वर्शा से मेरा तन-मन अभिसिंचित एवं अभिभूत हुआ है।‘‘
संत अमर दास साहब की वाणी मानव मात्र के लिए कल्याणी है। वे संसार को दुखालय बताते हुए दुख में से सुख खोजने का मार्ग बताते हैं। उन्होने लिखा है- ‘‘जिस प्रकार संसार का दूसरा नाम दुखालय है उसी प्रकार ये षरीर भी सूक्ष्म संसार है और ये दुख, बीमारी, जन्म-मरण का घर है। अगर इस दुख में से सुख बनाना है तो इस षरीर-मन को हम भक्ति, आत्मा-परमात्मा, सत्य, मुक्ति, कल्याण जोड़ दें तो ये दुख, षरीर बंधन से मुक्त कल्याण के सुख को बनाना समझेंगे। असत्य संसार की तरफ लगाने से दुःख बंधन बनेगा और सत्य आत्मा-परमात्मा में लगाने से मुक्ति बनेगी।‘‘ (षांति सागर पृश्ठ 14)
सत्य क्या है? सच्ची भक्ति क्या है? तथा मानवता धर्म क्या है? यह सब बताते हुए संत अमर साहब ने लिखा है ‘‘सत्य के साथ सच्चा मानव, सच्चा संत ही रह सकता है क्योंकि सत्य में ढ़ाई अक्षर हैं, इसलिए असत्य, अधर्म का बहुमत है, सत्य का एक मत है। षरीर असत्य है। इसमें पाँच तत्व, पच्चीस प्रकृति, दस इंद्री, एक सौ आठ हड्डियाँ, बहत्तर हजार नाड़ियाँ, हजारों छोटे-छोटे अवयव ये सब बहुमत की चीजें हैं लेकिन एक आत्मा के निकल जाने पर ये बहुमत बेकार हो जाता है। सत्य के प्रति प्रेम ही सच्ची भक्ति, मानवता धर्म एवं मानव जीवन का कर्तव्य है। (षांति सागर पृश्ठ 12)
अंतःकरण की षांति हेतु हमें क्या करना चाहिए यह बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है ‘‘ अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाष की आवष्यकता है, रात्रि को दूर करने के लिए सूर्य की आवष्यकता है। ऐसे ही अपने अंतःकरण की आग षांत करने के लिए जो षांत पुरूश कामना रहित हो जिनका मन मस्तिश्क षांत हो, वाणी मधुर हो, षांत पथ के पथिक हों, ऐसे परम दयालु, षांत अंतःकरण षीतल जल के समान ही सारी कामनाओं की आग को षांत कर देंगे।‘‘ (षांति सागर पृश्ठ 24)
मानवता धर्म क्या है तथा सच्चा संत कौन है यह बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है ‘‘मनुश्य में यदि मनुश्यता आ जाये तो वास्तव में वही मनुश्य है। मानवता रूपी आभूशण को धारण करने के लिए सद्गुणयुक्त जीवन बनाना होगा तभी उसके मनुश्य जीवन पाने की सार्थकता हो सकती है। जीवन में सद्गुणों का उद्धाटन दुर्गुणों का पतन होना ही मानवता की असली पराकाश्ठाा है। मानवतायुक्त व्यक्ति ही सच्चा संत है, सद्गुरू है। जिसके जीवन में तप, सेवा, सुमिरन की त्रिवेणी धारा बहती है उसका जीवन धन्य हो जाता है। तप से हमारे कर्मों की षुद्धि होकर षांति प्राप्त होती है।‘‘ (षांति सागर पृश्ठ 25)
सच्चा ध्यान और सच्ची समाधि क्या है? यह बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है ‘‘जिस क्षण हमारा मन वासनाओं से रिक्त (खाली) होता है ऐसे समय में हमारा मन सुमन बन जाता है तथा हमारे मन का अहंकार किसी प्रतिकूलता से हार जाता हैै तो ऐसे हार और सुमन को लेकर जब हम अपने इश्ट सद्गुरू के पास समर्पण भाव से पहुँचते हैं तो वहीं हमारा मन नमन हो जाता है। नमन से सच्चा ध्यान, सच्ची समाधि है। जहाँ पर षाष्वत धर्म, षाष्वत पूजा, षाष्वत ध्यान साधना प्रकट हो जाती है हमारा हृदय प्रेम से आप्लावित हो जाता है फिर हर प्राणी में ईष्वर, खुदा, परमात्मा का दर्षन होने लगता है।‘‘ (व्यवहारिक ध्यान पृश्ठ 2)
