हवेली-----Blogger

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हवेली-----Blogger

Post by admin » Wed Sep 13, 2017 7:09 pm

[कथा सागर] हवेली
Blogger <no-reply@blogger.com> Wed, Sep 13, 2017 at 7:06 PM
To: swargvibha@gmail.com
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जून का महीना और समय दोपहर के लगभग ढाई बजे राजस्थान के राज्यमार्ग पर विवेक अपने मित्र सुदर्शन के साथ कार में सफर कर रहे थे।
"दर्शी आज गर्मी कुछ अधिक है, कार का एयर कंडीशनर भी काम नही कर रहा है।" विवेक ने सुदर्शन से कहा जो कार के स्टेरिंग पर एकग्रता से बैठा था।
नाम तो सुदर्शन है पर सब मित्र और परिवार में उसे दर्शी ही कहते थे। उम्र चालीस हो गई परंतु बचपन का प्यार का नाम दर्शी प्रचलित हो गया। यही हाल विवेक का था जिसका बचपन का नाम विक्की प्रचलित हो गया।
"विक्की, एक तो जून का महीना, दोपहर का समय जब गर्मी का प्रकोप सबसे अधिक होता है और सबसे ऊपर राजस्थान। कार का एयर कंडीशनर बेचारा कर भी क्या सकता है।"
"दर्शी थोड़ी देर रुक कर कुछ आराम कर लिया जाए।"
"विक्की दूर तक रेत के टीले नजर आ रहे हैं, कुछ रुकने के लिए नजर आए तब कुछ आराम करते हैं।"
"दर्शी हम आजतक राजस्थान के अंदरूनी जगह नही आए। जयपुर, अजमेर और उदयपुर तक ही सीमित रहे। आज हमें एक चुनौती मिली है राजस्थान के एकदम अंदरूनी जगह जहां हमें अपना हुनर दिखाना है।"
"विक्की हम उस सेठ की बातों में आकर एक चुनौती स्वीकार की है, क्या हमारी मेहनत का पैसा मिलेगा?"
"दर्शी दिल छोटा मत कर, इन सेठों के पास ख़ज़ानों की कोई कमी नही है।"
"यार विक्की आधा घंटा हो गया है रेत का जंगल समाप्त ही नही हो रहा है। जून के महीने की दोपहर में यदि कार का एसी ने जवाब दे दिया तब क्या हालत होगी तू इसबारे में सोच?"
"दर्शी जो होगा देखा जाएगा, अब क्या कर सकते हैं।"

विवेक और सुदर्शन दोनों बचपन के मित्र, स्कूल से ही लंगोटिया यार, पेशे से आर्किटेक्ट, एक साथ पार्टनरशिप में काम करते हैं। एक महीने पहले उदयपुर में एक हवेली नुमा कोठी का नक्शा विवेक और सुदर्शन ने बनाया। कोठी बन कर जब तैयार हुई, उसकी जम कर तारीफ हुई। आज के आधुनिक युग में पुरानी हवेली जैसी कोठी का निर्माण विवेक और सुदर्शन के देखरेख में हुआ। पुराने नक्शे में कोठी के अंदर सभी आधुनिक सुविधाएं इस तरह से दी कि हवेली का अंदाज बरकरार रहे। गृह प्रवेश में हवेली के मालिक ने एक शानदार दावत दी जिसमें राजस्थान के धन्ना सेठों की पूरी बिरादरी एकत्रित थी। विवेक और सुदर्शन के काम से प्रभावित होकर सेठ पन्नालाल ने उन्हें अपने लिए हवेली निर्माण का कार्य सौंपा। सेठ पन्नालाल ने अपने पुशतैनी मकान की जमीन पर विशाल हवेली के निर्माण का जिम्मा विवेक और सुदर्शन को दिया।

गर्मी में कार चलाते हुए दोनों आशंकित हो रहे थे कहीं कार जवाब न दे जाए। कार का एसी न के बराबर ठंडा कर रहा था और पीने का पानी भी समाप्त हो गया। दोनों का गला प्यास से सूखने लगा तभी उन्हें आबादी नजर आने लगी। एक छोटा सा गांव आ गया। गांव में ट्रक रिपेयर की वर्कशॉप थी। कुछ दुकाने थी पर दोपहर के कारण बन्द थी। सुदर्शन ने कार ट्रक रिपेयर वर्कशॉप के पास रोकी। एक मिस्त्री वर्कशॉप से बाहर आया।

