घासवाली---डॉ० श्रीमती तारा सिंह

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घासवाली---डॉ० श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Wed Feb 14, 2018 6:51 am

घासवाली---डॉ० श्रीमती तारा सिंह
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सोनागाँव की दुलिया , शा्दी कर जिस दिन अपने ससुराल आई, दूसरी ही सुबह उसके ससुराल वाले, उसके सर पर कचिया और टोकड़ी थमाते हुए बोले --- बहू ! हम रोज कमाने-खाने वाले आदमी हैं । हमारे घर में हर किसी को अपनी रोटी के लिए जद्दोजहद करना पड़ता है; आज से तुम भी तो हमारे घर की सदस्या बन गई हो । फ़िर दुलिया के पाँव से सर तक निहारती हुई, सास पूर्णिमा बोली ---- हमारे पास एक गाय है, अब तक उसके लिए चारा, मैं लाया कती थी । मेरे पैर में गठिया है, निगोड़ा दर्द जाता ही नहीं । इसलिए बहू जाकर गाँव के बाहर खेत से कुछ चारा ले आ, वरना गाय भूखी रह जायगी । तुम्हारा पति कीर्तिदास , वो तो बचपन से ही अपने कृतिभजन में व्यस्त रहा, कभी घर के काम-काज में हाथ नहीं बँटाया ।
दुलिया ने सास की बातों का कुछ जवाब नहीं दिया , उसकी आखें डबडबा आईं ।
सास पूर्णिमा ने समीप आकर पूछा---- क्या हुआ, तुम्हारी आँखों में आँसू क्यों तैर आये ?
दुलिया ने सिसककर कहा--- कुछ नहीं !
पुर्णिमा—कीर्ति ने रात डाँटा है क्या ?
दुलिया ने सास की बात को टालते हुए कहा---- कोई बात हो, तो बताऊँ ?
दुलिया उस ऊसर घर की गुलाब की फ़ूल थी, उसका गेहुँआ रंग, हिरणी जैसी आँखें, लम्बे-लम्बे बाल, कपोलों पर हल्की लालिमा, बड़ी-बड़ी नुकीली पलकें, दाँत- ज्यों मोतियों की पंक्तियाँ हों, मगर आँखों में एक विचित्र आर्द्रता, जिसमें कष्ट, वेदना, एक मूक व्यथा थी । उसका कोमल गात टोकड़ी उठाने से डर रहा था, जिसके कदमों के नीचे जमाना आँखें बिछाये रहता था, जिसकी एक झलक ,दिन की थकावट को दूर कर नया जोश भर देता था ; जिससे एक शब्द बोल देती थी, वह निहाल हो जाता था । आज वह कितनी मजबूर थी, सामने खड़ी एक अनपढ़, मैली-कुचैली कपड़े में लिपटी, अपने सास के सामने । उसने अनमने ढ़ंग से घास की टोकड़ी उठाई और चल दी ।
सास ने चिल्लाकर कहा --- अरि वो लाड़ो ! सर पर पल्लू तो रख ले, रास्ते में हजार लोग मिलेंगे, वो क्या सोचेंगे ?
