आश्रिता---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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आश्रिता---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Thu May 10, 2018 5:07 pm

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आश्रिता---डॉ. श्रीमती तारा सिंह
पति की लम्बी बीमारी में अपना सब कुछ गँवा चुकी , रज्जो के पास अब गँवाने के लिए कुछ नहीं था और जो था, वह उसे गँवाने के लिए तैयार नहीं थी । उसका कहना था, स्त्री की आबरू , उसका गहना होता है , जिसे बेचा नहीं जाता, बल्कि संभालकर रखा जाता है ; लेकिन यह सोचकर वह चिंतित हो उठी, ’’ कि इस पहाड़ सी जिंदगी बसर करने के लिए पैसे तो चाहिये था , वे कहाँ से आयेंगे ; उस पर चार साल की बेटी सालवा, उसकी पढ़ाई-लिखाई कैसे होगी , धन तो है नहीं कि कोई रोजगार कर लूँ, व्यवहारिक बुद्धि भी नहीं जो बिना धन के भी अपने जीने की राह निकाल लूँ । किसी से ऋण भी लेने की हिम्मत नहीं पड़ती , चुकाऊँगी कैसे ? किसी के घर जूठे बर्तन माँजने का भी काम नहीं कर सकती, कुल-मर्यादा का जो सवाल है ” ।
वह किसी तरह दो-चार महीने काटी । जब देखी, पैसे बगैर जिंदगी नहीं जीयी जा सकती, तब वह विधाता के इस परिहास से छुटकारा पाने के लिए अपनी बेटी सलवा का हाथ पकड़ी और घर से निकल गई । मगर इतनी बड़ी दुनिया में कोई ऐसा रिश्तेदार भी तो नहीं था, जो माँ-बेटी , दोनों का भार उठाने के लिए तैयार हो । इसी चिंता में रज्जो दबी जा रही थी, लेकिन इस भार को हल्का करने का कोई साधन नहीं दीख रहा था । वह सोचने लगी, ”कहीं अपना घर त्याग कर मैंने सागर बीच नौके का त्याग तो नहीं कर दिया । अब जिंदगी अथाह जल में डूबी जा रही और जहाँ मैं खड़ी हूँ , वहाँ निविड़ सघन अंधकार बढ़ता जा रहा है । ऐसे में कहाँ जाऊँ ?”
इधर सालवा के जीवन में, पिता की मृत्यु के बाद अद्भुत परिवर्तन दीखने लगा था , जिसे देखकर रज्जो की चिंता और बढ़ने लगी थी । रज्जो दरिद्र थी, मगर उसके मुँह पर इतना तेज था, जैसे प्राचीन देव-कथाओं की वह कोई पात्री हो । संध्या ,रात में ढ़लने लगी । उसने देखा कि उसके चारो ओर के वृक्ष की छाया से एक काला-कलूटा आदमी अजगर की तरह, उसकी तरफ़ बढ़ता चला आ रहा है । वह चिल्ला उठी, बोली---- तुम जो भी हो, वहीं खड़े रहो । खबरदार ! जो और एक कदम भी आगे बढ़ा । उसकी चिल्लाहट सुनकर ,उधर से गुजर रहा, बगल के गाँव का मुखिया, भीमा उसके पास आया , पूछा---- तुम कौन हो नारी, कहाँ जाना है ? क्या तुमलोगों को कोई कष्ट है ?
नहीं कहती हुई, रज्जो ने जब अपने सिर से आँचल हटाई, युवक ( मुखिया ) आश्चर्यचकित हो गया, उसकी साँस भारी हो गई । उसका पूरा शरीर झनझना गया ।
युवक ने अपने कंठ में कोमलता लाते हुए कहा----- रात होने वाली है, वह भी अमावस्या की; ऐसे में तुम्हारा अकेले कहीं जाना ठीक नहीं , तुम चाहो तो आज की रात मेरे घर गुजार सकती हो , ऐसे तुम्हारी मर्जी ।
रज्जो सोचने लगी,’ आगे खाई है तो पीछे कुआँ , ऐसे में पीछे न लौटकर ,आगे चलते रहना ही ठीक होगा । वह उस युवक के साथ उसके घर चली आई और वहीं एक कमरे में ,एक चटाई बिछाकर दोनों माँ-बेटी रात बिताने लेट गई । कल की चिंता में , उसकी आँखों में नींद कहाँ थी, जो सो जाती । वह तो घुली जा रही थी कि सुबह यहाँ से कहाँ जाऊँगी ?’
उधर दूसरे कमरे में लेटा मुखिया की आँखों की भी नींद , वृक्ष पर की चिड़ियों की तरह फ़ुर्र हो चुकी थी । वह सोचकर अधीर हो रहा था ,कि यद्यपि युवती का रंग कंचन समान नहीं है, लेकिन उसका साँचे में ढ़ला गठीला बदन , किसी परी से भी कम नहीं है । तो क्या यह सौन्दर्य उपासना की वस्तु है, उपभोग की नहीं ? उसकी सोच धीरे-धीरे विलास-मंदिर में परिणत होने लगी और मन यौवनोन्माद के रस को पीने के लिए तड़प उठा । वह अपने पाप के वेग से उठा और शीर्ण कलेवर पवन से हिलते-डुलते रज्जो के कमरे में आ खड़ा हो गया । वहाँ पहुँचकर देखा----- रज्जो की आँखें खुली हैं, वह जाग रही है ।
रज्जो, बेसमय अपने कमरे में मुखिया का आना देखकर , भयभीत हो खड़ी हो गई और हाथ जोड़कर बोली------ मैं निरुद्देश्य भटक रही थी, आपने मुझे सहारा दिया है । आपका एहसान मरकर भी नहीं भूलूँगी, आप आदमी नहीं, भगवान हैं , और भगवान का काम होता है ,न्याय करना । आप मुझ दरिद्र के साथ न्याय नहीं कर सकते, तो दया कीजिये, और यहाँ से चले जाइये । सुबह होते मैं यहाँ से चली जाऊँगी ।
मुखिया ,ठिठककर पूछा---- कहाँ जावोगी ?
