वात्सल्य रस के कवि सूर---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post Reply
User avatar
admin
Site Admin
Posts: 21569
Joined: Wed Nov 16, 2011 9:23 am
Contact:

वात्सल्य रस के कवि सूर---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Tue Dec 04, 2018 3:02 pm

वात्सल्य रस के कवि सूर---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Image

काव्य-कला और प्रेम की व्यंजना में सूर के समक्ष कोई नहीं ठहरता । तुलसीदास, कवि के साथ धर्मोपदेशक भी थे ; वे लोक कल्याण और समाज निर्माण की भावना से प्रेरित होकर काव्य लिखा करते थे तथा वर्णाश्रम की मर्यादा की रक्षा के लिए चिंतित थे । वहीं सूरदास न तो नीतिवक्ता थे, न ही सूक्तिकार और न ही धर्मोपदेष्टा थे, न ही लोक मर्यादा के रक्षक; वे तो आकंठ प्रेमरस में डूबे हुए एक कवि थे । कृष्ण भक्ति की स्तुति वंदना के उद्देश्य से ही वे कवि-कर्म में प्रवृत हुए । तुलसी और सूर दोनों ही भक्ति-पथ के कवि थे । अंतर सिर्फ़ इतना था कि सूर मात्र सुंदरतम के कवि थे । विष्णु के कृष्णावतार को सूर ने उपास्य बनाया, तो तुलसी ने रामावतार को । एक ने मर्यादा को स्वीकारा, तो दूसरे ने उसके उल्लंघन को भी वांछनीय ठहराया । प्रबंधकार कवि बंध नहीं मानते, उनके अनुसार प्रेम इन सब बातों से बंधा नहीं होता, यह तो मुक्त होता है । जैसा गोकुल की गोपियाँ, कृष्ण की प्रेम-भक्ति में, अपना सुध-बुध खो चुकी थी, ऐसी अवस्था में कुल की मर्यादा तोड़कर कृष्ण से मिलने जाती थीं, कहती थीं---
’निसि दिन बरषत नैन हमारे ।
सदा रहति बरषा रितु हम पर, जब तैं स्याम सिधारे ।
दृग अंजन न रहत निसि बासर, कर कपोल भए कारे ।
कंचुकि पट संखत नहीं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे ।
आँसू सलिल सबै भै काया, पल नन जात रिस टारे ।
सूरदास प्रभु यहै परेखो, गोकुल काहै बिसारे ।’

कृष्ण की दीवानी मीरा , राजपाट त्यागकर, कुल- मर्यादा की परवाह छोड़कर अपना जीवन कृष्ण के भजन-कीर्तन और साधु-संगति में व्यतीत करने लगी । मीरा को इस समर्पित भक्ति भावना के कारण अनेकों बाधाओं का सामना करना पड़ा; फ़िर भी मीरा अपने भक्ति-पथ से कभी विचलित नहीं हुई ।
सूर ने समकालीन और परवर्ती सभी कृष्ण-भक्तों को प्रभावित किया । सूरदास कृष्ण-भक्ति के आदि कवि के रूप में ब्रजभूमि में और ब्रजभाषा में अवतरित हुए । जिस प्रकार संत कबीर की लीक पर ही परिवर्तित संत चलते रहे , उसी तरह सूर की बनाई लीक पर ही सैकड़ों ब्रजभाषी कृष्ण-भक्त कवि रचना करते रहे । सूरदास जी विरह और मिलन ( संयोग और वियोग ) के वर्णन में अनमोल थे ----
’ऊधो स्याम निरखि निमेष बिसारे ।
ब्रजजन चातक मरत पियासे, स्वाति बूँद बरसावहु ॥
ह्याँ तैं जाहु बिलंब करौ जनि, हमरी दसा जनावहु ।
घोष सरोज भयौ है संपुट, है दिनकर बिगसावहु ॥
जौ ऊधो हरि इहाँ न आवहिं, तौ हमैं उहाँ बुलावहु ।
सूरदास प्रभु हमहिं मिलावहु, तौ तिहुं पुर जस पावहु ॥

