देश -विदेश में प्रख्यात साहित्यकार थे: डाॅ0 महावीर सिंह---- डाॅ0 हरिश्चन्द्र शाक्य

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देश -विदेश में प्रख्यात साहित्यकार थे: डाॅ0 महावीर सिंह---- डाॅ0 हरिश्चन्द्र शाक्य

Post by admin » Thu Dec 06, 2018 7:17 pm

श्रद्धा सुमन
देश में प्रख्यात साहित्यकार थे: डाॅ0 महावीर सिंह---- डाॅ0 हरिश्चन्द्र शाक्य, डी0 लिट्0

डाॅ0 महावीर सिंह हाइकु नगरी रायबरेली के उन साहित्यकारों में से एक थे जिनका हिन्दी हाइकु काव्य तथा अन्य जापानी काव्य विधाओं को विष्व स्तर पर अपना अप्रतिम योगदान है। वे न केवल जापानी काव्य विधाओं के सर्जक थे अपितु वे कहानी, संस्मरण, नई कविता, खण्ड काव्य आदि विधाओं के भी अच्छे रचनाकार थे। देष-विदेष में प्रख्यात साहित्यकार डाॅ0 महावीर सिंह का जन्म 15 जुलाई 1935 को उत्तर प्रदेष के रायबरेली जनपद के निकटवर्ती जनपद उन्नाव के ग्राम रग्धू खेड़ा (पोस्ट बारा) में श्री दर्षन सिंह एवं श्रीमती धीरज देवी के पुत्र के रूप में हुआ था। आपने बी0 वी0 एस-सी0 एण्ड ए0 एच तक षिक्षा प्राप्त की तथा उत्तर प्रदेष षासन के पषुपालन विभाग में मुख्य पषु चिकित्साधिकारी के राजपत्रित पद पर कार्य करते हुए सेवा निवृत्त हुए। गीत जो गूँजे नहीं (गीत संग्रह), मन की पीड़ा (हाइकु/त्रिषूल संग्रह-2001), प्यार के बोल (हाइकु संग्रह 2002), हाइकु सरगम (2004), हाइकु उद्भव एवं विकास (2008), आपकी मौलिक प्रकाषित कृतियाॅ हैं तथा रायबरेली की हाइकु साधना आपकी संपादित प्रकाषित कृति है। डाॅ0 महावीर सिंह ने अपने मौलिक लेखन की पाँच पाण्डुलिपियाँ और भी तैयार की थीं किन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि वे उनके जीवन काल में प्रकाषित नहीं हो पायीं ।इन पाण्डुलिपियों में ‘बोलों न (नई कविता संग्रह), भूले नहीं भुलाये जो (संस्मरण), एकदाकाष्चिद (कहानी संग्रह), आजाद सदा आजाद रहा (खण्डकाव्य) तथा काव्य संग्रह षामिल हैं।
डाॅ0 महावीर सिंह की यूँ तो समस्त कृतियाँ बड़े ही महत्व की हैं किन्तु उनकी कृति ‘हाइकु उद्भव एवं विकास‘ ऐसी बन पड़ी है जिसने उन्हें अन्तर्राश्ट्रीय ख्याति दिलाई है। उनकी यह कृति वास्तव में एक संदर्भ ग्रंथ बन गई है जिसका सैकड़ों पुस्तकों में उल्लेख हैं। आप ‘प्रतीक प्रतिबिम्ब‘ व लघु पत्रक ‘त्रिषूल‘ के प्रधान सम्पादक पदों पर रहते हुए साहित्य की अनन्य सेवा करते रहे।