"साहब कार दिखानी है, ठीक हो जाएगी। हमारी वर्कशॉप ने स्कूटर, बाइक से लेकर कार, ट्रक सभी रिपेयर होते हैं।"
विवेक और सुदर्शन उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिए। भारत तरक्की पर है एक ही जगह सभी सुविधाएं हैं और वो भी गांव में।
"कार तो ठीक है पर गर्मी बहुत है। पीने के लिए पानी चाहिए।"
उस आदमी ने आवाज दी। एक लड़का वर्कशॉप से निकला और साथ वाली दुकान खोली। किराने का सभी सामान मौजूद था।
"क्या लोगे साहब, सब कुछ मिलेगा। कोल्ड ड्रिंक्स और ठंडी बियर। क्या पिओगे साहब?"
"अभी तो सदा पानी मिल जाये। बाकी तो बाद में देखते हैं।"
पानी पीने के बाद विवेक और सुदर्शन वहां रखी चारपाई पर बैठ गए।
"थकान हो गई है क्या सोचता है विक्की, थोड़ा आराम कर लें?" सुदर्शन ने विवेक से उसकी राय पूछी।
"अगर आराम के लिए थोड़ी भी जगह मिल जाए?"
सुदर्शन ने वर्कशॉप वाले आदमी से थोड़ी देर आराम करने के लिए थोड़ी जगह के लिये बात की।
"साहब अपने कहां जाना है?"
"रंग बंगड़ू में सेठ पन्नालाल के यहां जाना है। वे अपने पुश्तैनी घर पर एक हवेली का निर्माण करवाना चाहते हैं। हम दोनों आर्किटेक्ट हैं।"
"रंग बंगड़ू वैसे तो लगभग अस्सी किलोमीटर होगा, परन्तु यहां से आगे सड़क का भरोसा नही है। सड़क पक्की जरूर है। रेत उड़ती है तब सड़क पर सिर्फ रेत ही रेत नजर आती है। कार चलाने में दिक्कत हो सकती है। मेरा अनुरोध है कि आप रात यहीं गुजारिये। सुबह चले जाना। ठंडे समय रेत नही उड़ती।"
"रात रुकने का स्थान मिल सकेगा?" सुदर्शन ने पूछा।
"आप सामने देखिए। आपको एक हवेली नजर आएगी।"
"जो ऊंचा मकान है, क्या उसकी बात कर रहे हो?" विवेक ने हाथ से इशारा करते हुए पूछा।
"जी साहब, यह हवेली सेठ मूंगालाल की है। यह छोटा सा गांव उन्ही का बसाया हुआ है। आप वहां रुकिए।"
"हम उन्हें जानते नही, क्या वो हमें रुकने देंगे?"
"हवेली के कुछ कमरे मेहमानों के लिए है। आप वहां रुक सकते हैं। चलिए मैं अपको वहां ले चलता हूं।"