दुलिया, अपने सर को पल्लू से ढ़ंकती हुई निकल गई ।
पूर्णिमा फ़िर चिल्लाई, बोली --- रूक , मैं भी तेरे साथ चलती हूँ, तू तो ऐसे निकल पड़ी, जैसे तू इस गाँव को पहले से जानती है ।
दुलिया , नीची आँखें किये राह चलती गई--- लोग नई-नवेली दुल्हन के सर पर घास की टोकड़ी देखकर हैरान थे, तो नौजवान अपनी छाती पर हाथ रखकर ऊपरवाले को कोस रहे थे ।
दुलिया का फ़ूल-सा चेहरा, ज्वाला की तरह चमक रहा था । वह जब घास छिलने बैठी, तो उसका गोरा रंग , अँगारे की तरह दमकने लगा । देखनेवाले हैरान-पड़ेशान थे । परेशान तो उसकी सास पूर्णिमा भी हो रही थी, लेकिन संघर्ष की गर्मी में चोट की व्यथा नहीं होती, इसलिए वह इन बातों से बेपरवाह दुलिया को बोली ----जल्दी कर , बेला चढ़ने लगा है ।
अपनी बेकसी का अनुभव कर दुलिया सिसक-सिसककर रोने लगी । सोचने लगी ---- अगर मेरे माँ-बाप सुगनी के पिता की तरह धनवाले होते, तो आज मैं भी मोटर कार की सवारी करती । वह रोती हुई धीरे-धीरे घास काटती रही, इधर पूर्णिमा का क्रोध बढ्ता रहा ।
एकाएक दुलिया थरथराती हुई सास पूर्णिमा के पास आकर खड़ी हो गई और बोली---- अब मुझसे नहीं होगा, माँ जी ।
पूर्णिमा बड़े ही नरम स्वर में बोली---- तो आगे मुझे ही लगा दे, और तू मेरी जगह बैठ ।
दुलिया, चिर रोदनकारी पौष की ठिठुराती हवा में अपने बिखरे जा रहे बालों को ,गालों से हटाती हुई, हवा से बोली--- मेरी वेदना रजनी से भी काली है, और दुख समुद्र से भी विस्तृत ; तुम्हारा धर्म-शासन , नये और पुराने का अंतर क्यों नहीं समझता ? क्यों तुम तरंगों पर तरंगें बिखेर कर ,मुझे नि:वस्त्र किये जा रहे हो ? क्या तुम्हें नहीं पता, तुम्हारे ऐसा करने से मुझ पर राह चलता मुसाफ़िर रूक जाता है, मेड़ पर बैठी सासु माँ आँखें तरेरती हैं और तो और, बच्चों के झुंड ठहाके मारते हैं । सुबह का आया मध्याह्न होने चला और तुमको ठिठोली सूझती है !
कुमुदों से भरे, शरतकाल के ताल से से भरे दुलिया के यौवन की उत्कंठा उसके वदन पर निखर आ रही थी । प्रत्येक अंग में मरोड़, शब्दों में वेदना का संचार हो रहा था , क्षोभ और लज्जा से गड़ी जा रही दुलिया, सास के पास आकर मूर्तिवत खड़ी हो गई ।
दुलिया को कुछ कहने का अवसर न देकर ,पूर्णिमा ने पूछा--- क्या आज के काम भर घास हो गया ?
यह सुनकर दुलिया का प्राण-पंछी अनंत में उड़ गया, उसने अपनी असफ़लता पर आप लज्जित हो कुछ देर चुपचाप खड़ी रही, फ़िर बोली----नहीं माँ जी । द्रुतगति से दौड़ती हवा ने मुझे त्रस्त कर दिया। बड़े-बड़े घने घास, फ़ूली हुई लताएँ मेरे पैरों से लिपटकर , सांकल की तरह कस देती हैं । उस व्यथा को मैं सह नहीं पाती हूँ ।
पूर्णिमा गुस्से से तिलमिलाती हुई बोली--- दर्द का दूसरा नाम ही सुकून है ; इसलिए इन दर्दों को सहना सीखो । जानती हो , जब दर्द क्रंदन करता है, तब सुखानुभूति हँसती है और नियति अपनी मिट्टी के पुतले के साथ और अधिक अपना क्रूर मनोविनोद करती है । लेकिन तुम तो बड़े बाप की बेटी हो, तुम क्या जानो, दर्द और वेदना, जब कि ये दोनों तुम्हारी ही तरह इस धरती पर रहती हैं ; इनसे परिचय करो, और इ्नके संग जीना सीखो ।
दुलिया ने सर नीचा कर ,धीरे से कहा--- सासु माँ ! घास काटना, मुझसे नहीं होगा ।
सास पूर्णिमा ने डाँटा, कहा---- घास नहीं काटेगी, उपले नहीं बनायेगी, तो क्या तुझे व्याह कर , अपने घर की रानी बनाकर रखने लाई हूँ । तुम्हारा गोरा चमड़ा चाटने से पेट की भूख मिटेगी ?