मैंने सन् 2009 में अपना हाइकु संग्रह ‘पूरब की बाँसुरी-पष्चिम की तान‘ प्रकाषित कराया तब उसकी विषिश्ट भूमिका लिखने हेतु हिन्दी हाइकु साहित्य का गहन अध्ययन करते समय मैं डाॅ0 महावीर सिंह के नाम को पहचान गया था। उस समय ही मैं रायबरेली के लगभग समस्त हाइकुकारों के नामों से परिचित हो गया था। अन्य हाइकुकारों एवं हाइकु समीक्षकों के साथ-साथ मैंने डाॅ0 महावीर सिंह को भी अपना हाइकु संग्रह समीक्षार्थ भेजा था। डाॅ0 सिंह ने उसकी सारगर्भित समीक्षा लिखकर मुझे प्रेशित की थी। गत वर्श 2018 में मैं रायबरेली की तहसील डलमऊ स्थित मुराई का बाग में निराला स्मृति संस्थान द्वारा आयोजित निराला स्मृति समारोह की रजत जयंती में चक्रवर्ती राजा डालदेव सम्मान-2017 प्राप्त करने गया तो वहाँ मेरी आपसे मुलाकात हुई। वे मेरे नाम से तो परिचित थे ही। मुझसे मिलकर बड़ी आत्मीयता से उन्होनें कहा कि आपसे मिलकर सचमुच ही बेहद खुषी हुई और मेरा आना सार्थक हो गया। मैंने उनसे कहा कि मैं आपकी पुस्तक ‘हाइकु उद्भव एवं विकास‘ पढ़ना चाहता हूँ। उन्होनें अपनी सारी पुस्तकें डाक से भेजने का वादा किया और समीक्षा लिखने को भी कहा। अपने वादे के अनुसार उन्होंने अपनी छह पुस्तकें मुझे डाक द्वारा पे्रशित कर दीं। मुझे इस बात का खेद रहा कि मैं उनके जीवन काल में उनकी किसी पुस्तक की समीक्षा न लिख सका। उनसे हुई प्रथम मुलाकात ही अंतिम मुलाकात बन गई।
‘गीत जो गूँजे नहीं‘ डाॅ महावीर सिंह का एक गीत संग्रह है। यह गीत संग्रह मेरे पास नहीं है इसलिए उस पर चर्चा कर पाना संभव नहीं हैं। उनकी कृति ‘मन की पीड़ा‘ में 218 हाइकु/त्रिषूल, एक हाइकु गीत, पन्द्रह ताँका, ग्यारह सेदोका तथा दो चोका संग्रहीत हैं। नवनीत हिन्दी डाइजेस्ट के संपादक डाॅ0 गिरिजा षंकर त्रिवेदी ने इसकी भूमिका में इन्हें एक प्रयोगधर्मी और माँटी से जुड़ा रचनाकार बताया है। इस संग्रह के कतिपय हाइकु वानगी के तौर पर प्रस्तुत है-
चुनावी खेल/ कल थे विरोध में/ आज है मेल।
फागुनी रंग/ बाबा देवर लगे/ ऐसी उमंग।
राजनीति है/ साँप-सीढ़ी का खेल/ झेलम-झेल।
सच में दम/ सदैव सच बोलो/ निर्भय होलो।
उनकी कृति ‘प्यार के बोल‘ में 255 हाइकु/ त्रिषूल, दस ताँका, सात सेदोका, तीन त्रिषूल गीत संग्रहीत हैं। इस संग्रह के कतिपय हाइकु दृश्टव्य हैं-
आतंकवादी/ कोई धर्म न जाति/ अति उन्मादी।
बटोरें वोट/ जाति धर्म के नाम/ नेता तमाम।
किसान दाता/ जग जन-पालक/ दुख उठाता।
वीर जवान/ देष हित अर्पित/ करते प्रान।
देव की नहीं/ पुजारी की दासियाँ/ देव दासियाँ।
‘हाइकु सरगम‘ डाॅ महावीर सिंह की एक प्रयोगधर्मिता की पुस्तक है। इस पुस्तक में आठ षीर्शकों में निबद्ध उनकी वाणी वंदना, हाइकु लोकगीत, हाइकु गीत, हाइकु, हाइकु कविता, हाइकु ग़ज़ल, हाइकु मुक्तक, स्फुट हाइकु, हाइकु अनुवाद आदि रचनाएँ हैं। पुस्तक में संग्रहीत एक हाइकु व्यंग्य गीत की कुछ पंक्तियाँ देखें-