कार में बैठ कर तंग गली से गुजरते हुए हवेली के गेट तक पहुंचे। मुख्य सड़क से हवेली तक कच्चे-पक्के कहीं एक मंजिल के और कहीं दो मंजिल के मकान थे। गली के दोनों ओर मकान थे और हवेली पर गली समाप्त गई। गली के ठीक सामने हवेली का बहुत बड़ा दरवाजा बंद था। हवेली की दीवार से कार सटा कर पार्क की। जैसे किसी किले का बड़ा सा दरवाजा होता है ठीक कुछ उसी तरह का दरवाजा हवेली का था। विवेक और सुदर्शन क्योंकि आर्किटेक्ट थे, वे बहुत सूक्षम दृष्टि से दरवाजे पर हुई नक्काशी का निरीक्षण करने लगे। नक्काशी धूल से लथपथ थी और एक पुराने इतिहास की कहानी बता रही थी।
"दर्शी कम से कम एक सौ वर्ष पुरानी हवेली लग रही है। दरवाजे की नक्काशी अपनी जन्म तिथि बतला रही है।"
"विक्की एकदम ठीक।"
उस बड़े दरवाजे में एक छोटा दरवाजा था। वह खुला और सभी अंदर गए। हवेली की देखभाल करने वाले रखवालों में से एक रखवाले ने दरवाजा खोला। वर्कशॉप वाले सज्जन ने उससे कुछ बात की जिसके बाद उस रखवाले ने हवेली की बैठक खोली। धूल देखकर विवेक और सुदर्शन समझ गए कि हवेली के मालिक यहां कभी आते नही। रखवाले ने कुर्सियां पौंछ कर साफ की।
"आए साहब जी, थोड़ा आराम कीजिये। चाय लेगें?"
विवेक और सुदर्शन ने हामी भर दी। आरामकुर्सी पर आगे-पीछे धीरे-धीरे झूलते हुए हवेली का निरीक्षण करने लगे। बैठक बहुत बड़ी थी जो तीन मंजिल तक ऊंची थी। दूसरी और तीसरी मंजिल पर खिड़कियां थी। तभी चाय आ गई। बोनचाइना के सुंदर कप में चाय की चुस्कियां लेते हुए विवेक ने रखवाले से पूछा "क्या नाम है आपका?"
"मेरा नाम भंवर कुमार है।"
"कब से इस हवेली में हो?"
"मैं जो जनाब पैदा ही हवेली में हुआ हूं। मेरे दादा फिर मेरे पिता और अब मैं इस हवेली को संभाल रहा हूं।"
"बहुत खूब यह सेवा भी किस्मत से मिलती है।"
"जी जनाब, चाय कैसी लगी?"
"चाय एकदम मस्त है, तुलसी और अदरक के स्वाद से चाय पौष्टिक हो जाती है।"
"यह तो है जनाब।"
"कुछ इस हवेली के बारे में बताओ। देखने मे बहुत पुरानी लगती है?"
"यह हवेली दो सौ वर्ष पुरानी है। एक सौ वर्ष से तो हमारा परिवार इस हवेली के रक्षक हैं। आजकल सेठ मूंगालाल मालिक हैं। अस्सी के लपेटे में होंगे, कुछ तबियत ठीक नही चल रही है इसलिए अब यहां आते नही। बहुत बड़े व्यापारी हैं, देश-विदेश में ऑफिस हैं। दौलत बेशुमार हैं। लक्ष्मी का समुन्दर है उनके पास। बोरो में रकम पड़ी रहती है। मूंगालाल के पुरखों ने यह हवेली बनवाई थी। मूंगालाल के बच्चे अब नही आते यहां। विदेश में अधिक रहते हैं।"
"भंवर हम आर्किटेक्ट हैं, इस हवेली को नजदीक से देखना चाहते हैं। हम रंग बंगड़ू में सेठ पन्नालाल के पुशतैनी मकान पर एक हवेली के निर्माण के सिलसिले में जा रहे हैं। आर्किटेक्ट होने के नाते हवेली देखने की उत्सुकता है।"
"जनाब अभी धूप और गर्मी बहुत है, शाम के समय आपको हवेली के दर्शन करवाएगें।"
"हमें आगे रंग बांगड़ू भी जाना है।"
"रंग बांगड़ू कल सुबह जाना, आज हमारे मेहमान रहिये। आपको हवेली देखने का आनंद रात को आएगा। बहुत रहस्य की बातें है, मुझे लगता है कि आप जानना चाहेंगे।"
भंवर कुमार की बातें सुनकर विवेक ने सुदर्शन की ओर देखा। गर्दन हिला कर सुदर्शन ने हामी भर दी। भंवर कुमार चला गया।