दुलिया रोनी सूरत बनाये फ़िर से खेत में घास काटने उतर गई , यह सोचकर कि सास के निर्णय की कहीं अपील भी तो नहीं है ।
इधर पति कीर्ति , नई व्याही पत्नी की देरी की चिंता में, व्यथित, परेशान दरवाजे पर टक लगाये अधीर हो रहा था । तभी दुलिया, घास की गठरी सर पर लिये हाँफ़ती, कराहती घर पहुँची । माथे पर से बोझा को फ़ेंककर दौड़ती हुई, पति कीर्ति के समीप आ खड़ी हो गई । दोनों ने एक दूसरे को अधीर होकर निहारा, और शीघ्र ही ,जैसे लोहा चुम्बक से जा चिपटता है, दोनों एक दूसरे से चिपट गये । तभी पीछे से आ रही, सासु माँ पहुँची, जिसे देखकर दोनों ने अपना सारा बल लगाकर एक दूसरे से झटपट अलग हो गये, लेकिन प्रणय अब तक तन से लिपटा हुआ था ।
कीर्ति ने माँ पूर्णिमा से कहा--- माँ ऐसा नहीं हो सकता कि घास और गाय को मैं देखूँ और घर का सारा काम दुलिया सँभाले ।
पूर्णिमा , सर से आँचल सँभालती हुई कही---- मैंने पुत्र जनम दिया, पाला-पोषा, विवाह दिया, सारी गृहस्थी बसाई; आज जब चलाने की बारी आई, तब बेटा बैठ गया काम बाँटने । किसे क्या करना है, जैसे मैं इस घर की धाई हूँ ? मेरा भी काम बता दे, कह दे, “ मेरी पत्नी के कपड़े धोया करना, कह दे ?” फ़िर आप ही बड़बड़ाती हुई बोली--- देह पर साबूत कपड़े नहीं हैं, मगर बात तो ऐसे करता है, जैसे संसार का राज्य मिल गया हो, दुख- दारिद्र्य का लोप हो गया हो !
एक दिन दुलिया ने पति कीर्ति से कहा--- -- जिस घर में विचारों का राज न हो, वह घर, घर नहीं लगता , बल्कि एक सराय-मात्र है ।
कीर्ति अपने पीले मुख पर आत्मगौरव की आभा लेते हुए कहा---- जिन विचारों का मैं पूर्णतयादमन कर चुका था, तुम्हारी बातों से आज राख में छिपी चिनगारी की भाँति सजीव हो गईं ।
दुलिया ने उपहास स्वर में कहा---- मुझमें यह कला नहीं है ।
कीर्ति हँसते हुए बोला--- इस नीति में हानि क्या है, बल्कि सोचो तो लाभ बहुत है ।
दुलिया विक्षिप्त हो बोली---- वो कैसे ?
कीर्ति बोला ----- वो ऐसे, इससे आदमी का रंग-ढ़ंग परखा जाता है । इस तर्क-वितर्क में एक घंटा गुजर गया, रात ने शीत को हवा से धधकाना शुरू कर दिया, कीर्ति दोनों घुटनों को छाती से लगाकर सिर को उसमें छुपाकर बैठ गया, और बोला---- बड़ी ठंढ़क लग रही है, धमनियों से रक्त की जगह हिम बह रहा है, सारा खून जमा जा रहा है, गर्मी का कुछ उपाय करो ।
बहुत देर तक नोंक-झोंक के बाद आखिर एक प्रस्ताव पास हुआ, कि रात बहुत हो चुकी है, चलो, चलकर सोया जाय, और दोनों सोने चले गए ।
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