रज्जो रोती हुई बोली---- जहाँ भाग्य ले जायगा ।
यह कहकर रज्जो,सलवा को सहलाने लगी । उसका स्वर विकृत और बदन नीरस हो चुका था ।
सहसा मुखिया ने रज्जो का हाथ पकड़ लिया, जिससे वह त्रस्त होकर बोली---’अपराधी, ’नीच’ यह क्या है ?
मुखिया निर्लज्जता की हँसी हँसते हुए कहा---- बेशक मैं अपराधी हूँ, सुंदरी ; लेकिन यह अपराध मुझसे कौन करवा रहा है ?
रज्जो, घृणा से मुँह फ़ेरती हुई बोली---- कौन करवा रहा है ?
मुखिया----- तुम्हारी सुंदरता । तुम जो इतनी सुंदर न होती, तब मेरा प्यार इतना बदसूरत न होता ।
रज्जो धिक्कारती हुई बोली------ अत्याचारी ! ऊपर वाले से डरो । मैं एक विधवा हूँ, अपने घर आश्रय देने का मूल्य यह कदापि नहीं हो सकता !
मुखिया, रज्जो की बात काटकर कहा----जानती हो हिन्दू विधवा, इस संसार में सबसे तुच्छ निराश्रयी प्राणी होती है । चलो आज तुम्हारे माथे पर लगे कलंक को धो दूँ और आज से तुम विधवा नहीं, बल्कि मुखिया की रखैल के नाम से जानी जावो । मजाल है कि इसके बाद कोई तुम्हारी तरफ़ नजर उठाकर देखे । इसके लिए कुछ नहीं, बस मेरे हृदय के कलनाद में अपना जीवन मिला दो ।
मुखिया की बात पर रज्जो हँस पड़ी, लेकिन उसकी यह हँसी थी, या उसके हृदय के किसी कोने की मर्मांत पीड़ा की अभिव्यक्ति, मुखिया समझ न सका, वह तो बस इतना समझा,’ मैंने विगत शाम से अभी तक में जो कुछ नहीं पा सका, उसे मिनटों में पा गया और वही रटे हुए वाक्य को दोहराया, कहा------ प्रेम के अभाव में सुख कभी नहीं मिल सकता, चाहे कोई जितना जतन कर ले ।’
रज्जो ,मुखिया की बात का जवाब न देकर ,खिन्न होकर कही---- मैं मरूँ या जीऊँ, धरती पर रहूँ या आसमान में, आपका क्या ? आप क्यों, मुझे लेकर व्यर्थ चिंतित हो रहे हैं ? मैं गरीब हूँ, लेकिन गिरी हुई नहीं हूँ । फ़िर निराश होकर कही ---- यही तो मर्दों के हथकंडे हैं ; पहले तो देवता बन जाओ, जैसे सारी शराफ़त इन्हीं पर खतम है, फ़िर अपना मतलब निकालकर तोते की तरह आँखें फ़ेर लो, जैसे पहचानता ही नहीं ।
मुखिया बड़ी तन्मयता से बोला ---- लेकिन मैं उनमें से नहीं हूँ । मेरा हृदय तो तुम जैसी प्रतिमा का उपासक है । मेरा स्वभाव है कि मैं जब भी किसी हमदर्द की सूरत देखता हूँ, उसकी वेदना को बाँटने दौड़ पड़ता हूँ । यह मेरी दुर्बलता है ,मै जानता हूँ, मगर क्या करूँ ? अपने दिल की लगी ,किसी को सुनाये बगैर भी तो नहीं रह सकता हूँ । तुम जिसे मेरा उन्माद समझती हो, मैं उसे देवी अनुरोध समझता हूँ ।
मुखिया अपनी कथा समाप्त कर, रज्जो की ओर देखा, और उसकी बाँह पकड़कर काँपते स्वर में कहा-----देखो, चटाई पर पड़ी तुम्हारी नसें अकड़ गई हैं ; और तो और ,जीवन में अत्यधिक कष्टों को सहने के कारण तुम्हारा रंग-रूप भी बेसमय नष्ट होने लगा है ।
मुखिया की बातों को सुनकर रज्जो के बेजान धमनियों में रक्त का तीव्र संचार होने लगा । शीताधिक्य में भी उसे श्वेद आने लगा , उसकी सोई वासना जाग गई । उसका वैरागी सौन्दर्य , शरद के शुभ्र घन के आकाश के चन्द्र सा आप ही आप लज्जित होने लगा । वह चाहकर भी अपनी मानसिक स्थिति को चंचल होने से नहीं रोक सकी और प्रेमायुक्त लज्जा से व्यथित होकर बोली----- जब मैं अपने जीवन की वीरान मरुभूमि में किसी स्नेह की छाया की खोज में भटक रही थी, तब आप आ मिले । मुझे माफ़ कर दीजिये । मैं सांस्कारिक भावना के अतिवाद में पड़कर निराश व्यक्ति की तरह वैरागन बन चुकी थी । यह मेरी भूल थी, जिसे मैं स्वीकारती हूँ ।
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