भजन क्या है? यह बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है ‘‘ हमारे षरीर को षिषु अवस्था, किषोर, जवानी, अधेड़ एवं बुढ़ापा ये क्रमषः सब छूट जाते हैं क्योंकि ये सब बाहर से मिले और सब छूटे। अंदर का न छूटने वाला अमृत स्वरूप, सत्य स्वरूप जो तीन काल में कभी नहीं छूटता उसी का स्मरण भजन है और उसी की स्थिति में रहना ध्यान है।‘‘ (व्यवहारिक ध्यान पृश्ठ 17)
भय, अषांति और दुःख का कारण बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है ‘‘हम अविनाषी चेतन हैं, हमारा कभी नाष नहीं होता है। हमने जितनी षरीर की आसक्ति बना ली है यह कमारे भय, अषांति और दुःख का कारण है। देह की आसक्ति छोड़ते रहें, बस सुखी, षांत होते चले जाएँगे।‘‘ (व्यवहारिक ध्यान पृश्ठ 15)
सहज ध्यान योग के बारे में संत अमर दास साहब लिखते हैं ‘‘ सहज ध्यान के द्वारा सहज जीवन आ सकता है या यों कहें सहज जीवन के द्वारा सहज ध्यान होता है। ध्यान में होते हैं, ध्यान किया नहीं जा सकता है जैसे दुख में होना, धन में होना, पद में होना, हानि में लाभ में होना, अनुकूलता-प्रतिकूलता में होना। जब क्रोध में होते हैं, काम में होते है तब भूल जाते है स्व को। पर में इतने तल्लीन होते हैं कि अपनी स्व की स्थिति, अनुपस्थिति जैसी लगती है। ध्याता जब तक कत्र्ता भाव के राग में है तब तक (पर) संसार में फँसा रहेगा। ध्याता न की स्थिति में आते ही ध्यान में आ जावेगा।‘‘ (सहज ध्यान योग पृश्ठ 18)
चित्त की निर्मलता को समझाते हुए संत अमर दास साहब लिखते हैं ‘‘हम अपने लक्ष्य को चित्त की निर्मलता की तरफ लायें ंतब अनुभव होगा कि हमारे मन में कितना तनाव, खिंचाव, बेचैनी, अषांति है। हमारे पास भौतिक सभी साधन उपलब्ध हों, प्रचुर मात्रा में धन हो, पद हो तब भी हम दुखी, अषांत रहते है। इनका अभाव हो तब भी दुख है। मन का ये संताप तीन काल में छूट नहीं सकता जब तक हम इनके कारण को न समझ लें। इस त्रय ताप भव रोग का कारण मनोविकार ही है। जितने अंष में मन निर्मल रहता है, जीवन में निर्मलता की गंगा बहती है उतना ही चित्त राग द्वेश से विमुक्त हो प्रेम, करुणा, समता, संतोश से आप्लावित होकर चिर स्थाई षांति में प्रवेष हो जाता है और हम सुख-दुख से परे परम पद पर आसीन हो जाते हैं।‘‘ (सहज ध्यान योग पृश्ठ 18-19)
हमारा मन अषांत क्यों है उसमें बेचैनी क्यों है? इस सम्बन्ध में प्रकाष डालते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है, ‘‘ बिना कारण कोई कार्य नहीं होता। जितनी ही अषांति, बेचैनी है उसके पीछे कारण है मन का विकारी होना। हमारा मन जितना निर्मल, निर्विकारी, स्वच्छ और सुमन होगा उतनी ही षांति, चैन, करूणा, समता का साम्राज्य हमारे जीवन में होगा। करुणा, समता, षांति को व्यवहारिक जीवन में अन्तरदृश्टि सहज ध्यान भी कहते हैं। (सहज ध्यान योग पृश्ठ 27)
ध्यान की अवस्था क्या है? यह बताते हुए संत अमर दास साहब ने लिखा है, ‘‘जो इंद्रियाँ मन के निर्देषन से चलतीं हैं वे सब बहिर्मुख बनाती हैं जो अंग स्वचालित हैं। वहीं अंतर्मुखता में कार्य करते हुए अक्रिया जैसे रहते हैं कोई संस्कार निर्मित नहीं करते जैसे हृदय, फेंफड़े। बहिर्मुख इंद्रियाँ अगर अंग-भंग होती हैं तो जीवन चल भी जाता है, अंतर्मुख हृदय, फेंफड़े खराब होने से जीवन कठिन हो जाता है। अतः फेंफड़ों की ष्वांस-प्रष्वांस, हृदय की संवेदनाएँ इन पर मन टिकाना, केंद्रित होना ध्यान की प्रथम अवस्था है।‘‘ (सहज ध्यान योग पृश्ठ 28)
