आज सप्तमी है---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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आज सप्तमी है---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Wed May 09, 2018 4:42 pm

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आज सप्तमी है---डॉ. श्रीमती तारा सिंह
आज दुर्गा स्थापना का छठा दिन है, सोचकर पारो की आँखें भर आईं । उसने पति रामपाल से कहा--- क्या जी , तुम सो रहे हो ?
रामपाल , अचम्भित हो पूछा ---क्यों, क्या बात है पारो ?
पारो कुछ कहती, उसके पहले ही रामपाल पूछ दिया---- नैहर की याद आ रही है; अरे पगली साये को पकड़कर जीया नहीं जाता । कहने को तो तुम्हारे दो भाई भी हैं, लेकिन जानती हो पारो, किसी ने ठीक ही कहा है---’ जब तक अपनी बेटी नहीं होती, तभी तक भाई अपने बाप की बेटी से लगाव रखता है । अपनी बेटी के जनमते ही , बाप की बेटी से रिश्ते तोड़ लेते हैं । लगभग यही हाल तुम्हारे साथ भी है , तुम्हारा भाई लक्ष्मण ; फ़िर बड़बड़ाते हुए रामपाल ने कहा--- आजकल दुर्योधन से कम नहीं है । खुद तो बिगड़ा ही, अपने बच्चे, पत्नी को भी बिगाड़ कर रख दिया ।
पारो, रामपाल की बातों से परास्त हो बोली----छोड़ो न बेकार की बातें, मैं तो अपने बचपन की सहेली,इन्दिरा की बात तुमसे करने आई थी ।
रामपाल,चिंता व्यक्त करते हुए पूछा--- क्या बात है , इन्दिरा ठीक तो है, क्या हुआ उसे ?
पारो, बिना लाग-लपेट की बोली--- क्या होगा उसे ?
रामपाल---- तब फ़िर तुम इन्दिरा को यादकर चिंतित क्यों हो रही हो ?
पारो--- इसलिए कि अब उससे कभी मुलाकात नहीं होगी । कितना मजा आता था, जब बचपन की सहेली इन्दिरा, उमा, देबा, रामसखी, गीता, नीलम; सब के सब हम एक जगह दुर्गा पूजा पर जमा होते थे । फ़िर पारो, आकाश की ओर देखती हुई कही---- रामपाल , ऊपर की ओर देखो ! नीले आकाश में तारों के बीच तुमको एक छायाचित्र सा नजर आ रहा है । दुर्बल—सूखा, घुटने तक धोती, चिकना सिर, पोपला मुँह , तप-त्याग और सत्य की सजीव मूर्ति सा बैठा, लगता नहीं कि वे हमें देख रहे हैं । सरल मनोहर मुस्कान, मानो कोई योद्धा युद्ध में थककर वहाँ बैठकर आराम कर रहा हो ।

रामपाल , पारो की बातों से हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा----- तुमने ठीक कहा, वो दिन याद करो, जब देवता-तुल्य तुम्हारे पिता कैंसर के दर्द से तड़प रहे थे, उस तड़पन में उनकी जिंदगी कैसे कराहती थी । एक पल के लिए आराम नहीं था । आज देखो, कितने चैन से ऊपर बैठकर हम दोनों को बातें करते, निहार रहे हैं ।
पारो ,धीर कंठ से कही ------ लेकिन जानते हो रामपाल, उस देवता के पुजारी से मेरी भाभी को कितनी घृणा थी । 85 साल के उम्र में भी बहू के हाथों से एक ग्लास पानी पीने की तमन्ना ही रही ; फ़िर एक लम्बी साँस लेकर पारो बोली ------ जानते हो रामपाल, कहीं ईश्वर की ईश्वरता थी, तो वो मेरे पिता में थी । तुमको ऐसा बहुत कम आदमी मिलेगा , जो अपनी मानहानि न समझता हो, लेकिन मेरे पिता इन सब बातों से परे थे । उनका कहना था, भिक्षा अन्न की, पैसों की और वस्तु की होती है; भिक्षा प्रेम की नहीं होती ।
बातचीत में रात ग्यारह बज गये । रामपाल आँगन में सो रहे थे ’ लेकिन पारो की आँखों में नींद नहीं थी । बीते साल की बातें यादकर ,रह-रहकर उसकी आँखें नम हो जाती थीं । वह सोच रही थी ,’ आज सप्तमी पूजा है, घर पर दुर्गा-पाठ हो रहा होगा । नीलम आई होगी, अपने दोनों बच्चों के साथ, गाँव के दुर्गा-स्थान में ढोल-नगाड़े बज रहे होंगे, दुकानें सज गई होंगी । हर तरफ़ आनंद का माहौल होगा , लेकिन मेरी माँ, घर के किसी कोने में बैठकर , मुझे और पिताजी को यादकर रो रही होगी । उसके तो कोई आँसू पोछने वाला भी नहीं है । इन विचारों से पारो का कलेजा दो टूक हो गया, वह माँ से मिलने के लिए तड़प उठी । मातॄ-स्नेह से उसकी आँखों में आँसू उमड़ आये । उसने मन में वेदना, मस्तिक में आँधी और आँखों में पानी की बरसात लिए रामपाल को नींद से झकझोड़ कर उठा दिया और कहा----

