दिलीपा,यू आर ग्रेट-------विजयकाँत मिश्रा

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दिलीपा,यू आर ग्रेट-------विजयकाँत मिश्रा

Post by admin » Fri May 11, 2018 12:14 pm

कहानी: दिलीपा,यू आर ग्रेट।
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मुकुट: अरे! पत्तू भइया उठ,क्या यार घोड़े बेच कर सो रहे हो?मुँबई से निकल कर बड़ौदा आ गया हे।
सुनील:अरे! मेँ भी सोकर उठा बैठा हूँ।
पत्तू :अरे! सोने भी दे,मुँबई मेँ तो सोने को भी नही मिला।
अरे! बड़ौदा की चाय बहुत जोरदार होती हे।मैँ जब भी यहाँ छोटे भाई के पास बड़ौदा आता हूँ तो बड़ौदा जँ की चाय जरूर पीकर जाता हूँ.तेरे साथ मैँ भी फीकी चाय पियुँगाँ ।अत: दो चाय मँगाली हेँ।
चाय पीते पीते अचानक मुकुट बोला:अरे!पत्तू,तेरी सीट के नीचे ये खुसर पुसर क्या हो रहा हे?
सुनिल:अरे! कुछ भी नही हे,यार! पत्तू:चाय बहुत जोरदार हे,पीने दे।
अरे! जब मैँ कह रहा हूँ कि सीट के नीचे कुछ हे,तो सुन और देख क्योँ नही रहा हे?देख किसी का हाथ भी दिख रहा हे।
हम तीनोँ ने सीट के नीचे झाँका।वहाँ हमारे सामान के पीछे एक 6 साल की लड़की गड मड होकर सो रही थी।
हमने आवाज लगाई ।
अरे! कौन हे? बाहर निकलो फटाफट।
जब तीन चार बार जोर जोर से आवाज लगाई तो एक 6 साल की लड़की बाहर आई।वो मेले कुचेले,फटे फटाए कपड़े पहनी थी।वो थकी थकाई सी थी,ओर शायद भूखी सी भी लग रही थी।उसको खड़े खड़े भी नीँद आ रही थी।
हमने उसका नाम,पता पूछा।
वो टुटी फुटी भाषा मेँ क्या बोली? हमेँ कुछ समझ मेँ नही आया।उसकी बोली से जरूर लग रहा था कि वो आदिवासी क्षेत्र की हे।अब वो घबरा कर रोने लग गई थी।
पत्तू: अब चुप हो जाओ ,खिड़की के पास जाकर बैठ जाओ।
वो समझी नही।
सुनील ने उसे इशारे से समझाया कि उधर जाकर बैठ जाओ।
इतने मेँ पूरे कम्पार्टमेँट मेँ उस लड़की के बारे मेँ शोर मच गया।
जरा जरा सी देर मेँ हर कोई आकर उसे देखने लगा।
अरे! ये तो कोई चोर हे।जेबकट हे।
नहीँ भाई ये तो बदमाश हे।
इतने मेँ टीटी भी आगया।उसे भी लोगोँ से पता चला कि कोई गुमनाम लड़की हमारी सीट के नीचे सोती हुइ पाई गइ
हे।
टीटी:ये आपके साथ हे?
मुकुट: नही,अभी सीट के नीचे से निकली हे।
टीटी: मैने आपके टिकट चेक किये थे।आप तो मुबँई से कोटा जारहे हेँ।
टीटी:ऐ लड़की कौन हे तू?कहाँ जा रही हे?
लड़की ने रोते हुवे क्या बोला किसी की समझ मेँ नही आया।
टीटी: ऐ लड़की तू ऐसे नही मानेगी,वो हाथ उठा कर उसे मारने दौड़ा।
लड़की उठ कर मुकुट के गले लग गई।
अचानक सुनील ने उठ कर टीटी का हाथ पकड़ा।
आप लड़की के साथ मार पीट नही कर सकते।अभी आपका फोटू रेल मँत्री को भेजता हूँ।
हम सभी टीटी से तकरार करने लगे।
आप हमसे बात करेँ। आप लड़की के साथ मार पीट नही कर सकते।
टीटी: सर! आप नही जानते कि आजकल ट्रेन मेँ प्राय: छोटे लड़के - लड़कियाँ चोरी- बदमाशी करते हैँ। मौका पाकर यात्रीयोँ का सामान पार कर लेते हैँ।
टीटी: रतलाम आने वाला हे।आप इसे रतलाम मेँ उतार देँ। वहाँ 20 मिनट गाड़ी रुकेगी। ये लड़की आपके लिये बहुत हाई रिस्क हे।फिर आप जानो?