संत अमर दास साहब लेखक ही नहीं अपितु एक साधक कवि भी हैं। उनके हृदय से जो काव्यधारा फूटी है वह भक्तिकाल की ज्ञानाश्रयी षाखा के प्रवर्तक कवि सद्गुरु कबीर साहब की भाँति ही है। सत्यता को खोजने के भटकाव में उन्होने कितना सुंदर भजन लिखा है-
जीवन अपना मोड़कर, किधर लगाऊँ मैं।
सत्य षाष्वत कौन है, कैसे पाऊँ मैं।
1. धर्म षरण की सोची जबसे, लाखों पथ अपनाये।
ना जानू मैं सत्य कौन है, बड़े लोग भरमाये।
पथ प्रदर्षक कौन है, अब किसे बनाऊँ मैं।।
2. मेरे पथ के रोड़े अब तो, मजहब ही लख पड़ते ।
मेरा पथ मुक्ति का दाता, कह कर के सब लड़ते।
मर्म षाष्वत धर्म का, कैसे पाऊँ मैं।।
3. इधर-उधर तीर्थों में जाकर कितने भटका खाये।
सभी ओर से थक कर बैठे, तब तक मुझे जगाये।
प्यार से बोले कौन हो, अब क्या बताऊँ मैं।।
4. मैंने ऊपर को जब देखा, निर्मल संत को पाये।
पारख ध्वजा हाथ में जिनके, प्यार सिंधु लहराये।
समता उनकी कौन है, ना विसराऊँ मैं।।
5. विवेक ज्ञान के दाता गुरुवर, स्वदर्षन करवाये।
पारख बूटी हृदय में रख, आत्म स्थिति पाये।
‘अमर‘ पारखी सद्गुरु की, जय-जय गाऊँ मैं।।
(मानवता पारख पद भजनावली पृश्ठ 49-50)

संत अमर दास साहब कर्म को भगवान मानते हैं। उनके एक भजन में कर्म की महिमा दृश्टव्य है-
आओं षक्ती तुम्हें दिखायें कर्म देव भगवान की।
सत्य षाष्वत धर्म मिलेगा, षरण सद्गुरू ज्ञान की।
1. मेरा पथ तो कर्म पंथ है, जिस पर हम सब खड़े हुए।
भूली डगर अनादि राह पर, राही बनकर अड़े हुए।
सबल कर्म की महिमा बु़द्धी, क्या जाने नादान की।।
2. पाप कर्म पापी के पीछे, दुख दारुण बन खड़े हुए।
ईष भरोसे क्यों अब बैठे सुगति कर्म जब बन किए।
कर्म सबल और ईष निबल है, षाष्वत सत्य विधान की।।
(मानवता पारख परख पद भजनावली पृश्ठ 53)

संत अमर दास साहब ने मानव मात्र को अंध विष्वास से दूर रहने को कहा है। उनके एक भजन में यह भाव देखें-
पाखंडों के मिथ्या जाल में, मत भटक दिवाने बन्दे।।
1. वैदिक युग में जल, थल पावक और पवन को देव बताया।
जड़ तत्वों को खुष करने में, पषुओं को काट चढ़ाया।
बध करके मूक प्राणियों का और मोक्ष मानते बन्दे।।
2. खानी, पीनी, बीड़ी, सिगरेट और सुरापान करते हैं।
पेट को कब्रिस्तान बना, मुर्दों का सेवन करते हैं।
मानव मे छुति लगा कर के और सबसे श्रेश्ठ बनेंगे।
(मानवता पारख परख पद भजनावली पृश्ठ 40)

अंत में निश्कर्शतः हम कह सकते हैं कि संत अमर दास साहब एक सच्चे साधक संत हैं जिनसे समाज व राश्ट्र को निरंतर प्रेरणा मिल रही है। उनकी अमृतमयी वाणी युगों-युगों तक जन-मानस का कल्याण करती रहेगी ऐसा मेरा विष्वास है। श्री दिनेष सक्सेना ने संत अमर दास साहब के बारे में सच ही लिखा है ‘‘ संत श्री अमर दास साहेब पूज्य संत हैं जिनके दर्षन मात्र से षान्ति मिलती है। उनका सादा व तपस्वी जीवन रहा है। जाति-पाँति मजहब सम्प्रदाय आदि से अलग हटकर जीव को मानव बनाने की दिषा में सतत प्रयत्नषील हैं।‘‘ संत अमर दास साहब के चरण चिह्नों पर चलकर निष्चय ही भक्तजनों को कल्याणकारी मार्ग मिलेगा और उसका लोक परलोक सुधरेगा।
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