भंवर कुमार के जाने के पश्चात विवेक और सुदर्शन हवेली की बैठक का निरीक्षण करने लगे।
भंवर कुमार के मुताबिक हवेली दो सौ वर्ष पुरानी है। हवेली की बैठक बहुत बड़ी एक हॉल के बराबर थी। लाल किले के दीवाने-ए-खास जैसी, दूसरी और तीसरी मंजिल पर खिड़कियां बंद थी। दोनो ओर छ: छ: खिड़कियां अर्थात चौबीस खिड़कियां देख कर विवेक ने सुदर्शन से कहा। "दर्शी इन खिड़कियों को देख हवा महल की याद आ गई। मुझे ये कमरे लगते हैं। जैसे महल में राजा मंत्रियों से वार्तालाप करता था तब रानियां ऊपर झरोखों से देखती थी। कुछ इसी तरह जब हवेली के बुजुर्ग और पुरुष बैठक में बैठते होंगे तब बच्चे और महिलाएं अपने कमरे की खिड़की में से मूक दर्शक बनते होंगे। महिलाएं घूंघट में उस समय रहती थी।"
"विक्की बिल्कुल सही, अब इन झाड़फानूस को देखो। जरूर बेलजियम से मंगाए होंगे। सेठ ने दिल खोल कर हवेली बनाई है। ऊपर खिड़कियों के शीशे देखो, रंगीन नीले, पीले और हरे रंग के नक्काशी वाले शीशे। अब ये शीशे न तो बनते हैं और न ही कोई लगाता है। एकदम सादे शीशों पर फ़िल्म चढ़ती है।"
"दर्शी इन टाइल्स को देखो, उभरी हुई आकृतियां कितनी खूबसूरत लग रही है।"
"विक्की इधर देखो उमर खैयाम की तस्वीर को। अनगिनित टाइल्स को जोड़ कर बनाई तस्वीर अतुलनीय है।"
"दर्शी आजकल यह कला लुप्त हो गई है। वो खूबसूरत कलाकृति लाजवाब है।"
"विक्की राजस्थान में वास्तुकला देखने लायक है। महल और हवेलियां एक से बढ़ कर एक हैं।"
"दर्शी बैठक का गुम्बद देखो, रोशनी आ रही है।"
"विक्की हवेली दो सदी पुरानी है और रख-रखाव न के बराबर है। मुझे दरारें लग रही हैं जिनसे धूप छन कर आ रही है।"
बातें करते हुए दोनों मित्र हवेली को देखने बैठक से बाहर आये। हवेली के पिछले भाग में बहुत बड़ा बगीचा था जिसमें फुहारे लगे थे। फलदार पेड़ शोभा बढ़ा रहे थे। रख-रखाव की कमी साफ झलक रही थी परंतु पेड़ फलों से लदे हुए थे। एक तरफ गुलाब के फूलों की क्यारियां थी और पीछे सब्जियों की बागवानी।
"दर्शी देख फल, फूल और सब्जियां सभी हवेली के अंदर। सुख सुविधा का पूरा प्रबंध है। यह एक छोटा महल नुमा हवेली है।"

दोनों मित्र बातें कर रहे थे कि भंवर कुमार वहां मिल गया। भंवर कुमार अपने परिवार समेत पिछले भाग में बने सेवक निवास में रहता था। दोनों भंवर कुमार से हवेली का इतिहास जानने के लिए उत्सुक थे। भंवर कुमार ने बताना आरम्भ किया।
"इस गांव को सेठ मूंगालाल के पूर्वजों ने बसाया था। इस गांव के आसपास कई और गांव और हवेलियां थी। गांव और हवेली की पंक्ति रंग बांगड़ू पर समाप्त होती थी। इस हवेली के पीछे पर्वत है। पर्वत की चोटी पर देवी का मंदिर है। चाहे आप हवेली को पुरानी और खंडर समझे परंतु इस हवेली और गांव पर कभी कोई आंच नही आ सकती है। दो सदियों से यह हवेली और गांव जीवित है। इसके आसपास मीलों तक आपको कोई बस्ती नजर आई और आगे भी नजर आएगी। आप रंग बांगड़ू जा रहे हैं वहां तक आपको कोई बस्ती नजर नही आएगी। लगभग सौ वर्ष पूर्व देवी के रुष्ठ होने पर सारी बस्तियां उजड़ गई लेकिन इस हवेली पर कोई आंच नही आई जिस कारण यह गांव बसा हुआ है।"
"यह कैसे संभव हो सकता है?" विवेक और सुदर्शन ने एक साथ पूछा।
"साहब यह एक रहस्य है जिसे मेरे सिवा कोई दूसरा नही जानता।"
विवेक और सुदर्शन की उत्सुकता बढ़ने लगी।
"भंवर कुमार हम ठहरे आर्किटेक्ट, बिना देखे समझेंगे नही?"
"ठीक है, रात के ठीक बारह बजे मैं आपको उस जगह ले जाऊंगा। आप आज रात यहीं रुकें।"

