आखिरी मुलाकात---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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आखिरी मुलाकात---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Thu May 10, 2018 5:01 pm

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आखिरी मुलाकात---डॉ. श्रीमती तारा सिंह
चाचा रामटहल विलासी, दुर्व्यसनी तथा चरित्रहीन व्यक्ति तो थे, मगर सांसारिक व्यवहार में उनकी तुलना किसी से नहीं थी । व्यवहार में वे बड़े ही चतुर, सूद-ब्याज के मामले में दक्ष चाचा की यही विशेषता सबों को चुप कराये रखते था ;मज़ाल थी कि कोई उनके कहे को अनसुना कर दे । हुक्म करने भर की देरी होती थी,ऋणी कुँजड़े साग-भाजी भेंट में दे जाते थे, तो ग्वाला बाजार से आधे भाव में दूध पहुँचाता था । कुछ तो उनके ऋणी भी थे, जिन्हें बैल खरीदने आदि के लिए अधिक नहीं, 2000/-, 3000/- रुपये दिये होते थे , सूद के लालच में नहीं, बल्कि अपने अत्याचार को ढ़ँकने के लिए । इस डर से वे कभी जोर देकर, तगादा नहीं करते थे, कहीं पैसे चुका न दे । उनका छोटा भाई शिवटहल जो किसान के साथ एक कवि भी था, उसने कई बार डरते-डरते रामटहल से कहा--- भैया, पके आम हो, कब टपक पड़ोगे, पता नहीं ; ऊपरवाले से डरो, और इस तरह दो का चार करना छोड़ो । जवाब में रामटहल बस इतना बोलकर चुप हो जाता था,’मैं धूर्त हूँ, संसार को ठगता हूँ; तुम धार्मिक हो, फ़िर संसार तुमको क्यों ठगती है ? क्या इस कर्म से हमारे कुल की कृति बढ़ती है ? अरे ! जो भी सुनते हैं, लोग तुम पर हँसते है , तुम्हारे साथ मेरे नाम की भी बदनामी कम नहीं होती है ।
रामटहल आँखें मीचे सिर नीचा कर बोला ---- भैया ! नाहक न लेना ; मैं तुम्हारा छोटा भाई हूँ, तुम्हारे हित में मेरे प्राण निकल जाये, तो अपना अहोभाग्य समझूँगा ; इसे कवि का भावावेश भी नहीं समझना । मैं प्रकृति का पुजारी हूँ । जिंदगी हमारे लिए आनंदमय क्रीड़ा है. सरल-स्वच्छंद, जहाँ कुत्सा, ईर्ष्या,जलन और धोखे की जगह नहीं । भैया जब कि हमारा एक साँस पर भी अधिकार नहीं, वहाँ भविष्य की फ़िक्र हमें कायर बना देती है और भूत का भार कमर तोड़ देता है । हम बेकार भार लेकर अपने मनुष्यत्व के रिश्ते को लालच के मलबे में दबाकर उसे कुचल देते हैं । ऐसी शक्ति जो हमें मानव धर्म को पूरा करने में सहयोग के

बजाय बाधा पहुँचाये , वह किस काम का कि शिवटहल के अंत:करण से निकल रहे वेदना भरे स्वर को, रामटहल बड़े ही ध्यान से सुन रहा था । अचानक सुनते-सुनते चिल्ला पड़ा । चिल्लाता कैसे नहीं, उसके धर्मात्मा पर इससे बड़ा प्रहार और क्या हो सकता था ? उसने खून भरी आँखों से शिवटहल की ओर देखकर कहा --- वाह रे धर्मराज ! तुम्हारी इस भक्ति को मैं क्या नाम दूँ; लगता है तुमको लेने ईश्वर सीधे स्वर्ग से धर्मराज युधिष्ठिर की तरह विमान भेजेगा ! मगर एक बात याद रखना--- भगवान हमेशा बड़े-बड़े महलों में और मंदिरों में रत्नों के आभूषण पहने रहते हैं , जिसे तुम जैसे चबैना चबाने वाले नहीं छू सकते, न ही पास फ़टक सकते, ऐसे में तुम्हें लेने वो खुद आयेंगे, तुमने कैसे सोच लिया ?
शिवटहल आश्चर्यचकित हो पूछा---- क्यों भैया ?
रामटहल मुस्कुराते हुए कहा---- क्योंकि वहाँ बैठे ( भगवान के ठीकेदार ) तुमको वहाँ तक पहुँचने ही नहीं देगा । जानते हो, ऐसे वक्त में पैसे ही काम आते हैं, वही वहाँ तक पहुँचा सकता है ; जिसके लिए कम से कम मैं तो चिंतारहित हूँ ।
शिवटहल व्यथित हो बोला----- भैया ! जिसे आप दुख कहते हैं, वही कवि के लिए आनंद है । धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि , ये विभूतियाँ दुनिया को चाहे जितना ही मोहित कर ले, कवि के लिए यहाँ जरा भी आकर्षण नहीं है । उसके मोद और आकर्षण की चीज तो बुझी हुई आशाएँ, मिटी हुई स्मृतियाँ और टूटे हुए हृदय के आँसू हैं । जिस दिन एक कवि का स्नेह इनसे अलग हो जायगा, उस दिन वह कवि नहीं रहेगा । दर्शन , जीवन के इन रहस्यों के मात्र विनोद करता है, जिसमें कवि लय हो जाता है और वह सुख कवि के लिए स्वर्ग से भी बड़ा होता है, मगर आप जैसे लोग इससे वंचित रहने वाले , क्या समझेंगे ?
रामटहल को, शिवटहल की बातों से जितनी शर्म और क्षोभ हुआ, उतना साधू-संतों के बड़े-बड़े उपदेशों को सुनकर भी कभी नहीं हुआ था । उसने तो सोचा था, पैसे की आवश्यकता बताकर और