मैं तो नेता हूँ/ बालू भरी नदी में/ नौका खेता हूँ।
बेकारी में था/ कुछ दिन पहले/ झोला ढोता था।
नेताजी संग/ रहा घूमता खाता/ द्वारे सोता था।
चमचा था/ बदल गया अब/ खुद नेता हूँ।
पुस्तक में संग्रहीत एक हाइकु ग़ज़ल के चंद षेर देखें-
समंदर में/ अपने नयनों के/ डूब जाने दो।
अषिक तेरा/ नयनों में डूब के/ तिर जाने दो।
ग् ग् ग्
जिंदगी मेरी/ दुखों की है कहानी/ सुनाऊँ किसे
कुछ पल को/ पलकों के साये में/ बैठ जाने दो।
‘हाइकु उद्भव एवं विकास‘ डाॅ0 महावीर सिंह का षोधपरक हिन्दी हाइकु साहित्य का इतिहास ग्रंथ है। इस पुस्तक के खण्ड अ में उन्होंने जापानी कविता का इतिहास, जापानी साहित्य का इतिहास और मुख्य आदि कवि ग्रंथ, जापान के साहित्यिक खेल, हाइकु का उद्भव, सेनेर्यु का जन्म, हाइकु का कला पक्ष, किरेजी षब्द, जापानी आदि काव्य चितेरे, खण्ड ब में हिन्दी हाइकु की विकास यात्रा, हिन्दी हाइकु, सेनेर्यु, हिन्दी हाइकु का कला पक्ष, हिन्दी हाइकु के तुकांतता, त्रिवाक्यीय या क्रियात्रिक हाइकु, हाइकु का भारतीय नामकरण, ऋतुबोधक षब्दो का प्रयोग, जापानी हाइकु और संस्कृत वाङ्मय हिन्दी हाइकु परिभाशाएँ और दृश्टिकोण, अनुवाद कर्म खण्ड स में हिन्दी हाइकु अभिनव प्रयोग, हिन्दी हाइकु का भविश्य आदि विशयों पर गहनता से चर्चा की गई है।
डाॅ महावीर सिंह जी रायबरेली के बहुचर्चित हाइकुकार श्री षंभुषरण द्विवेदी ‘बन्धु‘ द्वारा किये गये हाइकु के भारतीय नामकरण ‘त्रिषूल‘ के पक्षधर रहे हैं। वे अपनी पुस्तक ‘ हाइकु उद्भव एवं विकास में लिखते हैं, ‘‘ हाइकु काव्य के षोधकर्मी रचनाकार षम्भु षरण द्विवेदी ‘बन्धु‘ ने यह साहसी कदम उठाते हुए हाइकु का भारतीय नामकरण कर उसे ‘त्रिषूल‘ की संज्ञा प्रदान की। त्रिषूल नामकरण के पीछे भगवान षंकर का अमोघ अस्त्र ‘त्रिषूल‘ और त्रिषूल छंद (5-7-5 अक्षर क्रम) का तीन, लघु दीर्घ पंक्तियों की विशमता ही आधार है। त्रिषूल छंद की प्रथम और तृतीय पंक्ति (5-5 अक्षर क्रम की) समान होती हैं तथा द्वितीय (मध्य की) पंक्ति बड़ी होती है। इसी प्रकार त्रिषूल षस्त्र में किनारे के दोनों फाल बराबर होते हैं। जबकि बीच का फाल बड़ा होता है। इस प्रकार से त्रिषूल नामकरण सटीक और सार्थक है। इसी पुस्तक में वे बताते हैं, ‘‘हाइकु रचना में षब्दों में जो कुछ कहा जाता है वह संकेत मात्र होता है षेश पाठक के समझने के लिए ‘अनकहा‘ छोड़ दिया जाता है। लेकिन यह अनकहा कहे से अधिक महत्वपूर्ण होता है।