विवेक और सुदर्शन रात को हवेली में रुक गए। अमावस की रात थी। आसमान काला श्याह और बादल छाए हुए थे। दूर-दूर तक कोई नही था। गांववासी सभी नींद में थे। भंवर कुमार का परिवार भी सो रहा था। विवेक और सुदर्शन की आंखों में नींद नही थी। धीमी गति से हवा चल रही थी। शाम से बिजली चली गई थी। गांव में चौबीस घंटे बिजली का सुख नसीब नही होता है। एक बार गई न जाने कब आएगी। काली घनी अमावस की रात में एक डरावना माहौल उत्पन्न था। हवेली के पीछे बगीचे में एक बेंच पर विवेक बैठा था और सुदर्शन चहल कदमी कर रहा था।
"विक्की मुझे कुछ ठीक नही लग रहा है। डरावना माहौल है, निकल चलते हैं।"
"दर्शी आज जिंदगी में पहली बार ऐसे डरवाने माहौल का सामना कर रहे है फिर भी हिम्मत रखते हैं, यहां से कहां जाएं?"
"विक्की, बाहर कार खड़ी है, चलते हैं या तो रंग बांगड़ू या फिर दिल्ली अपने घर।"
इसी बीच भंवर कुमार लालटेन के साथ आता है। "साहब जी बारह बज रहे हैं, आईये मेरे साथ।"
विवेक और सुदर्शन चुपचाप अच्छे बच्चों की तरह भंवर कुमार के पीछे चल पड़ते हैं। हवेली के एक छोर पर उसने एक दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही नीचे जाने के लिए सीढ़ियां थी। सीढियां उतर कर एक कमरे में पहुंचे। यह तहखाना था जिसकी दीवारों पर विचित्र सी आकृतियां थी। अंधेरे को दूर करने के लिए लालटेन की रोशनी कम थी।
"भंवर कुमार यह सामने क्या है?" अंधेरे में नजर टिका कर विवेक और सुदर्शन ने पूछा।
"साहब जी ये नर कंकाल हैं।"
"किसलिए?" अब विवेक और सुदर्शन की आवाज कांप गई।

भंवर कुमार के उत्तर में एक रहस्यमयी मुस्कान थी। "यह नर कंकाल सेठ मूंगालाल के पिता का है जिसकी बलि मेरे पिता ने दी थी और वह सेठ मूंगालाल के दादा का है जिसकी बलि मेरे दादा के हाथों हुई है और अब वक्त आ गया है सेठ मूंगालाल की बलि का जो मेरे हाथों होगी। अभी वह अस्पताल में है उसे यहां आना ही होगा। डॉक्टर बलि के लिए उसे जिंदा रखेंगे। उसके वंश पर लक्ष्मी की कृपा हो उसके लिए, यह जगह देखो, यहां पर रतन गाड़े हैं सेठ मूंगालाल के पूर्वजों ने बलि से पहले। बलि के बाद देवी की असीम कृपा होती है और छप्पड़ फटता है सेठ के परिवार में। लक्ष्मी की अटूट कृपा होती है और साथ ही इस हवेली के गुम्बद में एक दरार आती है। आप गुम्बद की दरार देख रहे थे जहां से धूप छन कर आ रही थी। जब तक बलि चढ़ती रहेगी इस हवेली का कोई बाल भी बांका नही कर सकता है।"
भँवर कुमार की बातें सुन विवेक और सुदर्शन थर-थर कांपने लगे। भंवर कुमार ने एक कटार निकली।
"यही है खानदानी कटार जिससे बलि होगी।"
विवेक और सुदर्शन को ऐसा लगा कि कटार उन दोनों की ओर बढ़ रही है। मालूम नही दोनों को कहां से शक्ति मिली। दोनों सीढ़ियों की ओर भागे। तहखाने का दरवाजा खुला था, भागते हुए हवेली के मुख्य द्वार तक पहुंचे। भंवर कुमार कटार लेकर पीछे था। द्वार पर मोटी सांकल लगी थी जिसको खोला और छोटे द्वार से झटपट बाहर आये और कार में बैठ कर कार स्टार्ट की। भंवर कुमार पीछे से आया और कार का दरवाजा खोलने की चेष्टा की। सुदर्शन ने तेजी से कार को पीछे किया जिसकी टक्कर से भंवर कुमार गिर पड़ा। इसी मौके का फायदा उठा कर कार की गति तेज की। तंग गली रात के सन्नाटे में सुनसान थी। एक रेहड़ा तिरछा खड़ा था जिसको टक्कर मार कर कार की गति को बढ़ाया और चंद पलों में मुख्य राजमार्ग पर आ गए। कार की गति बढती गई। दोनों ने पीछे मुड़ कर नही देखा। उनको नही मालूम था कि वे किस ओर जा रहे थे। सुनसान सड़क, अंधेरी अमावस की रात, सड़क पर कोई स्ट्रीट लाइट नही। कार की हेड लाइट हाई बीम पर अंधेरे को चीड़ रही थी। फर्राटे के संग दो घंटे तक कार भगाते रहे। दूर कुछ रोशनी देख कर दोनों की हिम्मत बढ़ी। नजदीक जाने पर वह रेलवे स्टेशन निकला। रात के लगभग ढाई बजे रेलवे स्टेशन सुनसान था। रेलवे स्टेशन के द्वार पर कार खड़ी की। कार की आवाज सुनकर स्टेशन मास्टर बाहर निकला।

