जाति प्रश्‍न व फासीवाद से जूझ रहे हर कार्यकर्ता के लिए बेहद जरूरी बहस--mazdoorbigul

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जाति प्रश्‍न व फासीवाद से जूझ रहे हर कार्यकर्ता के लिए बेहद जरूरी बहस--mazdoorbigul

Post by admin » Sat Jul 28, 2018 7:19 am

जाति प्रश्‍न व फासीवाद से जूझ रहे हर कार्यकर्ता के लिए बेहद जरूरी बहस


जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास, हिन्‍दुत्‍व विचारधारा के इतिहास और चरित्र, अम्‍बेडकर के योगदानों और सीमाओं, निषेध का निषेध के बुनियादी द्वन्‍द्ववादी नियम व उत्‍सादन की अवधारणा, आर्थिक आधार की अवधारणा और रूसी क्रांति के इतिहास के विषय में एक विस्‍तृत बहस

चूंकि ये बहस काफी विस्‍तृत है (65 A4 पेज) इसलिए यहां सारा टेक्‍सट नहीं दिया जा सकता।
अगर आप यूनिकोड में पढ़ना चाहते हैं तो इस लिंक से ऑनलाइन पढ़ सकते हैं http://www.mazdoorbigul.net/archives/12392

अगर आप पीडीएफ डाउनलोड करना चाहते हैं तो इस लिंक से कर सकते हैं http://www.mazdoorbigul.net/wp-content/ ... estion.pdf

बहस का एक हिस्‍सा यहां दे रहे हैं

जाति प्रश्न के विषय में श्री श्‍यामसुन्‍दर के विचार: अज्ञानता, बचकानेपन, बौनेपन और मूर्खता की त्रासद कहानी

अभिनव (सम्‍पादक, ‘मज़दूर बिगुल’)

III. जाति प्रश्‍न और जाति प्रश्‍न पर हमारे विचारों के बारे में श्‍यामसुन्‍दर के विचार: मूढ़ता के नये सीमान्‍तों का श्‍यामसुन्‍दरीय संधान

लेनिन ने ‘राज्‍यसत्‍ता क्‍या है?’ नामक अपने प्रसिद्ध भाषण में, जो कि उन्‍होंने 1919 में स्‍वेर्दलोव विश्‍वविद्यालय में दिया था, एक बड़े मार्के की बात कही है जो सभी मार्क्‍सवादियों-लेनिनवादियों को याद रखनी चाहिए। लेनिन ने कहा है कि किसी प्रश्‍न को समझने का सबसे वैज्ञानिक और तार्किक तरीका होता है, उसे ऐतिहासिक तौर पर समझना। यानी किसी भी परिघटना को समझने के लिए उसके जन्‍म, विकास और इतिहास में जाना चाहिए। देखिये लेनिन क्‍या लिखते हैं:

”इस प्रश्‍न को अधिकतम सम्‍भव वैज्ञानिक रूप से अप्रोच करने के लिए हमें राज्‍यसत्‍ता, उसके उद्भव और विकास के इतिहास पर एक सरसरी निगाह डालनी होगी। समाज विज्ञान के किसी प्रश्‍न पर सबसे भरोसेमंद चीज़, और जो इस प्रश्‍न को सही तरीके से अप्रोच करने और विवरणों के अम्‍बार या विरोधी रायों के अम्‍बार में खो जाने से बचने की आदत बनाने के लिए अनिवार्य है –जो चीज़ इस प्रश्‍न को वैज्ञानिक रूप से समझने के लिए सबसे अहम है, वह है इसके पीछे मौजूद ऐतिहासिक सम्‍बन्‍ध को न भूलना, हर प्रश्‍न को इस दृष्टिकोण से परखना कि दी गयी परिघटना इतिहास में किस प्रकार पैदा हुई और उसके विकास में प्रधान चरण कौन-से थे…ताकि यह परखा जा सके कि आज वह परिघटना क्‍या बन गयी है।” (लेनिन, राज्‍यसत्‍ता क्‍या है?, अनुवाद और ज़ोर हमारा)

जैसा कि आप देख सकते हैं कि लेनिन का मानना है कि हर प्रश्‍न का अध्‍ययन ऐतिहासिक दृष्टिकोण से किया जाना चाहिए। जाति प्रश्‍न और भारतीय इतिहास में उसकी भूमिका का अध्‍ययन भी इसी दृष्टिकोण से हो सकता है। दूसरे शब्‍दों में, बिना इस बात का अध्‍ययन किये कि जाति व्‍यवस्‍था किस प्रकार पैदा हुई, कब पैदा हुई, किस प्रकार अलग-अलग चरणों में विकसित हुई और आज वह विकास प्रक्रिया कहां पहुंची है, आप जाति के प्रश्‍न को उसकी ऐतिहासिकता (historicity) और उसकी समकालीनता (contemporaneity) में नहीं समझ सकते हैं।

जब हम श्‍यामसुन्‍दर के जाति प्रश्‍न सम्‍बन्‍धी विचारों को पढ़ते हैं, तो पहली बात जो दिमाग़ में आती है वह यह कि इन महाशय ने जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास के बारे में कोई गम्‍भीर अध्‍ययन नहीं किया है; सम्‍भवत: कोई अध्‍ययन नहीं किया है। बिना इसके यह सम्‍भव ही नहीं है कि कोई इतने विचित्र रूप से मूढ़तापूर्ण विचार पेश करे। अब हम आपका नुक्‍तेवार इन मूर्खताओं से परिचय कराएंगे और साथ ही इन मूर्खताओं का खण्‍डन करते हुए आपको सम्‍बन्धित विषय में ऐतिहासिक तौर पर सही जानकारी से भी अवगत कराएंगे। प्रस्‍तुत पत्र में श्‍यामसुन्‍दर ने कुछ पूर्वनिर्धारित धारणाएं (assumptions) रखीं हैं जिन्‍हें आकाशवाणी समान सत्‍य (axiomatic) मानकर हमारे जाति व्‍यवस्‍था सम्‍बन्‍धी विचारों की आलोचना रखी गयी है। सबसे पहले हम इन प्रमुख धारणाओं की पड़ताल करते हुए यह दिखलाएंगे कि श्‍यामसुन्‍दर को जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास के बारे में उतना पता है, जितना भक्‍तों को प्राचीन भारत के बारे में पता है।