टीटी के जाने के बाद वो लड़की भी मुकुट के पास से हट कर खिड़की पर जा बैठी।
रतलाम आ चुका था। हमने लड़की को
रतलाम मेँ उतरने को कहा।किँतु वो कुछ नही समझी।कुछ यात्रियोँ ने कहा इसे आर.पी एफ. थाने मेँ दे दो.वो खुद इसे इसके घर पहुँचा देँगे।
मुकुट और पत्तू दोनो ने पहले लड़की को चाय नाश्ता कराया।
थाने मेँ पहुँच कर उन्होने देखा कि चीफ इन्सपेक्टर सामने कुर्सी पर पाँव फैला कर बैठा हे।
सर! हम रिटायर गवर्नमेँट आफीसर हेँ।फिर हमने लड़की के बाबत सब कुछ बता दिया।
चीफ आफीसर: हम क्या करेँ?आप जहाँ से लेकर आये हो,वहीँ छोड़ कर आओ।
पत्तू : सर! आपकी भी तो कुछ जिम्मेवारी हे,अब हम लड़की को कहाँ लेकर जायेँगे।
चीफ आफीसर:आपको एक बार कह दिया फिर भी आपके भेजे मेँ नही बैठ रही।बाहर निकलो सब यहाँ से।
मुकुट: आप तो बहुत बद दिमाग ओर बद मिजाज आदमी हेँ,हम हायर ओफिशियल्स को अभी आपकी कँपलेट करते हेँ।
चीफ आफीसर:अरे!मुझे ही आज्ञा दे रहे हो?तुम्हेँ अभी बताता हूँ
मैँ कौन हूँ?मैँ गृहमंत्री का आदमी हूँ.
उसने तीन चार जवान बुला लिये ओर उन्हे कहा कि मारो इनको डँडेँ.मार मार के लाल कर दो सालोँ को।
बात बढ़ती देख मुकुट- पत्तू वहाँ से निकल लिये।
बस ट्रेन निकलने को ही थी।हम दौनोँ ने भाग कर ट्रेन पकड़ी।
हम गेट के आगे चैन की साँस ले ही रहे थे कि पीछे से लड़की ने भी भाग कर ट्रेन पकड़ ली।
अरे! तू कैसे वहाँ से यहाँ भाग आई।
ट्रेन तेज रफ्तार पकड़ चुकी थी।
ट्रेन का अगला स्टोपेज कोटा ही था,
ओर अब जो करना था वो कोटा ही करना था।
ट्रेन मे लड़की का भी टिकट कटा लिया।
सभी चिँतित थे कि कोटा मेँ ये जहाँ भी
रहेगी,वहाँ भूचाल तो आयेगा ही।
पत्तू ने कहा: अभी जब तक इसका बँदोबस्त नही हो जाता मेँ ये मेरे घर पर ही रहेगी।
घर पर पहुँचते ही श्रीमतीजी ने अल्टीमेटम दे दिया। इसका तुरँत कही ओर इतँजाम करो।जरुरत क्या थी इस अनपढ़,गँवार लड़की को घर लाने की।
खैर! इसे नहला धुला करके नऐ कपड़े पहनाए।कुछ दिन श्रीमतीजी ने उसे कैसे नहाना,धोना,कपड़े पहनना हे,सिखाया।किँतु बोलचाल मेँ अभी भी दिक्कत आरही थी।
नितेश के जान पहचान के एक आफीसर कलेक्टरी मेँ थे। वो बाल विभाग भी देखते थे।हम लड़की को उनके पास ले गए।वो बोले आप सही समय ओर सही जगह पर आये हो।ऐसे निराश्रित लड़के लड़कीयोँ के लिये हमने अपना घर बना रखा हे।आप कछ सरकारी खानापूर्ति करके इस लड़की को वहाँ रख सकते हेँ।आप सभी बारी बारी से वहाँ जाकर इसकी देखभाल भी
कर सकते हेँ।क्योकिँ इसको किसी के भी घर रखना गैर कानूनी हे।
समयातँरण आप मेँ से इसे कोई गोद भी ले सकते हेँ।
हम सभी के बच्चे पढ़ लिख कर बाहर चले गये थे। कैवल हम दपँति ही रह गये थे।