"कौन है इतनी रात में? क्या काम है?"
विवेक और सुदर्शन डर के कारण कार से बाहर नही निकले। स्टेशन मास्टर ने टॉर्च से रोशनी कार पर की और कार के शीशे को खटखटाया। सुदर्शन ने कार का शीशा थोड़ा नीचे करके कहा। "हमें रंग बांगड़ू जाना है। शायद हम रास्ता भूल गए हैं?"
"रास्ता तो एकदम सही है। यह स्टेशन रंग बांगड़ू ही है। आपको किससे मिलना है?"
यह सुनकर दोनों की जान में जान आई और कार से उतरे।
"हमें सेठ पन्नालाल ने बुलाया है जो अपने पुश्तैनी मकान पर हवेली का निर्माण करना चाहते हैं। हम आर्किटेक्ट हैं और हमारी देख रेख में निर्माण शुरू होना है।"
"सेठ जी ने आपको बताया नही कि रेल से आते। सड़क पर कई बार हादसे हो जाते हैं। इसलिए सेठजी भी रेल से आते हैं। यहां दो रेल आती हैं, सुबह साढ़े पांच बजे, जिसमें सेठ जी आ रहे हैं और दूसरी रात के साढ़े आठ बजे। आप यहां आराम कीजिये, सुबह सेठजी के साथ जाना। यहां से दस मिनट का रास्ता है उनके गांव का।"
"हम कार में आराम कर लेंगे।"
"अभी तो तीन घंटे हैं रेल आने में। स्टेशन में कमरा है जहां कुर्सी और खाट भी है। बिस्तर पर आराम कीजिये।"
"आराम अब नही होगा। आंखों में नींद नही है।"
"आप कुछ घबराए से लग रहे हैं। क्या हुआ?"
विवेक और सुदर्शन ने आपबीती कही।
"साहब जी आपकी किस्मत अच्छी है तभी आप बच गए। अमावस की रात बलि की खबरें हमने बहुत सुनी हैं। उस हवेली में अमावस की रात कोई नही बच कर निकलता। आप किस्मत के धनी है जो बच गए। इसी कारण सेठ पन्नालाल रेल से आते हैं वर्ना एक से बढ़ कर एक देसी विदेशी कारों की लाइन लगी हैं उनके पास।"
बातों में तीन घंटे बीत गए। साढ़े पांच बजे रेल प्लेटफार्म पर लगी। सेठजी विवेक और सुदर्शन को देख आश्चर्यचकित हो गए। कार में सेठ पन्नालाल को अपनी आपबीती सुनाई।
"सेठ मूंगालाल का निधन चार दिन पहले हो चुका है। उनका अंतिम संस्कार कल हुआ क्योंकि उनके लड़के विदेश में थे। पिछले तीन महीने से अस्पताल में इलाज चल रहा था। हमारे व्यापारिक संबंध बहुत अच्छे रहे हैं मूंगालाल के साथ। उनकी हवेली के बारे में कई विचित्र बातें सुनते रहते हैं। हो सकता है कि भंवर कुमार को सेठ मूंगालाल का मृत्यु समाचार मिल गया हो और बलि हेतु तुम दोनों को रात रुकने के लिए कहा। खैर अब वहां मत जाना।"
सेठ पन्नालाल के साथ दो दिन विवेक और सुदर्शन रहे। हवेली का पूरा खाका तैयार करके सेठजी की अनुमति ली। सेठजी ने उन्हें सुबह के समय जाने की सलाह दी ताकि फिर से कोई हादसा न हो जाए।
सुबह नाश्ते के पश्चात विवेक और सुदर्शन ने वापिसी की। मूंगालाल की हवेली के पास कार रोकी। उसी कार मैकेनिक से हवेली के बारे में बात की।
"साहब जी आपको मैं ही हवेली लेकर गया था। उस रात हवेली का एक हिस्सा ढह गया औऱ भंवर कुमार का पूरा परिवार हादसे का शिकार हो गया। पूरा परिवार गुजर गया।"
मुख्य सड़क से हवेली की ओर देखा। बैठक का गुम्बद ढह चुका था।

सुदर्शन ने कार आगे बढ़ाई। इस बार कार की रफ्तार धीमी थी, होंठों पर हल्की मुस्कान और दिल में डर नही था।


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Posted By Blogger to कथा सागर on 9/13/2017 07:06:00 pm
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