रामपाल ! पिताजी तो अब दशहरे में मुझे लेने आ नहीं सकते, लेकिन एक बेटी का,माँ के प्रति क्या कर्तव्य बनता है, यह कहते हुए पारो का शरीर काँप रहा था ।
रामपाल, पारो की मनोवेदना को समझ गया, उसने व्यथित हो पूछा---- क्या माँ से मिलने जाना है, पारो ?
पारो---- दृढ़ स्वर में कही--- हाँ ।
रामपाल , पारो का ताथ पकड़कर अपने पास बिठाते हुए कहा--- मैं तुम्हारी हृदय-वेदना को समझ पा रहा हूँ , लेकिन फ़िर से एक बार सोच लो, ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ, कि तुम्हारे पिता रहे नहीं, और माँजी तो स्वयं उस घर की अतिथि हैं, पता नहीं तुम्हारा भाई उन्हें घर छोड़कर कब चले जाने कह दे, ठीक नहीं ।
पारो, शीश झुकाये, बचपन काल से अपने घर की वह स्मृति-चिह्न जिसे वह अपने हृदयलोक में प्रतिष्ठित कर रखी थी, आज भी सुरक्षित था । वह तपाक से उठ खड़ी हो गई और बोली---- तो चलो, देर किस बात की ?
पारो,बनारस से लाई हुई सिल्क की लाल रंग की साड़ी पहनी, माँ के लिए कुछ धोतियाँ ली और रामपाल के साथ अपने गाँव पीपलखेड़ा के लिए रवाना हो गई । घर पहुँचकर देखा, दरवाजे पर उसकी भाभी किसी बात पर अपने बच्चों को डाँट रही है । उसने सोचा, ’”मुझे देखते ही भाभी पहले की तरह गले से लिपट जायगी, और पूछेगी--अरि ! स्टेशन से पैदल क्यों आई, मुझे फ़ोन की होती, मैं तुम्हारे भाई को गाड़ी लेकर भेज देती; लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ ।’
भाभी ( मीना ) , पारो की ओर क्षण भर के लिए देखी फ़िर, आँखें बचाकर आँगन में चली गई । यह बात पारो को अच्छा नहीं लगी; वह सोचने लगी--- इसके बाद भी क्या मुझे घर के भीतर जाना चाहिये ? इसी उधेड़बुन में खड़ी रह गई ,कि भीतर आँगन से आवाज आई, भाभी , पारो की माँ से चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है, बाहर जाकर देखिये ; घर में आग लगाने के लिए आप क्या कम थी , जो एक और को बुला लीं ।

पारो की माँ समझ गई, जरूर जब्बलपुर से पारो आई होगी । वह दौड़ती हुई बाहर आई, पारो को देखते ही विलख-बिलखकर रोने लगी । पारो भी माँ के गले लगकर , दिल में बसाये समंदर को आँखों से निकाल दी । बड़ी मुश्किल से रामपाल ने दोनों को चुप कराया, और सास के चरण छूकर पुछा--- माँजी आप ठीक हैं तो ? हमलोग आपसे ही मिलने आये हैं ।
माँ अपने फ़टे- मैले आँचल से आँखों के आँसू पोछती हुई बोली----- बेटा ! सब कुछ दरवाजे पर ही पूछ लोगे, अंदर नहीं चलोगे । फ़िर बुदबुदाती हुई बोली---- बेटा ! तुम्हारे ससुर नहीं रहे, तो क्या मैं हूँ न , माँ की बात का कोई जवाब दिये बिना दोनों माँ के पीछे-पीछे आँगन में पहुँचे । देखा, पिता के होटल में दिन गुजारने वाला निकम्मा भाई लक्ष्मण पिताजी की गाढ़ी कमाई के रुपये को शराब के प्याले में गलाकर मस्त पड़ा है । पारो अपने संस्कारी भाई के जीवन का परिवर्तन इतने वेग से होता देख, अचम्भित रह गई । वह इतनी दुखी हुई, कि उसे हँसी आ गई, उसने लक्ष्मण की ओर देखकर कहा ---- क्षमा करना लक्ष्मण, पिताजी इस काम के लिए जीवन भर पैसे नहीं जोड़े थे । धिक्कार है तुमको, पिताजी को जीते जी तुमने एक दिन चैन से जीने नहीं दिया । अब मरने के बाद उनकी आत्मा को शांति से रहने नहीं देते ।
पारो के मुँह से इस तरह की बातें सुनकर लक्ष्मण की आँखों से चिनगारी निकलने लगी, वह आगबबूला हो बोला ---- तुम जिस रास्ते यहाँ आई हो दीदी, अच्छा होगा जो तुम, उसी रास्ते लौट जाओ । अपना घर तो संभलता नहीं , आ गई दूसरे के घर को संभालने ।
पारो विस्मित हो ठिठककर खड़ी रही, लक्ष्मण के शब्द उसके कानों में दर्द देने लगे । उसने कृतग्यतापूर्ण दृष्टि से लक्ष्मण की ओर देखा, फ़िर बड़ी तेजी से निकल कर दरवाजे पर आ खड़ी हो गई । उसकी आँखों में विद्रोह भरी हुई थी । उसने दबी जबान से ,रामपाल से कहा---- चलो, हमें यहाँ नहीं ठहरना । तुमने देखा----- भोग और लिप्सा, लक्ष्मण को कितना स्वार्थांध बना दिया है । वह तो बड़े-छोटे का अंतर भी भूल गया । पारो