विचारोत्तेजक प्रमाण देकर अपना गुनाह कम कर लूँगा । लेकिन शिवटहल कब मानने वालों में था, अपने गुस्से को हँसी में लपेटते हुए कहा ----भैया, पैसा खुदा है, लेकिन खुदा पैसा नहीं है । जानते हो भैया, जहाँ उसके इशारे के बगैर रात के अंधेरे में भी पत्ते नहीं खड़कते, वहाँ तुम पैसे के बूते झकझोड़ने की बात करते हो । अरे भैया ! मेरे कहने का मतलब है,’ मन और कर्म की शुद्धता ही धर्म का मूलतत्व है’ । तुम जिस धर्म का स्वांग कर रहे हो, वह पाप है । धर्म की रक्षा प्राणों से होती है, न कि अपना ईमान बेचकर । इतने दिनों तक तो दबे-कुचलों के खून पर अपने परिवार की परवरिश की, कम से कम अब तो लिहाज करो । बूढ़े हो आये हो, कौन जाने, कल तुम कहाँ और ये पैसे कहाँ ?
रामटहल कुछ देरचुप रहा, फ़िर अकड़कर बोला --- स्वार्थ भी तो ईश्वर ने ही दी है, फ़िर ईश्वर द्वारा प्रदत्त तोफ़ा का वहिष्कार मैं कैसे कर सकता । ऐसे ही तुमने अपने सारे दर्शन और विवेक उत्सर्ग से क्या हासिल कर लिया , जिससे अपना सिर गर्व से उठा सको । लेकिन मुझे देखो, लोग हमारी कितनी इज्जत करते हैं ? जानते हो, दौलत वह दीपक है, जिसके प्रकाश में बड़े-बड़े की आँखे चौंधिया जाती हैं । मियाँ मोहम्मद को ही ले लो, जिससे पूरा गाँव डरता है, वह मेरे आगे कैसे पूँछ हिलाते फ़िरता है ।
शिवटहल को अपने बड़े भाई की इस व्याख्या से संतोष नहीं हुआ, उसने मन ही मन शिकायत के स्वर में कहा---- ठीक ही किसी ने कहा है, बुद्धि का हिसाब उम्र से नहीं करना चाहिये ।
स्वार्थ–सेवा मुक्ति की राह नहीं हो सकती ; लेकिन अपने बड़े भाई के सामने उसकी हालत, उस तलवार की थी, जो सान पर चढ़कर लोहे को काट तो देती है, मगर केले को काट नहीं सकती । मानव जीवन में चमचे बड़े महत्व रखते हैं । जिसके चमचे नहीं, वह जवान भी मृत है मगर दुख की बात तो ये है ,कि यही चमचे अमानुषीय बल प्रदान कर उसे नरक तक ढ़केल देते हैं । शिवटहल के सामने कठिन समस्या थी, आत्मा धर्म की

ओर थी, तो हृदय अपने बड़े भाई के साथ । ऐसी अवस्था में अपने धर्मानुराग को प्रकट करना,सुरों के साथ संग्राम छेड़ना हो जाता । वह धर्म और माया की दुविधा में उलझा, अपने घर लौट आया । गोधूलि वेला थी, शिवटहल थका हुआ था । आज पहली बार उसके मन में न जाने कहाँ से अपने बड़े भाई के प्रति, दया तो पहले से ही थी, स्नेह उमड़ आया । उसने आँखें उठाकर देखा, सामने पहाड़ी पर, चाँद डूबा जा रहा है । उस डूबते चाँद में उसे अपने बड़े भाई रामटहल का चेहरा उभर आया । उसने काँपते स्वर में चिल्लाया---- भैया रुक जाओ; लेकिन वह कब रुकने वाला था, डूबता चला गया । तभी उसे वहाँ से एक आवाज सुनाई पड़ी,उसे प्रतीत हुआ,’रामटहल कह रहा है-- शिवटहल ! जीवन भर सीधे-उल्टे काम करते थक चुका हूँ, परिश्रम की तुलना में विश्राम कहाँ मिला, मुझे पूर्णविराम की जरूरत है’ ।
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