संगीत और काव्य , दोनों सूर के पदों पर लोटते हैं, जिससे यह अंदाजा होता है कि वे कवि के साथ-साथ एक कुशल गायनाचार्य भी थे । आज भी राग-रागिनियों के प्रेमी गायक सूर को ऊँचा स्थन देते हैं , और सूर के काव्य-प्रसार में भी इनका बहुत बड़ा योगदान रहा है । आज भी शास्त्रीगायक, शास्त्रीय संगीत के नाम पर प्राय: सूर और मीरा के पद को ही गाते हैं । सूर ने ही कृष्ण भक्ति को संगीत के योग का माधुर्य योग देकर जनता के बीच प्रसारित किया । श्रीनाथ का मंदिर, अष्टछाप के भक्तों के अष्टयाम कीर्तन से गुंजित हो उठा , और इस तरह ब्रजभूमि कृष्ण-भक्तों का साधना केन्द्र और भक्ति का स्रोत बन गया ; जिससे आकर्षित हो राजरानी मीरा राजस्थान त्यागकर कीर्तन करने के लिए ब्रजभूमि आ गई । कृष्ण-प्रेम के दीवाने ,अपनी टोली में एक राजरानी को देखकर पुलकित हो उठे; उनका उत्साह सहस्त्रगुणा बढ़ गया । इस काल में चारो तरफ़ कृष्णभक्ति का गीत गुंज रहा था, जिससे आकर्षित हो तुलसीदास जी के गुरुभाई नंददास भी, इस मंडली में शामिल हो गये । कृष्णभक्त के समुदाय का फ़ल ही है, जो आज मथुरा भक्ति के गढ के रूप में स्थापित है ।
दुख है कि इस महान कृष्णभक्त कवि की जन्मतिथि निश्चित नहीं हो सकी । मगर कुछ विद्वान कवि जैसे हरि राय के ’भावाप्रकाश’ के अनुसार सूरदास जी का जन्म सं० 1535 में बैशाख शुक्ल पंचमी को दिल्ली के पास सीही ग्राम में हुआ था । इस तरह सूर का जन्म खड़ी बोली क्षेत्र में पड़ता है । सूर जाति के ब्राह्मण थे, लेकिन वे जन्मांध थे या नहीं, इस पर अलग-अलग राय है । कुछ लोगों का मानना है कि जन्म लेने के कुछ वर्ष बाद वे अंधे हो गये, पर अनुश्रुति उन्हें जन्मांध बताती है । 18 साल की आयु में वे अपना गाँव छोड़कर मथुरा के विश्रामाघाट आये । बाद वहाँ से वे यमुना तट पर गऊ घाट में रहने लगे और वहीं रहकर कीर्तन करने लगे । कहते हैं, सूरदास जी को ( चौरासी वैष्णवन को वार्ता ) के अनुसार कृष्ण भक्त इस अंधे कवि को बल्लभाचार्य ने पुष्टि मार्ग में दीक्षित कर उन्हें दास्य भाव छुड़ाकर कृष्ण की मधुर लीलाओं का रस चखवाया, और लीलातत्व की व्याख्या समझाई । उसके बाद वे दास्य भाव के लीला पद को छोड़कर लीलापद गाने लगे । भागवत ग्रंथ के दशम स्कंध के आधार पर रचा ----
’तनक- तनक चरननि सौं नाचत, मनहीं मनहिं रिझावत ।
बाँह उठाइ काजरी - धोरी गैयनि टेरि बुलावत ।
माखन तनक आपनैं कर लै, तनक वदन मैं नावत ।
दुरि देखति जसुमति यह लीला, हरष अनंद वढ़ावत ।
सूर स्याम के बाल चरित, नित नितही देखत भावत ।’

इसमें भगवान की बाललीला, रूपमाधुरी, प्रणय लीला, विरह, विनय, शृंगार तथा गोपी-उद्धव संवाद ( भ्रमर गीत ) अत्यंत विस्तार में वर्णित किया । ऐसा कर कवि ने अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय किया । इनके तीन मुख्यकाव्य हैं, ’सूरसागर’, सूरसावली’, तथा साहित्य-लहरी, किन्तु इनकी कृति का मुख्य आधार सूरसागर ही है । इसमें एक ही भाव के अनेक पद पाये जाते हैं ।
सूरदास वास्तव में वात्सल्य रस की प्रतिमूर्ति थे । वात्सल्य रस के इतने बड़े, कवि-संसार में दूसरा नहीं हुआ । इनकी कविताएँ हृदय को स्पश करने वाली है । इसमें काव्यकला के साथ संगीत कला का भी अद्‍भुत समन्वय है । इनके पद विभिन्न राग-रागिनियों में भी गाये गये हैं ।अत: वे संगीत प्रेमियों के भी प्रिय सम्पत्ति हैं ----

’स्याम-सुभग सरोज आनन, चारु, चित के चोर ।
नील तनु मनु जलद की छबि, मुरली सुर घन घोर
दसन दामिनि लसति बसननि, चितवनी झकझोर ।
स्रवन कुंडल गंड-मंडल , उदित ज्यौं रवि मोर ।
बरहि-मुकुट विसाल माला, इंद्र-धनु छबि थोर ।”

ब्रजभाषा के इस सर्वश्रेष्ठ कवि के समान सरस ,सूंदर , स्वाभाविक और जीवित भाषा के सामने रसखान को छोड़कर कोई और नहीं हो सका । सूर के शब्दचित्र इतने खड़े उतरे हैं, कि उन्हें पढ़ते या सुनते हुए, आँखों के सामने वे चित्र साकार खड़े हो जाते हैं । हिंदी साहित्य की अमर-निधि, सूर की कविताएँ, विश्वविख्यात हैं । अकबर और उसके मंत्री रहीम आदि सबों पर भक्ति आन्दोलन का इस प्रकार प्रभाव पड़ा कि अकबर ,हिंदू महात्माओं के शरण में जाने से भी नहीं सकुचाया । रहीम का तुलसी और अन्य कवियों से सम्पर्क स्थापित करना, यह दर्शाता है, कि उस समय भगवद्‍ भक्त स्वामियों और महात्माओं के प्रति क्या राजा, क्या जनता; सभी श्रद्धावान थे । वस्तुत: बल्लभाचार्य और रामानंद के प्रभाव से सूर ,तुलसी और उनके समान धर्मी भक्त कवियों के प्रभावशाली धार्मिक व्यक्तित्व का फ़ल यह हुआ कि लगभग एक सौ साल की अवधि को भक्तिकाल के रूप में जाना जाने लगा । इस महान कवि के बारे में कहा गया है --------
’ किधों सूर का सर लग्यो,किधों सूर की पीर
किधों सूर को पद लग्यो, बेध्यों शकल शरीर ॥’
Image
Mail your articles to swargvibha@gmail.com or swargvibha@ymail.com

Post Reply