उपरोक्त बाबत कुछ अन्य दोस्तोँ के भी फोन आए। कई ने हमेँ उलाहना भी दिया। किँतु हम घबराए नहीँ।
नारायण,नितेश,पत्तू,मुकुट,जय,नरेशसुनील सभी अपनी श्रीमतीजी के साथ लड़की को अपना घर छोड़ने गए।क्योकिँ हम पक्के दोस्त थे।पारीवारिक रुप से सब एक दूसरे को समझते थे।
अपना घर मेँ उपरोक्त बाबत सभी सुचनाएँ पहुँच चुकी थीँ.वहा पूर्ण तैयारीयाँ भी थीँ।वहाँ सभी फार्म भरने के बाद उसका नाम दिलीपा रख दिया गया।हमने प्रबँधक को स्पष्ट लिख कर दिया था कि दिलीपा की देखरेख मेँ कोई कमी नही आनी चाहीये।आप इसको हिँदी- अग्रेँजी,स्किल डेवलपमेँट सिखाने के लिये ट्यूटर भी रख लेँ।उसका नगद खर्च हम हर माह देगेँ।आप इसे किसी को भी गोद नही देँगे।हममेँ से ही कोई इसे गोद लेगा।आप प्रतिदिन मोनीटरीँग करके इसके समाचार हमेँ सूचित करेँगेँ। सिखाने के लिये हमारी श्रीमतीयाँ भी आगे आ गई
श्रीमती नारायण बोलीँ :मेँ ला ग्रेजुएट हू,मेँ दिलीपा के ला सबँधी काम देखूगीँ।श्रीमती नितेश बोलीँ: मैँ चार्टड्
अकाउटेँट हूँ ,मेँ दिलीपा के अकाउटेँट सबँधी काम देखूगीँ ।श्रीमती पत्तू और मुकुट ,जय,नरेश बोलीँ: हम इसके पढ़ाई लिखाई,वस्र,स्किल डेवलपमेँट का काम देखेँगी। श्रीमती सुनील बोलीँ:मैँ दिलीपा के लिये स्वादिष्ट डिशेज बना कर भेजूगीँ।
अपनाघर के प्रबँधक ने कहा:दिलीपा की तो किस्मत खुल गई हे,इतने सारे गार्जियन.श।
दिलीपा चुप चाप थी। हम सब भीगी पलकोँ के साथ दिलीपा को अपना घर छोड़ कर अपने घरोँ को रवाना हूए।अब हम सब बारी बारी से अपना कर्तव्य समझ कर दिलीपा की देखरेख कर रहे थे। विशेष पर्व पर पूर्वानुमति से हम सब बारी बारी से दिलीपा को घर पर भी ले आते थे।वो हम सभी को बेहद चाहती थी.हम सब भी उसे अपना ही मानते थे।
समय पखँ लगा कर उड़ता जा रहा था।दिलीपा पढ़ाई लिखाई मेँ बहुत तेज थी।इस बीँच हम सभी की सर्व सम्मति से नारायण ने सभी कानूनी कार्यवाही करके दिलीपा को गोद ले लिया था।
दिलीपा अब मेडिकल की कोचिँग कर रही थी.नारायण ने दिलीपा के भविष्य को देखते हुवे हास्टल मेँ भर्ती करा दिया था। हम सब भी उसका ध्यान रखते थे।दिलीपा की मेहनत रँग लाई।
दिलीपा का एम्स मेँ सलेक्शन हुआ था।
हम सभी अपना अपना काम रोक कर हर्षित मन से दिलीपा को एम्स्,दिल्ली छोड़ने जा रहे थे।अब दिलीपा हम सभी की हे,हम सब दिलीपा के हेँ.
दिलीपा,यू आर ग्रेट।

विजयकाँत मिश्रा,
बेचलर आफ जर्नलिज्म एँड मास कम्यूनिकेशन,एम.काम.(बिज.ओरगेनाइजेशन.ईक्नोमिक्स,
फायनेँसीयल अकाउँटेँसी)
164/5,प्रशाति लेन,
सेट्रँल स्कूल रोड़ के पास,कोटा जँ.
324002
मोबा:9664198438
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