श्‍यामसुन्‍दर की पूरी आलोचना में उनकी प्रमुख पूर्वनिर्धारित धारणा यह है: जाति व्‍यवस्‍था सामन्‍ती उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध का प्रतिनिधित्‍व करती है और इसलिए आज उसे सामन्‍ती अवशेष माना जाना चाहिए और इसीलिए हमारे ग्रुप द्वारा आज की जाति व्‍यवस्‍था को ‘पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था’ कहना ग़लत है, क्‍योंकि यह ऐसा होगा जैसे हम किसी ‘पूंजीवादी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था’ की बात करें। अब यह पूरी धारणा ही ऐसी अनैतिहासिक, अज्ञानतापूर्ण और कूपमण्‍डूकतापूर्ण धारणा है और यह इ‍तने स्‍तरों पर ग़लत है कि यह विडम्‍बना ही है कि इसका जवाब भी देना पड़ रहा है।

पहली बात तो यह है कि जाति व्‍यवस्‍था भारत में सामन्‍ती व्‍यवस्‍था के उदय के पहले ही अस्तित्‍व में आ चुकी थी। आरम्भिक वैदिक युग या ऋग्‍वैदिक काल की समाप्ति तक उस दौर के समाज के भ्रूण वर्ग विभाजन के रूप में वर्ण व्‍यवस्‍था अस्तित्‍व में आयी, लेकिन अभी इसने आज की वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था का रूप नहीं लिया था क्‍योंकि अभी वर्ण के ऋग्‍वैदिक सन्‍दर्भ में न तो आनुवांशिक श्रम विभाजन की बात थी, न सजातीय विवाह और न ही अस्‍पृश्‍यता की। आनुवांशिक श्रम विभाजन और सजातीय विवाह के दो प्रमुख गुणों के अस्तित्‍व में आने के साथ वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था ने वह स्‍वरूप ग्रहण करना शुरू किया, जिस रूप में उसे हम जानते हैं। ये परिवर्तन वैदिक काल के उत्‍तरार्द्ध, यानी 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व के बीच हो रहे थे, यानी ऋग्‍वैदिक काल के बाद के दौर में। छठीं व पांचवीं शताब्‍दी ईसा पूर्व में भारत के गंगा के मैदानों में राज्‍य निर्माण की प्रक्रिया एक मुकम्मिल मुकाम तक पहुंची और इसी दौर में हम प्रथम जनपदों का उदय देखते हैं। इन जनपदों का स्‍वरूप कबीलाई गणतांत्रिक राज्‍यों (tribal republics) जैसा था। इन्‍हीं में से राजतन्‍त्रीय राज्‍यसत्‍ता का उदय हुआ, जिसमें से मौर्य राज्‍य प्रथम था और बाद में भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्‍से में उसका साम्राज्‍य कायम हुआ। इस बीच हम हीन शूद्रों के रूप में शूद्रों के एक हिस्‍से के प्रति ब्राह्मणवादी ग्रन्‍थों में पहली बार एक प्रदूषण का भाव प्रकट होते देखते हैं, जो कि आगे चलकर अस्‍पृश्‍यता के तमाम स्रोतों में से एक स्रोत बना; मिसाल के तौर पर, चाण्‍डाल जाति के बारे में इस दौर के ब्राह्मणवादी ग्रन्‍थों में विकर्षण का भाव प्रकट किया गया था, हालांकि यह अभी पूर्ण रूप में अस्‍पृश्‍यता के तौर पर विकसित नहीं हुआ था। राज्‍य निर्माण और शासक वर्ग के रूप में क्षत्रिय-ब्राह्मण वर्णों के गठजोड़ के सुदृढ़ होने के साथ, और खेतिहर अर्थव्‍यवस्‍था के जड़ें जमाने तथा स्‍वस्‍थ मात्रा में व नियमित तौर पर अधिशेष उत्‍पादन के सुनिश्चित होने के साथ शारीरिक श्रम करने वाले वर्गों के दमन को ब्राह्मणवादी विचारधारा के उपकरण के ज़रिये संरचनात्‍मक रूप देने की शासक वर्गों की आवश्‍यकता पैदा हो चुकी थी। हीन शू्द्रों में चाण्‍डाल जैसी जातियों को शामिल किया गया, चर्मकार का पेशा निम्‍न कोटि का पेशा बना दिया गया (ज्ञात हो कि वैदिक काल में चर्मकार का पेशा एक सम्‍मानित पेशा माना जाता था क्‍योंकि अधिकांश वैदिक कर्मकाण्‍डों के दौरान इन कर्मकाण्‍डों की सामग्री केवल चमड़े के झोलों में ले जाने की आज्ञा थी; मगर उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध बदलने के साथ जाति व्‍यवस्‍था में भी अहम परिवर्तन हो रहे थे)। इसी दौर में, कई नयी जनजातियां वैदिक आर्यों की सभ्‍यता के पूर्व में विस्‍तार के साथ वैदिक समाज में शामिल हो रही थीं और अक्‍सर वे वैदिक समाज में विभेदीकृत तौर पर सम्मिलित हो रही थीं; जैसे कि इन जनजातियों का पुरोहित वर्ग नयी ब्राह्मण जातियों के रूप में, योद्धा व राजा वर्ग नयी क्षत्रिय जातियों के रूप में और अन्‍य आम आबादी शूद्र अथवा पंचम वर्ण के रूप में शामिल हो रही थी। विशेष तौर पर वे जनजातियां जो अभी तक खानाबदोश चरवाहों का जीवन व्‍यतीत कर रही थीं, पूरी की पूरी पंचम वर्ण के तौर पर या फिर हीन शूद्र जातियों के रूप में वैदिक समाज में शामिल हो रही थीं। अशोक का दौर आते-आते कई ऐसी पंचम वर्ण की जातियां वैदिक समाज में सम्मिलित हो चुकी थीं। शारीरिक श्रम करने वाले वर्गों की अधीनस्‍थता को ढांचागत बनाने की प्रक्रिया में ही पंचम वर्ण की जातियों को अस्‍पृश्‍य मानने की शुरुआत ब्राह्मणों ने की और बाद में इसी अस्‍पृश्‍यता को कर्मकाण्‍डीय धार्मिक वैधीकरण भी प्रदान कर दिया। लेकिन मौर्य काल में अस्‍पृश्‍य जातियों की संख्‍या कम थी। मौर्य काल के बाद और विशेष तौर पर गुप्‍त काल और उसके बाद के दौर में अस्‍पृश्‍य जातियों की संख्‍या में भारी वृद्धि हुई। इस पूरी प्रक्रिया को विस्‍तार से समझने के लिए आप इन लेखों और वीडियो व्‍याख्‍यानों को देख सकते हैं: (http://www.mazdoorbigul.net/anti-caste-material) ये लेख व व्‍याख्‍यान जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास पर नवीनतम मार्क्‍सवादी ऐतिहासिक शोध पर आधारित हैं। मौर्य काल की शुरुआत तक दास प्रथा सुदृढ़ हो चुकी थी, हालांकि इसके बीज वर्ग समाज के अस्तित्‍व में आने के साथ ही पड़ चुके थे। मौर्य काल में हमें उत्‍पादक श्रम में बड़े पैमाने पर दास श्रम की भागीदारी के स्‍पष्‍ट प्रमाण मिलते हैं, हालांकि प्राचीन यूनानी या रोमन दास प्रथा के मुकाबले यह कम ही था। हमारे यहां दास प्रथा का चरित्र रोमन चैटल दासता से भिन्‍न था। लेकिन अगर हम दुनिया के अलग-अलग हिस्‍सों में दास प्रथा का अध्‍ययन करें, तो उनका चरित्र रोमन या किसी भी अन्‍य देश के इतिहास में अस्तित्‍व में आयी दास प्रथा से भिन्‍न था; रूप के स्‍तर पर इन विविधताओं के पीछे की सारवस्‍तु में कोई बुनियादी अन्‍तर नहीं था; दास प्रथा के शुरुआत होने का प्रमुख महत्‍व इस बात में है कि यह सामुदायिक जीवन व अर्थव्‍यवस्‍था के टूटने और वर्ग समाज के अस्तित्‍व में आने का परिचायक है; इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की दासों की आबादी का कितना हिस्‍सा प्रत्‍यक्ष उत्‍पादक श्रम में लगा हुआ था और कितना हिस्‍सा घरेलू दासों के रूप में मौजूद था। डी. डी. कोसाम्‍बी ने इस पूरे तर्क को स्‍पष्‍टता के साथ समझाया है। यह दौर वास्‍तव में प्राक्-सामन्‍ती उत्‍पादन व्‍यवस्‍था का दौर था, जिसमें दास श्रम प्रमुखता के साथ मौजूद था। इसके चरित्र-चित्रण को लेकर कई बहसें हैं, लेकिन इस बात पर सभी एकमत हैं कि यह सामन्‍ती व्‍यवस्‍था नहीं थी। यह दौर मुद्रा अर्थव्‍यवस्‍था और शहरीकरण तथा अपेक्षाकृत बड़े पैमाने पर माल उत्‍पादन का दौर था; इस दौर में व्‍यापार और वाणिज्‍य का भी विचारणीय विकास हुआ था। इतना स्‍पष्‍ट है कि गुप्‍त काल से पहले ही, जो कि भारतीय इतिहास में सामन्‍ती उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों की शुरुआत का दौर है, वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था के तीन मूल आयाम पैदा हो चुके थे: आनुवांशिक श्रम विभाजन, सजातीय विवाह की परम्‍परा और अस्‍पृश्‍यता तथा खान-पान सम्‍बन्‍धी पूर्वाग्रह।

यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि वर्ण व्‍यवस्‍था जो कि आरंभिक वैदिक समाज के अन्‍त के दौर में वैदिक समाज के भ्रण रूप में पैदा हुए वर्ग विभाजन को दिखा रही थी, बाद में वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था के रूप में विकसित इसलिए हुई क्‍योंकि समाज में अधिशेष उत्‍पादन, निजी सम्‍पत्ति, पितृसत्‍तात्‍मक परिवार, और राज्‍य का निर्माण सातवीं सदी ईसा पूर्व से गुणात्‍मक रूप से नयी मंजिल में पहुंच गया था और पांचवी सदी ईसा पूर्व आते-आते इसने एक मुकम्मिल मुकाम हासिल कर लिया था। ब्राह्मणों ने हर युग और हर दौर के शासक वर्ग के बुद्धिजीवियों के समान वैदिक आर्य समाज के शासक वर्ग (जिसका कि वे स्‍वयं भी अंग थे) के शासन के लिए विचारधारात्‍मक वैधीकरण के निर्माण का कार्य किया। लेकिन अन्‍य समाजों से भिन्‍न भारतीय समाज में इस वैधीकरण ने धार्मिक कर्मकाण्‍डीय रूप लिया, जिसके कारण वर्ग और वर्ण में मूल के बिन्‍दु पर जो अतिच्‍छादन था, वह टूट कर एक संगति (correspondence) के सम्‍बन्‍ध में तब्‍दील हो गया। अब वर्ण और वर्ग के बीच पूर्ण अतिच्‍छादन नहीं था, लेकिन जब भी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों और वर्ग सम्‍बन्‍धों में कोई गुणात्‍मक परिवर्तन आता था, तो वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था के कर्मकाण्‍डीय व धार्मिक ढांचे में भी विखण्‍डन, संलयन, सहयोजन व समायोजन की प्रक्रिया शुरू हो जाती थी। भारत में औपनिवेशिक दौर तक वर्ग समूहों और जाति समूहों में, विशेष तौर पर दलित व शूद्र आबादी के मामले में, काफी हद तक अतिच्‍छादन था। बताने की आवश्‍यकता नहीं है कि वर्ग और जाति में अतिच्‍छादन और वर्ग समूहों और जाति समूहों में अतिच्‍छादन भिन्‍न चीजें हैं। वर्ण-जाति तथा वर्ग में संगति का सम्‍बन्‍ध स्‍थापित होने के साथ तमाम वर्णों की भूमिकाओं और पेशों में परिवर्तन आये। यही कारण है कि वैश्‍य जो कि पहले मूलत: कृषक वर्ण थे, जनपदों के दौर के समापन होते-होते मुख्‍यत: वाणिज्यिक वर्ण में तब्‍दील होने लगे थे; शूद्र जो कि मौर्य काल के दौरान अधीनस्‍थ श्रमिक वर्ग व दास आबादी का अंग थे, वे अब निर्भर किसान आबादी व भूदासों में तब्‍दील हो गये; ऋग्‍वैदिक काल में शूद्रों और ब्राह्मणों के बीच वैवाहिक सम्‍बन्‍ध और उनसे पैदा संतति को बिना भेदभाव के ब्राह्मण वर्ण में शामिल किये जाने के पर्याप्‍त प्रमाण मौजूद हैं; कई ऋग्‍वैदिक ऋचाओं की रचना शूद्र माता की सन्‍तानों ने की थी; स्‍वयं ‘दास’, ‘दस्‍यु’ व ‘असुर’ शब्‍दों के अर्थ आरम्भिक वैदिक काल के समापन के बाद बदल गये; ‘ऋग्‍वेद’ में तो स्‍वयं इन्‍द्र को भी असुर कहा गया है। केवल आरंभिक वैदिक काल के बाद ही, जब कि वैदिक आर्यों ने पूर्ववर्ती आर्यों पर, जो कि उनसे पहले भारतीय उपमहाद्वीप के उत्‍तर-पश्चिमी सीमान्‍त पर पहुंचे थे और वहां की मूल आबादी में मिश्रित हो चुके थे, विजय को पूर्णता तक पहुंचाया और जब वर्ग विभाजन के अस्तित्‍व में आने के साथ विजित वैदिक-पूर्व आर्यों को शूद्र का दर्जा दिया गया और उन्‍हें दास या अधीनस्‍थ बनाया गया; केवल तभी ‘दास’ शब्‍द का वह अर्थ पैदा हुआ जिसे हम आज जानते हैं। इस पूरे दिलचस्‍प इतिहास को आप उपरोक्‍त दिये गये लेखों व वीडियो व्‍याख्‍यानों के लिंक को फॉलो करके समझ सकते हैं, या फिर जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास पर जो नवीनतम शोध हुआ है जैसे कि सुवीरा जायसवाल की ‘कास्‍ट: ओरिजिन, फंक्‍शंस एण्‍ड डाइमेंशंस’ तथा ‘दि मेकिंग ऑफ ब्रैह्मैनिक हेजेमनी’, विवेकानन्‍द झा की ‘चाण्‍डाला: अनटचेबिलिटी एण्‍ड कास्‍ट इन अर्ली इण्डिया’ आदि जैसी पुस्‍तकें पढ़कर समझ सकते हैं। हम पाठकों से आग्रह करेंगे कि इन शानदार मार्क्‍सवादी शोधकार्यों को अवश्‍य पढ़ें। इससे आप दो बातें समझ सकते हैं, जिसे श्‍यामसुन्‍दर और उन जैसे कुछ वामपंथी नहीं समझते – (1) जाति व्‍यवस्‍था सामन्‍ती दौर में नहीं पैदा हुई, बल्कि उससे पहले ही पैदा हो चुकी थी और इसलिए वह सामन्‍ती अवशेष नहीं है; यदि वह सामन्‍ती अवशेष है, तो वह सामन्‍तवाद के दौर में क्‍या थी? प्राक्-सामन्‍ती अवशेष? तब वह पूंजीवाद के दौर में ‘प्राक्-सामन्‍ती सामन्‍ती अवशेष’ मानी जायेगी; आप देख सकते हैं कि ऐसी तर्क प्रणाली ने श्‍यामसुन्‍दर को कैसी मूर्खताओं के ढेर में ले जाकर गिरा दिया है; (2) दूसरी बात जो आप इन शोध कार्यों के अध्‍ययन से समझ सकते हैं, वह यह है कि वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था (जैसा कि सुवीरा जायसवाल इसे कहती हैं, और ठीक ही कहती हैं) बदलते उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के अनुसार बदलती गयी है; यह कालिक (temporal) व स्‍थानिक (spatial) तौर पर स्‍थैतिक (static) नहीं रही है। इसलिए अगर आप डेक्‍लान क्विगली के प्रसिद्ध शोध ‘दि इण्‍टरप्रेटेशन ऑफ कास्‍ट’ को पढ़ें तो आप पाते हैं कि जब ब्राह्मण वर्ण गुप्‍त काल से, यानी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था के प्रादुर्भाव के साथ, एक भूस्‍वामी वर्ग के तौर पर पैदा हुआ, तो वे ब्राह्मण जो कि भूस्‍वामी नहीं बने और पुरोहिती और भिक्षा पर आधारित रहे, वे कर्मकाण्‍डीय व धार्मिक पदानुक्रम में भी नीचे चले गये। क्विगली ने एक क्षेत्र में एक ऐसी ब्राह्मण जाति का उदाहरण रखा है, जो कि इन पदानुक्रम में नीचे जाते-जाते स्‍वयं अस्‍पृश्‍य मानी जाने लगी, यानी कि ‘अस्‍पृश्‍य ब्राह्मण’! ज्ञात हो कि मूल वैदिक स्रोतों के अनुसार ब्राह्मण केवल और केवल वस्‍तुओं की दान-दक्षिणा ले सकता है और भूमि का अनुदान या दक्षिणा लेना उसके लिए वर्जित था। लेकिन जब सामन्‍ती दौर आया, विमौद्रीकरण और विनगरीकरण के साथ अर्थव्‍यवस्‍था का स्‍थानीयकरण और ग्राम्‍यकरण हुआ, तो भूमि तथा खेती की भूमिका एक नये अर्थों में केन्‍द्रीय बन गयी; व्‍यापार व वाणिज्‍य के पतन और विमौद्रीकरण के कारण राजाओं ने भुगतान का माध्‍यम भूमि अनुदानों को बनाया और इसके साथ ही ब्राह्मणों का उदय भूस्‍वामियों व सामन्‍तों के तौर पर हुआ। हम देख सकते हैं कि उत्‍पादन पद्धति और वर्ग संरचना में परिवर्तन के साथ वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था में भी उसके साथ संगति रखने वाले परिवर्तन हुए; नये शास्‍त्र और ग्रन्‍थ रच दिये गये, जो कई पुराने नियमों को खारिज करते थे।

