स्वामी जी ( संस्मरण ) -----राधाकृष्ण अरोरा

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स्वामी जी ( संस्मरण ) -----राधाकृष्ण अरोरा

Post by admin » Tue Jul 10, 2018 6:35 am

स्वामी जी
( संस्मरण )
राधाकृष्ण अरोरा

“ इस वटवृक्ष के नीचे एक स्वामी जी बैठे रहते थे। कहाँ चले गए ?”
“ स्वामी मर गया। साला मर गया “, नीचे गंगाघाट की आखिरी सीढ़ी पर बैठे युवक-समूह के एक नौजवान ने पूरे अट्टहास के साथ मेरी तरफ आश्चर्य से देखते हुए एक व्यंग-बाण सा छोड़ा था।
“ कब? कैसे?”
“ साला गंगा में डूब मरा। पिछले मंगलवार को।“
और कुछ पूछने की मेरी हिम्मत न हुई। वटवृक्ष के ठीक सामने पड़े एक बड़े पत्थर पर मैं चुपचाप बैठ गया। आँखें मूँद लीं। बंद पलकों के भीतर स्वामी सदानंद सामने आकर खड़े हो गए।
--कहो बेटे कैसे हो? बहुत सालों बाद गंगा किनारे आना हुआ। सब ठीक तो है न?
-- मैं ठीक हूँ, स्वामीजी। लेकिन...
--लेकिन क्या बेटे? मेरा शरीर न देखकर चकित हो गए? दुखी हो गए? मैं तो यहीं हूँ, गंगा के पास, गंगा की गोद में। याद है जब पहली बार मिले थे, मैंने तुमसे क्या कहा था? भारत में इससे ज्यादा सुन्दर स्थान कोई नहीं। मैं भला यहाँ से कहाँ जाऊंगा? क्यों जाऊंगा?

गंगाघाट, शिवानंद आश्रम, ऋषिकेश। हां, पहली बार स्वामीजी से मैं यहीं पर मिला था। तब मैं चालीस का था। सूरत में पोस्टिंग थी।
जब कभी ऑफिस से छुट्टी मिल पाती थी, मैं अपने होमटाउन ऋषिकेश आ जाता था—अपनी माँ के पास, अपने छोटे भाई के पास। गंगा किनारे के घाटों पर बैठकर, उसकी लहरों से बातें करना, उसके किनारों पर स्थित आश्रमों मे चले जाना, साधु-सन्यासियों से जीवन-जगत की बातें करना मेरे मन को बहुत भाता था। हां तो मैं बता रहा था स्वामी सदानन्द जी से अपनी पहली मुलाक़ात के बारे में।
सर्दी की शाम थी। सूरज कभी का डूब चुका था। अंधेरा गहराने लगा था। सुरसरिता चुपचाप बह रही थी। हिमालय उसे चुपचाप देख रहा था। बिजली के खम्बे की उदास पीली रोशनी, वटवृक्ष के पत्तों से छनकर,फटा-पुराना कम्बल ओढ़े एक बूढ़े शरीर को हल्की-सी गरमाहट देने की नाकाम कोशिश कर रही थी। पास ही के रेस्टोरेन्ट से कांच के दो गिलासों मे चाय लेकर मैं उनके पास आ बैठा था।
“ स्वामीजी, उठिए, चाय पीजिए। बहुत सर्दी है।“
वे धीरे से उठे थे। रूखे-सूखे लम्बे बाल। झुरियों से भरा पीला कमजोर चेहरा ; दो मायूस आँखें मेरी तरफ देख रहीं थीं।
“ कौन हो बेटे, कहाँ से आए हो?
मैंने संक्षेप मे अपना परिचय दे दिया।
“ स्वामीजी, आप बताइये न अपने जीवन के बारे मे। यहाँ गंगा किनारे कब, कैसे आना हुआ?”
और फिर एक कमजोर आवाज बहुत देर तक मुझे अपनी कहानी सुनाती रही—
“ बेटे, मैं आज ट्रेसठ साल का हूँ। दो वर्ष की आयु मे पोलियो का शिकार हो गया। बचपन मंगलोर मे बीता और जवानी मुंबई मे। मुम्बई मे बीड़ियाँ बनाने के एक कारखाने में हम सब काम करते थे—दो छोटे भाई, उनकी पत्नियाँ और मेरी माँ। पिता तो बरसों पहले परलोकवासी हो चुके थे। मैं प्राय बीमार रहता था। मेरा कमजोर शरीर बैठे बैठे ही थोड़ा बहुत काम कर पाता था।
“ यदाकदा छोटे भाइयों के उलाहने, उनकी पत्नियों की उपेक्षाभरी निगाहें मुझे गहरे तक बींध डालती थीं। शरीर से तो अपाहिज था ही, मन से भी अपाहिज होने लगा था। मन बैरागी हो चला था। जब तक माँ जिंदा थी, उसने मुझे सन्यास न लेने दिया। और माँ के आँखें बंद करते ही मैं यहाँ भाग आया—माँ गंगा के पास।
“ पिछले आठ सालों मे किसी ने मेरी खोज-खबर नहीं ली। अब तो इसी वटवृक्ष के नीचे मेरा बसेरा है। अब तो यहीं बैठकर सर्दी, गरमी और बरसात को आते-जाते देखता हूँ। कई बार आधी रात को नींद खुल जाती है। गंगाघाट की आखिरी सीढ़ी पर जा खड़ा होता हूँ। अपने दोनों हाथ फैलाकर मृत्यु का आव्हान करता हूँ। एक बार आत्महत्या की बात मन में आई थी पर विवेक ने मुझे समझाकर शान्त कर दिया था--इस तरह आपघात करोगे तो यह सब भोगने के लिए फिर आना पड़ेगा।“
स्वामीजी बोलते बोलते चुप हो गए थे। उनके हाथ से चाय का खाली गिलास लेकर मैं पूछ बैठा था—
“ जीने का मकसद क्या है, स्वामीजी?”
“ जीने का मकसद है आज को जीना, अभी को जीना। आगे पीछे की परवाह किए बिना आज की हकीकत को स्वीकार करना।“ पास ही पड़ी एक टीन की सन्दूक से ‘डिवाइन लाइफ ‘ मैगज़ीन के कुछ पुराने अंक निकालकर मेरे हाथ मे देते हुए स्वामीजी ने कहा था—“ इन्हें पढ़ना, बेटे। अच्छा लगेगा।“
स्वामीजी ने धीरे से लेटते हुए फटा-पुराना कम्बल अपने पैरों से सिर तक ओढ़ लिया था। उनके पोलियोग्रस्त पैर कांपने लगे थे। रात और सर्द होने लगी थी।
मैं अपना पूरी बांह का ऊनी स्वेटर उतारकर स्वामीजी के सिरहाने रखकर चुपचाप तांगे मे बैठकर शिवानंद आश्रम से ऋषिकेश चला आया था। अपनी माँ के पास, अपने भाई के पास, अपने घर।
स्वामी सदानंदजी की उदास आँखें पूरी रात मेरे साथ जागती रहीं थीं।
फिर काफी बरसों तक जिंदगी ने फुरसत ही न दी गंगा किनारे जाने की। और आज... आज जब लौटा हूँ तो सुनने को मिला—
स्वामी मर गया। साला मर गया। साला गंगा मे डूब मरा। पिछले मंगलवार को।

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R.K. Arora
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