सौ-सौ युक्तियों से अपने मन को समझाने की कोशिश करती, लेकिन न्याय-बुद्धि किसी युक्ति को स्वीकार नहीं कर रही थी । वह अपने ही पिता के घर इतना मजबूर महसूस कर रही थी, मानो उसके हाथों में हथकड़ियाँ पड़ीं हों ।
पारो की माँ प्रमिला, उन देवियों में से थी, जिसकी नसों में रक्त की जगह , प्यार, स्नेह, दया बहती है । स्नान-पूजा, तप और व्रत , यही उसके जीवन का आधार था । सुख में, दुख में , आराम में उपासना ही उसका कवच था । ईश्वर के सिवा कौन उसका सुनेगा; इसलिए वह वहीं खड़ी द्वार की ओर पारो को ताकती रही । उसका धर्मनिष्ठ मन ईश्वर के चरणों में गिरकर क्षमा मांग रहा था । वह पारो के पास जाकर एक भिखारिन की तरह क्षमा –याचना करने लगी; बोली--- बेटी पारो, मुझे माफ़ कर दो । तुमको मेरी खातिर क्या-क्या अपमान नहीं सहना पड़ा ।
पारो सजल नेत्रों से माँ की ओर देख कर बोली----माँ, इसमें लक्ष्मण की कोई गलती नहीं है ; भगवान की प्रेरणा और क्या ? भगवान की दया होती है, तभी किसी के मन में अच्छे या बुरे सदविचार आते हैं ।
प्रमिला ( माँ ) तत्परता के साथ बोल पड़ी---- नहीं बेटी, ईश्वर आनंद –स्वरूप हैं, दीपक से कभी अंधकार नहीं निकल सकता ।
पारो कातर भाव से बोली _--- माँ, तुम्हारी भावना निर्मल है, तुम्हारी बेटी कहलाना मेरे लिए गौरव की बात है । तुम जिस दलदल में फ़ंसकर भी श्रद्धा और भक्ति की बात करती हो, सबों के लिए संभव नहीं । बहाव की ओर से नाव खे ले जाना तो बहुत सरल है, किन्तु जो नाविक बहाव के प्रतिकूल खे ले जाता है, वही सच्चा नाविक है ।
पारो ने देखा--- ’उसकी बात सुनकर माँ के मुख पर आत्मनिर्भरता और संतोष की गंभीर शांति आ गई । पारो मन ही मन ,माँ के आगे प्रणत हो गई, और भारी हृदय से चलने लगी । ऊपर आकाश की ओर देखी, तो दिन ढ़ल रहा था : दीयावाती के पहले स्टेशन पहुँच जाना आवश्यक था, कारण


अंधेरा होते ही वहाँ चोरों का राज हो जाता है । वह लपलपाती अपने पति के साथ चली जा रही थी; उसे रास्ते में यात्रियों के कई झुंड मिले, कुछ यात्री गाँव की ओर लौट रहे थे । उसने देखा, उसके पड़ोस के किशन –चाचा ( अपनी बेटी और नाती , जो कहीं शहर में रहते थे ) नाती को कंधे पर लिए , तेजी से चले आ रहे थे । वह चिल्लाई---- चाचा, वो चाचा; उमा कहाँ है ? चाचा ने हाथ से इशारा कर बताया, पीछे ; लेकिन बेटी कल दुर्गा मेला और लौट जा रही हो, क्या बात है ? चाचा की बात पर पारो की आँखों में पानी भर आया; उसने चाचा के चरण छूकर कहा ---- चाचा , आजकल दायित्व, कर्तव्य, और धार्मिक भावनाएँ बँट चुकी हैं, लोगों का जीवन धन-दम्भ से और स्वार्थ से जकड़ा हुआ है, और मैं एक गरीब हूँ , किसके घर जाऊँ ? कौन मुझसे मिलेगा ?
पारो की बात पर चाचा की आँख से आँसू गिरने लगे । वे रोते हुए बोले ---- मैं तुम्हारे दुख का अनुभव कर पा रहा हूँ, तुम्हारी बातॊं को सुनकर मेरा कलेजा विचलित हो उठा है । लक्ष्मण आकांक्षा का नशा पी लिया है , वही उसे बेवश किये हुए है, जिस दुख से मनुष्य छाती फ़ाड़कर चिल्लाने लगता है । मगर वैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में भी तुम्हारी तरह सिर नीचा कर चुप रहना ही, अच्छा होता है । मुझे पहली वार समझ में आया ।
आज निष्ठुर नियति भी तुम्हारी सहनशीलता पर पंकिल हो गई होगी ।
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