उसी प्रकार भारतीय उपमहाद्वीप के वे क्षेत्र जहां जाति व्‍यवस्‍था और ब्राह्मणवाद पहुंचे ही तब जबकि खेती अर्थव्‍यवस्‍था काफी विकसित हो चुकी थी और कुछ किसान राज्‍य पैदा हो चुके थे, जैसे कि प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी हिस्‍से, तो वहां पर ब्राह्मणों ने इन किसान राजाओं के लिए भी विचारधारात्‍मक वैधीकरण का निर्माण किया। चूंकि उत्‍तर भारत में उस समय कृषि मूलत: शूद्र जाति का पेशा बन चुकी थी, इसलिए इन किसान वर्ग से उठे राजाओं को शूद्र का ही दर्जा दिया, लेकिन शूद्रों में एक विभेद स्‍थापित करके। यहां उन्‍होंने नये ग्रन्‍थों की रचना कर सत शूद्र और असत शूद्र का विभेद पैदा किया और सत शूद्र को लगभग वही दर्जा दिया जो कि क्षत्रिय को दिया जाता है; यानी उन्‍हें ब्राह्मणों का संरक्षक बताया गया; कई दक्षिण भारतीय राज्‍यों में तो आगे सत शूद्र को ब्राह्मणों से भी ऊपर का दर्जा मिला, जैसे कि वेल्‍लाल जाति को। इस पूरे इतिहास को जानने के लिए भी आप उपरोक्‍त पुस्‍तकों का अध्‍ययन कर सकते हैं या उपरोक्‍त दिये गये लिंक पर जाकर विस्‍तृत व्‍याख्‍यानों को सुन सकते हैं। नतीजतन हुआ यह कि दक्षिण भारत के इन राज्‍यों में बिल्‍कुल अलग किस्‍म की वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था अस्तित्‍व में आयी जिसमें कि दो मध्‍यवर्ती वर्ण आरंभिक तौर पर थे ही नहीं, यानी क्षत्रिय और वैश्‍य। कारण यह था कि वैदिक सभ्‍यता जब यहां पहुंची तो यहां की उत्‍पादन पद्धति पहले ही एक उन्‍नत खेतिहर मंजिल में पहुंच चुकी थी। लगभग कुछ ऐसा ही उत्‍तर-पूर्व भारत के कुछ हिस्‍सों में भी अलग रूप में हुआ था। यानी कि कालिक तौर पर (temporally) और स्‍थानिक तौर पर (spatially) जाति व्‍यवस्‍था में बेहद बुनियादी बदलाव आये और इन पर काफी शोध हो चुका है। रामशरण शर्मा के ‘वर्ण एण्‍ड स्‍टेट फॉर्मेशन इन मिड-गैंजेटिक प्‍लेंस’, ‘शूद्राज़ इन एंशट इण्डिया’ से लेकर सुवीरा जायसवाल की ‘कास्‍ट’ व ‘दि मेकिंग ऑफ ब्रैह्मैनिक हेजेमनी’ तक, उत्‍कृष्‍ट शोध कार्यों की कोई कमी नहीं है, जिनमें आप इस पूरे इतिहास, वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था के कालिक व स्‍थानिक परिवर्तनों को देख सकते हैं। इसलिए जाति व्‍यवस्‍था में 1000 ईसवी पूर्व से लेकर अब तक के लगभग 3000 साल के इतिहास में बहुत से परिवर्तन आये हैं; प्रश्‍न यह है कि प्राक्-सामन्‍ती दौर (जिसमें आरंभिक वर्ग समाज से लेकर मौर्य काल की दासत्‍व की प्रथा तक शामिल है) से होते हुए सामन्‍ती दौर तक वर्ण-जाति व्‍यवस्‍था में जो परिवर्तन आये उसका कारण क्‍या था? जैसा कि उपरोक्‍त इतिहासकारों ने दिखलाया है, इन परिवर्तनों का कारण था उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों और वर्ग सम्‍बन्‍धों में आये परिवर्तन। जाति और वर्ग में उत्‍तर-वैदिक काल से ही एक संगति का सम्‍बन्‍ध रहा है और बदलते वर्ग सम्‍बन्‍धों और उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के अनुसार जाति व्‍यवस्‍था में भी बेहद महत्‍वपूर्ण परिवर्तन होते रहे हैं।