‘‘ इसी पुस्तक में एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं, ‘‘ यह एक सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य है कि बौद्ध धर्म भारत में श्रीलंका, मलेषिया और चीन आदि देषों में गया था। चीन से ही कोरिया होता हुआ छठी षताब्दी के मध्य जापान पहुँचा। बौद्ध धर्म की इस प्रचार-प्रसार यात्रा में भारतीय सभ्यता और कला कौषल भी उसके साथ-साथ सभी देषों में पहुँचा।‘‘ डाॅ0 महावीर सिंह की इस पुस्तक के बारे में लिखा है, ‘‘ अब तक रायबरेली जनपद में कई हाइकु कविताएँ तथा हाइकु संग्रह प्रकाषित हो चुके हैं लेकिन ऐसी कोई पुस्तक अभी तक प्रकाष में नहीं आई है जो हाइकु के उद्भव इतिहास और विकास की सम्यक जानकारी प्रदान कर सके। दृढ़ संकल्पों के धनी डाॅ0 महावीर सिंह ने इस कमी को पूर्ण करने तथा हाइकु के सम्बन्ध में विस्तृत तथा प्रमाणित जानकारी देने के उद्देष्य से ‘हाइकुः उद्भव एवं विकास‘ की रचना करके साहित्य जगत को अनमोल धरोहर दिया है।‘‘
‘रायबरेली की हाइकु साधना‘ डाॅ0 महावीर सिंह द्वारा संपादित पुस्तक है। इस पुस्तक में उन्होंने रायबरेली जनपद के तीस हाइकुकार कवियों के परिचय तथा उनके हाइकु प्रकाषित किये हैं। इन कवियों में अषोक कुमार मिश्र, आषारानी श्रीवास्तव, इफ्तिखार अहमद खाँ ‘राना‘ कमला षंकर त्रिपाठी, कुसुम लता त्रिपाठी, स्वामी गीता नंद ‘गिरि‘, जवाहर ‘इन्दु‘, देव नारायण त्रिवेदी ‘देव‘, पवन कुमार जैन, वृंदावन वर्मा, भोलानाथ श्रीवास्तव ‘गगन‘, मधु वर्मा, डाॅ0 महावीर सिंह, माता प्रसाद विष्वकर्मा ‘अकेला‘ डाॅ0 रमाकांत श्रीवास्तव, डाॅ0 रमाकांत त्रिपाठी, डाॅ0 रमेष कुमार त्रिपाठी, राजेन्द्र बहादुर सिंह ‘राजन‘, राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी ‘बंधु‘ रामनरेष वर्मा, राम नारायण ‘रमण‘, राम निवास ‘पंथी‘, षंभुषरण द्विवेदी ‘बंधु, डाॅ0 षिव बहादुर सिंह भदौरिया, षिवा श्रीवास्तव, एस0पी0 पाण्डे, संतराम वर्मा ‘सत्येन्द्र‘, सरला साहू, सितांषु कुमार, आचार्य सूर्य प्रसाद षर्मा ‘निषिहर‘ आदि षामिल हैं।
कलम के धनी, प्रख्यात हाइकुकार, साधक रचनाकार डाॅ0 महावीर सिंह ने हिन्दी साहित्य को कालजयी कृतियाँ दी हैं वे सदा अमर रहेंगी। गत 28 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो चुका है। उनके निधन से हिन्दी साहित्य जगत की अपूर्णीय क्षति हुई है जिसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता। मेरे श्रद्धा सुमन उन्हें समर्पित हैं।

- डाॅ0 हरिष्चन्द्र षाक्य, ‘डी0लिट्0
षाक्य प्रकाषन, घंटाघर चैक
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स्थाई पता- ग्राम कैरावली, पोस्ट तालिबपुर
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