अजनबी(लघुकथा)-----डॉ नन्दलाल भारती

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अजनबी(लघुकथा)-----डॉ नन्दलाल भारती

Post by admin » Wed Dec 20, 2017 6:15 am

अजनबी(लघुकथा)

विनोद बाबू तबियत ठीक तो है ?
नहीं। रात्रि मे आंखे चौधियाने लगी थी।कुछ देर मे दिखना एकदम कम हो गया था।जान आफत में पड़ गई थी।बड़ी मुश्किल से दूध पी सका था।इतना समझ लो कुन्दन बाबू की मौत सहला कर चली गई।
एकांतवास का जीवन है, पिताजी तीसरी ठेघानी,पत्नी दूसरी ठेघानी वह भी बुरी तरह अस्वस्थ।आपकी तकलीफ का प्रशासन थपोड़ी बजाकर जैसे मजा ले रहा है।डॉ को दिखाओ विजय बाबू हो सकता है शुगर कम हो गई हो।
हां कुन्दन बाबू दिखाना तो पडे़गा।इतने मे मोबाइल घनघना उठी।बेटी का फोन विजय बाबू बोले।
बात करिये कुन्दन बाबू बोले।
हेलो पापा कैसे हो ?
बिल्कुल ठीक हूं बेटा ।तुम घबराई हुई क्यों लग रही हो ?
नहीं... बस आपकी याद आ रही थी।ना जाने क्यों डर लग रहा था।
अट्ठाइस को आ रहा हूँ बेटा ।विजय बाबू आंख मसलते हुए बोले।
पापा आप ठीक तो हैं ना ।
हां बेटा ।
पापा बिजी हो .....। ?
बेटा आफिस मे हूं।
ठीक है पापा शाम को बात करती हूं।ओके पापा बाय......।
बाय बेटा।
विजय बाबू देखो बेटी को आपके दर्द का पता चल गया कुन्दन बाबू बोले।
हां कुन्दनबाबू काश बेटा अजनबी न हुआ होता , थोड़ी सी फिक्र कर लेता...........?
डॉ नन्दलाल भारती
18/12/2017
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