इसलिए यह सोचना कि जाति व्‍यवस्‍था सामन्‍ती चीज़ है, यह सामन्‍तवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध है, यह सामन्‍तवाद के दौर के बाद सामन्‍ती अवशेष से ज्‍यादा कुछ नहीं है, दिखलाता है कि श्‍यामसुन्‍दर ने जाति व्‍यवस्‍था के उद्भव और विकास के समूचे इतिहास का कोई अध्‍ययन नहीं किया है। कोई मार्क्‍सवादी होने का दावा करने वाला मंच (जन संघर्ष मंच) जाति प्रश्‍न पर एक सेमिनार करता है, उसका नेतृत्‍व जाति प्रश्‍न पर एक पेपर तक लिख मारता है, लेकिन उसने जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास का ही अध्‍ययन नहीं किया! तो इसे क्‍या कहा जाय? यह एक बचकानी और गैर-जिम्‍मेदाराना हरकत है और ऐसे लोग आन्‍दोलन में अपनी मूर्खता की संक्रामक बीमारी फैलाने के अलावा कुछ नहीं कर सकते हैं।

अब देखते हैं कि श्‍यामसुन्‍दर ने अपनी मूढ़ता की छूत फैलाने के उपक्रम में कैसी अज्ञानतापूर्ण बातें लिखी हैं; हम क्रमवार उन बातों का खण्‍डन पेश करते चलेंगे। महोदय लिखते हैं:

”यह तो सही है कि भारतीय पूंजीवादी समाज की वैचारिक-राजनीतिक-सामाजिक अधिरचना में जातियों की प्रभावी उपस्थिति बनी हुई है, पर यह कहना ग़लत है कि जाति सामन्‍ती अवशेष मात्र नहीं है। क्‍योंकि पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में जातिवादी, सामन्‍तवादी, अथवा प्राक्-पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध महज़ अवशेषों के रूप में ही मौजूद रह सकते हैं, अन्‍यथा नहीं। और इस प्रकार के अवशेषों के कारण कोई भी पूंजीवादी व्‍यवस्‍था पूंजीवादी जाति-व्‍यवस्‍था, पूंजीवादी-सामन्‍ती व्‍यवस्‍था नहीं के नाम से नहीं पुकारी जा सकती।” (ज़ोर हमारा)

जैसा कि हम देख सकते हैं, श्‍यामसुन्‍दर के लिए जाति व्‍यवस्‍था एक सामन्‍ती अवशेष मात्र है और उनका कहना है कि ऐसे अवशेष की मौजूदगी की वजह से उसे पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था नहीं कहा जा सकता क्‍योंकि उसका अर्थ होगा ‘पूंजीवादी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था’ जैसी चीज़ की बात करना। हम ऊपर दिखला चुके हैं कि जाति व्‍यवस्‍था महज़ सामन्‍ती अवशेष नहीं मानी जा सकती। अगर कोई ऐसा मानता है तो उसे यह भी बताना पड़ेगा कि सामन्‍ती काल में क्‍या जाति व्‍यवस्‍था प्राक्-सामन्‍ती व्‍यवस्‍था के उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध का अवशेष थी? अगर हां, तो फिर जिस प्रकार ‘पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था’ की बात नहीं की जा सकती, उसी प्रकार ‘सामन्‍ती जाति व्‍यवस्‍था’ की बात नहीं की जा सकती, क्‍योंकि श्‍यामसुन्‍दर के तर्क के अनुसार प्राक्-सामन्‍ती अवशेष की मौजूदगी के आधार पर जाति व्‍यवस्‍था को सामन्‍तवाद के दौर में सामन्‍ती जाति व्‍यवस्‍था नहीं कहा जा सकता। और अगर उसे सामन्‍ती जाति व्‍यवस्‍था नहीं कहा जा सकता तो पूंजीवाद के दौर में जाति व्‍यवस्‍था की मौजूदगी को सामन्‍ती अवशेष भी नहीं कहा जा सकता। जैसा कि आप देख सकते हैं, इतिहास के बारे में पूर्ण अज्ञान आपको कैसे शर्मनाक विरोधाभासों में ले जाकर गिरा देता है। और श्‍यामसुन्‍दर से पुरानी बहसों के अनुभव के आधार पर हम कह सकते हैं कि बार-बार मूर्खताओं और शर्मनाक विरोधाभासों के गड्ढे में गिरते-गिरते उन्‍हें इस गड्ढे से ही कुछ लगाव हो गया है, इसलिए अक्‍सर वे वहीं पड़े मिलते हैं! आइये अब आगे श्‍यामसुन्‍दर की दिव्‍य चक्षु खोल देने वाली ज्ञान वर्षा पर कुछ निगाह डालते हैं। आगे श्‍यामसुन्‍दर लिखते हैं:

”एंगेल्‍स ने S. Schmidt को मार्च 12, 1895 को लिखे अपने पत्र में लिखा है कि कोई भी समाज व्‍यवस्‍था शुद्ध नहीं होती। ना तो सामन्‍ती व्‍यवस्‍था शुद्ध सामन्‍ती व्‍यवस्‍था होती है और न ही कोई पूंजीवादी व्‍यवस्‍था शुद्ध पूंजीवादी। अतीत की व्‍यवस्‍थाओं के अवशेषों के बावजूद पूंजीवादी व्‍यवस्‍था पूंजीवादी ही होती है। अत: जाति व्‍यवस्‍था के अवशेषों के बचे होने के आधार पर यदि कोई भारतीय पूंजीवादी व्‍यवस्‍था को ‘पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था’ कहे तो यह सही नहीं होता। भारतीय पूंजीवादी व्‍यवस्‍था को ‘पूंजीवादी जाति-व्‍यवस्‍था’ कहने का अर्थ होगा कि इस व्‍यवस्‍था में सामाजिक श्रम-विभाजन की प्रक्रिया मूल्‍य के पूंजीवादी नियम और मुनाफों के लिए भिन्‍न-भिन्‍न पूंजियों की प्रतियोगिता से निर्धारित नहीं हो रही बल्कि अन्‍तत: जातियों के आधार पर, यानी, वंशानुगत आधार पर घटित हो रही है और इस प्रकार के जाति-आधारित श्रम विभाजन को देश के पूंजीवादी संविधान, कायदे-कानून और राज्‍य का संरक्षण प्राप्‍त है।” (ज़ोर हमारा)

एक बार हमारे सामने फिर एक ऐसा कथन है जिसमें बहुस्‍तरीय और बहुस्‍वरीय कूपमण्‍डूकताएं पेश की गयी हैं। पहली बात तो यह है कि 12 मार्च, 1895 का एंगेल्‍स का पत्र किसी S. Schmidt को नहीं, बल्कि कॉनरैड श्मिट को लिखा गया था। इस पत्र में एंगेल्‍स महज़ इतना कह रहे हैं कि समाज विज्ञान में अवधारणाओं और उन यथार्थों के बीच, जिनकी कि वे अवधारणाएं हैं, हमेशा एक अन्‍तर होता है और वे कभी भी पूर्ण रूप से एक दूसरे को अतिच्‍छादित नहीं करती हैं। इसके लिए एंगेल्‍स कई उदाहरण देते हैं जैसे कि मार्क्‍स का यह सिद्धान्‍त कि कुल मुनाफा हमेशा कुल अतिरिक्‍त मूल्‍य के बराबर होता है, केवल एक एप्रॉक्सिमेशन में सिद्ध किया जा सकता है; ठीक उसी प्रकार इंग्‍लैण्‍ड का उदाहरण देते हुए एंगेल्‍स कहते हैं कि सबसे उन्‍नत पूंजीवादी समाज के बारे में भी यह नहीं कहा जा सकता कि वहां पर समाज पूंजीपति, मज़दूर और भूस्‍वामी के तीन बुनियादी ध्रुवीय वर्गों में विभाजित हो गया है; कोई भी समाज चाहे वह पूंजीवादी हो या सामन्‍ती ऐसी अवधारणात्‍मक पूर्णता में अस्तित्‍वमान नहीं होता। वास्‍तविक जीवन में हमें अवधारणाएं चलती-फिरती नहीं मिलती बल्कि ठोस सामाजिक यथार्थ मिलते हैं, जो कि इन अवधारणाओं का एप्रॉक्सिमेशन ही हो सकते हैं, क्‍योंकि कोई भी अवधारणा एक सामाजिक यथार्थ की सारतत्‍व की अभिव्‍यक्ति होती है, यानी वह एक मूर्त सामाजिक पूर्णता को उसकी शुद्धता या साररूप में अभिव्‍यक्‍त करती है और इस रूप में वह किसी भी वास्‍तविक सामाजिक पूर्णता (real social totality) को समझने का उपकरण होती है। ठीक उसी प्रकार उत्‍पादन प्रणाली (mode of production) भी एक अमूर्त अवधारणा है जो कि किसी सामाजिक पूर्णता के सारतत्‍व को प्रदर्शित करती है; वास्‍तव में जो सामाजिक यथार्थ मौजूद होता है, उसे तमाम मार्क्‍सवादियों ने सामाजिक संरचना (social formation) का नाम दिया है। सामाजिक संरचना का अर्थ होता है कई उत्‍पादन पद्धतियों का तन्‍तुबद्धीकरण (articulation of modes of production) जिसमें एक उत्‍पादन पद्धति प्रभुत्‍वशाली होती है; जो उत्‍पादन पद्धति प्रभुत्‍वशाली होती है, उससे उस सामाजिक संरचना का चरित्र तय होता है। मिसाल के तौर पर, उत्‍पादन पद्धतियों के तन्‍तुबद्धीकरण में यदि पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति प्रभुत्‍वशाली है, तो वह पूंजीवादी सामाजिक संरचना कही जायेगी। लेकिन श्‍यामसुन्‍दर यह भी दावा करते हैं कि पूंजीवादी समाज के आर्थिक आधार, यानी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के कुल योग में केवल पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के कुल योग को गिना जायेगा, न कि प्राक्-पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के अवशेषों को। गलत! यहां श्‍यामसुन्‍दर उत्‍पादन पद्धति और सामाजिक संरचना के बीच के अन्‍तर को समझने में अपनी पूर्ण असमर्थता को प्रदर्शित करते हैं। वास्‍तव में, पूंजीवादी समाज के आर्थिक आधार में शुद्ध रूप से पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के अलावा प्राक्-पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध भी मौजूद होते हैं, लेकिन वे पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों द्वारा सहयोजित, रूपान्‍तरित और मातहतीकृत (subsume) किये जाते हैं, और इस रूप में उनका उत्‍सादन (sublation) ही होता है। इस पहलू पर हम बाद में आएंगे, लेकिन पहले मार्क्‍स के इस उद्धरण पर गौर करें:

”समाज के हर रूप में यह निर्धारक उत्‍पादन और इसके द्वारा पैदा उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध होते हैं जो अन्‍य सभी उत्‍पादन रूपों के और उनके द्वारा जनित उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के स्‍थान को निर्धारित करते हैं।” (मार्क्‍स, ‘प्रस्‍तावना’, राजनीतिक अर्थशास्‍त्र की आलोचना में योगदान, ज़ोर हमारा)

जैसा‍ कि इस उद्धरण से स्‍पष्‍ट है, आर्थिक आधार कोई एक ही प्रकार के उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों की शुद्ध संरचना नहीं होती, बल्कि उसमें कई प्रकार के उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों का तन्‍तुबद्धीकरण होता है, जिसमें कि निर्धारक या प्रभुत्‍वशाली उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध अन्‍य प्रकार के उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों को अपने अनुसार सहयोजित करते हैं और उनके स्‍थान और महत्‍व को निर्धारित करते हैं। श्‍यामसुन्‍दर की आर्थिक आधार की अवधारणा बचकानी और कठमुल्‍लावादी है, जिसके अनुसार किसी भी समाज के आर्थिक आधार में केवल एक ही प्रकार के उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों का योग होता है। मार्क्‍स की यह अवधारणा कतई नहीं थी। निश्चित तौर पर, किसी भी आर्थिक आधार में किसी एक प्रकार के उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध हीनिर्धारक और प्रभुत्‍वशील भूमिका निभाते हैं। लेकिन अन्‍य उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध भी उस आर्थिक आधार में मौजूद होते हैं, जो कि प्रभुत्‍वशील उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों द्वारा मातहतीकृत, संसाधित और सहयोजित किये जाते हैं। यदि आप ‘पूंजी’ के पहले खण्‍ड का अध्‍ययन करें तो मार्क्‍स ने इंग्‍लैण्‍ड के पॉटरी व बेकरी उद्योग का उदाहरण देते हुए बताया है कि ये ऐसे सेक्‍टर हैं जहां प्राक्-पूंजीवादी उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध पूंजीवादी सम्‍बन्‍धों द्वारा (अति)निर्धारित होते हैं।

अब इस उपरोक्‍त उद्धरण में मौजूद श्‍यामसुन्‍दर की दूसरी बेवकूफी पर आते हैं। यहां पर श्‍यामसुन्‍दर ने ‘जाति व्‍यवस्‍था’ को एक उत्‍पादन पद्धति के समानार्थी के तौर पर इस्‍तेमाल किया है, जो कि उनके लिए सामन्‍ती उत्‍पादन व्‍यवस्‍था का पर्याय है। एक बार फिर कहना होगा कि श्‍यामसुन्‍दर को जाति व्‍यवस्‍था के इतिहास के बारे में थोड़ा अध्‍ययन करने की आवश्‍यकता है। श्‍यामसुन्‍दर ने हमारे पेपरों को समझा ही नहीं है क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि हम पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति को ‘पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था’ कह रहे हैं। यह दिखलाता है कि श्‍यामसुन्‍दर सामान्‍य हिन्‍दी वाक्‍य भी नहीं समझ पाते हैं। यहां समकालीन जाति व्‍यवस्‍था के चरित्र निर्धारण को ‘पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था’ कहा गया है, न कि पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति को। श्‍यामसुन्‍दर के इस निपट दिमागी दीवालियेपन पर आगे आएंगे। दूसरी बात, जाति व्‍यवस्‍था न तो अपने आप में कोई उत्‍पादन पद्धति है और न ही यह सामन्‍ती उत्‍पादन पद्धति का समानार्थी है। इसलिए यह कहना कि पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था की बात करना वैसा ही है जैसा कि पूंजीवादी सामन्‍ती व्‍यवस्‍था के बारे में बात करना, परले दर्जे की नासमझी है। जाति व्‍यवस्‍था एक सामाजिक-आर्थिक व्‍यवस्‍था है, जिसके ऐतिहासिक तौर पर तीन बुनियादी आयाम हैं, जो कि इतिहास के अलग-अलग दौरों में बदलती उत्‍पादन पद्धति के साथ अस्तित्‍व में आये, विकसित हुए और उनमें से कुछ आयाम बदलती उत्‍पादन पद्धतियों के साथ ही खत्‍म हुए या खत्‍म होने की ओर अग्रसर हुए; ये तीन आयाम हैं आनुवांशिक श्रम विभाजन, सजातीय विवाह की परम्‍परा और अस्‍पृश्‍यता। इनमें से दो आयाम, यानी आनुवांशिक श्रम विभाजन और सजातीय विवाह समाज में मौजूद सम्‍पत्ति सम्‍बन्‍धों व श्रम विभाजन की संरचना को प्रभावित करते हैं और एक दौर में उन्‍हें काफी हद तक निर्धारित करते थे। पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति के उदय के साथ जाति व्‍यवस्‍था के कौन से आयाम क्षीण हुए, पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के साथ विशिष्‍ट रूप में समायोजित व सहयोजित हुए और कौन से आयाम बचे रहे, इस पर हम आगे आएंगे। लेकिन अभी इतना स्‍पष्‍ट करना काफी है कि जाति व्‍यवस्‍था अपने आप में कोई उत्‍पादन पद्धति नहीं है और न ही वह सामन्‍ती उत्‍पादन सम्‍बन्‍ध का समानार्थी है। इसलिए एक पूंजीवादी जाति व्‍यवस्‍था की उसी रूप में बात की जा सकती है, जैसे कि पूंजीवादी अस्‍वतन्‍त्र श्रम या अन्‍य प्रकार के श्रम रूपों की बात की जा सकती है, जो कि अस्तित्‍व में तो प्राक्-पूंजीवादी दौर में आये थे, लेकिन पूंजीवाद के प्रादुर्भाव के बाद पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति ने उन्‍हें सहयोजित किया और अपने अनुसार समायोजित भी किया। आइये, इसके एक ठोस उदाहरण की बात करते हैं, जिसकी मार्क्‍स ने चर्चा की है: दास प्रथा (slavery)। मार्क्‍स ने ‘पूंजी’ के पहले खण्‍ड में स्‍पष्‍ट तौर पर बताया है कि प्राक्-पूंजीवादी रोमन व ग्रीक दास प्रथा व संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका के दक्षिण में 1860 के पहले मौजूद दास प्रथा में क्‍या अन्‍तर था और किस प्रकार पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति ने दास प्रथा को अपने अनुसार सहयोजित और समायोजित किया था। निश्चित तौर पर, इस उदाहरण को जाति प्रथा के पूंजीवादी व्‍यवस्‍था द्वारा तन्‍तुबद्धीकरण, उत्‍सादन और सहयोजन पर हूबहू लागू नहीं किया जा सकता क्‍योंकि हर तुलना अधूरी होती है और इतिहास अपने आपको हूबहू दुहराता नहीं है।लेकिन अभी सिर्फ इतना समझने के लिए कि श्रम विभाजन व स्‍वामित्‍व के रूपों को प्रभावित करने वाली किसी सामाजिक-आर्थिक प्रथा या व्‍यवस्‍था को अलग-अलग उत्‍पादन पद्धतियां सहयोजित कर सकती हैं या नहीं और उस आधार पर, मिसाल के तौर पर, पूंजीवादी दासत्‍व या पूंजीवादी अस्‍वतन्‍त्र श्रम प्रथा की बात की जा सकती है या नहीं, हम इस उदाहरण को पेश कर रहे हैं, ताकि पाठक इस बाबत साफ़-नज़र हो जाये और श्‍यामसुन्‍दर की कूपमण्‍डूकता और अज्ञानता की ब्रॉडकास्टिंग की पहुंच से बाहर हो जाये। आइये देखें कि मार्क्‍स ने पूंजीवाद के मातहत दास प्रथा के सहयोजन और समायोजन के बारे में क्‍या लिखा है:

”यद्यपि यह स्‍पष्‍ट है कि किसी भी समाज की किसी भी आर्थिक संरचना में जहां विनिमय मूल्‍य की बजाय उपयोग मूल्‍य प्रभावी होता है, वहां अतिरिक्‍त श्रम आवश्‍यकताओं के कमोबेश सीमित समुच्‍चय के दायरे में सीमित होगा, और उत्‍पादन के चरित्र से ही अतिरिक्‍त श्रम की कोई असीमित भूख नहीं पैदा होगी…इसलिए अमेरिकी यूनियन के दक्षिणी प्रान्‍तों में नीग्रो श्रम का तब तक एक माध्‍यमिक रूप सेपितृसत्‍तात्‍मक चरित्र बना हुआ था जब कि उत्‍पादन तात्‍कालिक स्‍थानीय आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए निर्देशित था। लेकिन जैसे-जैसे कपास का निर्यात उन राज्‍यों का प्रमुख हित बनता गया, वैसे-वैसे नीग्रो लोगों से अतिरेकपूर्ण काम लेना, और कभी कभी श्रम के सात वर्षों में ही उसके जीवन को पूर्णत: खपा देना एक अच्‍छी तरह परिकलित और योजनाबद्ध व्‍यवस्‍था में एक कारक बन गया। अब उससे उपयोगी उत्‍पादों की एक निश्‍चित मात्रा प्राप्‍त करना कोई प्रश्‍न नहीं था, बल्कि स्‍वयं अतिरिक्‍त मूल्‍य का उत्‍पादन करना एक प्रश्‍न बन गया था। यही बात, मिसाल के तौर पर, दैन्‍यूबियन राज्‍यों के कॉर्वी व्‍यवस्‍था पर भी लागू होती है।” (कार्ल मार्क्‍स, 1990, ‘कैपिटल’, खण्‍ड-1, पेंगुइन, लंदन)

मार्क्‍स यहां बेहद स्‍पष्‍टता के साथ बता रहे हैं कि प्राक्-पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के दौर में दास प्रथा अमेरिका में अधिक से अधिक उपयोग मूल्‍यों के उत्‍पादन के लिए दिशा-निर्देशित थी और वहां श्रम व उसके उत्‍पादों से जुड़े सारे पहलू किसी व्‍य‍वस्थित गणना का विषय नहीं बने थे; लेकिन जैसे ही पूंजीवादी व्‍यवस्‍था ने जड़ जमाई वैसे ही दास प्रथा उसके द्वारा सहयोजित हुई, समायोजित हुई और अब उसका मकसद अधिक से अधिक विनिमय मूल्‍य पैदा करना था और वह एक व्‍यवस्थित और सख्‍त पूंजीवादी एकाउंटिग तन्‍त्र के मातहत आ गया था। इसी के आगे मार्क्‍स ने बताया था कि दास के जीवन प्रत्‍याशा तक को पूंजीपति प्‍लाण्‍टरों ने आने-पाई की गणना के समान पूर्वानुमानित कर लिया था और उनका मकसद होता था दासों के इसी छोटे से जीवन में उनपर होने वाले खर्च से कहीं ज्‍यादा विनिमय मूल्‍य निकलवाया जा सके। यह एक पूंजीवादी दास प्रथा थी न कि रोमन दास उत्‍पादन पद्धति या यूनानी दास उत्‍पादन पद्धति के दौर की दास प्रथा। यह मार्क्‍स के बौद्धिक जीवन के उत्‍तरार्द्ध का विचार नहीं था, बल्कि ‘दर्शन की दरिद्रता’ में 1847 में मार्क्‍स ने अमेरिका में पूंजीवाद द्वारा दास प्रथा के अपने हितों के अनुसार समायोजन और सहयोजन की बात की थी और यह दास प्रथा अमेरिका के पूंजीवाद के मात्र अधिरचना में मौजूद प्राक्-पूंजीवादी अवशेष नहीं था। देखें मार्क्‍स ने क्‍या लिखा है:

”प्रत्‍यक्ष दास प्रथा बुर्जुआ उद्योग की वैसे ही धुरी है जैसे कि मशीनरी, क्रेडिट, आदि। बिना दास प्रथा के आपके पास कपास नहीं होगा; बिना कपास के आपके पास कोई आधुनिक उद्योग नहीं रहेगा…दास प्रथा सर्वाधिक महत्‍व की आर्थिक श्रेणी है। बिना दास प्रथा के उत्‍तरी अमेरिका, सभी देशों में सबसे प्रगतिशील देश, एक पितृसत्‍तात्‍मक देश में तब्‍दील हो जायेगा। विश्‍व के नक्‍शे से उत्‍तरी अमेरिका को हटा दीजिया, और आपको अराजकता मिलेगी — आधुनिक वाणिज्‍य और सभ्‍यता का पूर्ण क्षरण…इस प्रकार दास प्रथा, क्‍योंकि यह एक आर्थिक श्रेणी है, हमेशा से लोगों की संस्‍थाओं में मौजूद रही है। आधुनिक राष्‍ट्रों ने अपने देशों में दास प्रथा को केवल ढंकने में सफलता हासिल की है, लेकिन नयी दुनिया में उन्‍होंने इसे बिना किसी नकाब के लागू कर दिया है।” (कार्ल मार्क्‍स, दि पावर्टी ऑफ फिलॉसफी, इण्‍टरनेशनल पब्लिशर्स, न्‍यूयॉर्क, पृ. 94-5, ज़ोर हमारा)
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