काली बिल्ली--- --Manmohan Bhatia(Blogger)

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काली बिल्ली--- --Manmohan Bhatia(Blogger)

Post by admin » Tue May 15, 2018 6:38 pm

काली बिल्ली --Manmohan Bhatia(Blogger)
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पर्वत श्रृंखला के बीच मे से सुबह उगता सूर्य मनमोहक लग रहा था। रात की कालिमा को दूर करता सूर्य अपनी पहली किरणों के संग रात की कालिमा को कुछ ही देर में काले से श्याम और फिर नारंगी रंग में परिवर्तित कर दिया। पक्षियों की चहचहाने का मधुर संगीत कानों में मिश्री घोल रहा था।

एकदम शांत वातावरण में पल भर बाद पर्वत श्रृंखला के मध्य से बादलों का एक झुंड मस्त चाल से विचरण करता हुआ राकेश की ओर आया और पलक झपकते राकेश के चेहरे को भिगो गया। शॉल ओढे राकेश के पूरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। सूर्य बादलों के पीछे हंसता हुआ छुप गया और उस एक बादल का तेजी से पीछा करते हुए बादलों के झुंड के झुंड आ गए। राकेश मंद-मंद चलते हुए कमरे में वापिस आ गया और दरवाजा बंद करके खिड़की का पर्दा हटा दिया।

"कहां से घूम कर आ रहे हो?" अलसाई रीना ने रजाई से मुंह निकालते हुए पूछा।
"शानदार मौसम का लुत्फ उठाया जा रहा था बेगम श्री।"
"ये शायराना बातें बंद करके मुद्दे पर आओ कि सुबह की चाय मिलेगी या नही।"
"बिस्तर छोड़ कर तरो ताजा हो जाओ। चाय आई ही समझो।"
"अलादीन की चिराग से चाय निकलेगी क्या?"

मसूरी के समीप धनोल्टी में राकेश और रीना कुछ दिन आराम करने प्रकृति का लुत्फ लेने इस बार होटल में नही रुके। एकांत में बनी कोठी में ठहरे। दिल्ली के एक धनी व्यापारी ने एक बड़ी कोठी धनोल्टी में बनवाई। साल में दो-चार दिन के लिए भी मुश्किल से आ पाते हैं। कोठी के रख रखाव के लिए कालूराम अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते हैं। कोठी की देखभाल के साथ मेहमानों के लिए खाना बनाना और साफ सफाई कालूराम और उसकी पत्नी करते हैं और उनके बच्चे पास के स्कूल में पढ़ते हैं। दो मंजिल कोठी में दस कमरे हैं। दो कमरे अपने लिए रख कर बाकी कमरों को गेस्ट हाउस में परिवर्तित कर दिया। बहुत बड़ा लॉन और तरह तरह के फूलों की क्यारियां कोठी की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। कोठी के पीछे छोटे लॉन में सब्जियां बो रखी थी।

उम्र के पचासवें साल में राकेश और रीना एलटीए की छुट्टी पर एक सप्ताह के लिए निकले। पहले तीन दिन धनोल्टी के बाद एक-एक दिन मसूरी, देहरादून और हरिद्वार के लिए रखे। पच्चीस वर्ष में विवाह होने का एक सबसे बड़ा फायदा है कि पचास की उम्र में बच्चे अपने काम धंधे में व्यस्त हो जाते हैं। राकेश और रीना अब तनाव मुक्त जीवन के दौर से गुजर रहे थे।

सात बजे कालूराम बोनचाइना की क्रोकरी में चाय और बिस्कुट ले कर आया। रीना तब तक ब्रश कर चुकी थी।
"तुम जल्दी चाय पिला सकते हो?" रीना ने कालूराम से पूछा क्योंकि उसे सुबह छ बजे चाय पीने की आदत थी।
"आप बता देते तब छ बजे चाय आपको बना देता। कल सुबह छ बजे चाय आपको मिल जाएगी।" कह कर कालूराम चला गया।

एकांत में समय बिताने के लिए नाश्ता करने के पश्चात राकेश और रीना हाथों में हाथ डाल कर दूर पखडंडिओं पर घने पेड़ों की छांव में टहलते हुए गेस्ट हाउस से बहुत दूर निकल गए। थक कर एक पेड़ के नीचे बैठ कर दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराये।
"ऐसे क्या देख रहे हो?"
"ऐसे एकांत के पल एक दूसरे के लिए मिले वर्षों बीत गए हैं।"
"शादी के बाद मुश्किल से छ-सात महीने ही मिले होंगे।" रीना ने राकेश की आंखों में आंखें डालते हुए कहा।
"ठीक कहती हो रीना। उसके बाद बच्चों का जन्म, उनकी परवरिश। पच्चीस वर्ष बाद जो समय मिला है वह पहले क्यों नही मिला।"
"क्यों का जवाब शायद किसी के पास नही है जीवन इसी का नाम है। चलो अब मिला जब मिला उसको खुशी से जिया जाए।"

कुछ पल अतीत और वर्तमान की बातें करते रहे। बीच में एक्का-दुक्का गांव का कोई व्यक्ति गुजर जाता। थोड़ी देर बाद स्कूली बच्चों का दल हंसते खिलखिलाते ऊंची आवाज में बातें करते उन दोनों के आगे से गुजरा तब उनको समय का अहसास हुआ कि आज लगभग तीन से अधिक घंटे आपस में एक दूसरे की आंखों में आंखे डालते बीत गए। दोनों उठे और वापिस गेस्ट हाउस की ओर चल दिये।
"रीना समय का पता ही नही चला।"
"मियां जी पर जवानी का जोश चढ़ा हुआ था।" रीना ने कोहनी मारते हुए कहा।
"संभल कर चलिये, पखडण्डी के अंतिम छोर पर चल रहे हैं आप। जरा सा पैर फिसला नही कि नीचे खाई में लुढकते सीधा ऊपर का टिकट कटेगा।"
इतना सुनते ही दोनों के दिल की धड़कन तेज हो गई। वाकई दोनों एक किनारे चल रहे थे और थोड़ा सा संतुलन बिगड़ने पर सीधा खाई में गिरते। बातों-बातों में उन्हें इस बात का अहसास भी नही रहा कि वे छोटी सी पखडण्डी पर खाई की ओर चल रहे हैं। संभल कर दोनों ने सांस ली और पीछे मुड़ कर देखा। पीछे एक युवती जा रही थी। पहनावे से वो गांव की निवासी नही लग रही थी। उसने बिना बाहों का टॉप और आधुनिकता की देन जगह-जगह से फ़टी हुई जीन्स पहनी हुई थी।
"ज़रा रुकिए।" रीना ने उस युवती को आवाज दी। वह युवती पलटी और सिर्फ मुस्कुरा कर बिना जवाब दिए पखडण्डी से कच्चे रास्ते पर उतर कर आंखों से ओझल हो गई।
"रीना आज उस युवती ने बचा लिया वर्ना न मालूम क्या हो जाता?"
"राकेश तुम ठीक कह रहे हो। वह युवती यहां की स्थानीय नही लगती फिर भी चपलता से कच्चे रास्ते उतर गई। पहाड़ के स्थानीय निवासियों की कद काठी और नैन नक्श से वह युवती बिल्कुल जुदा थी।"
"हां रीना। तुमने शुक्रिया कहा लेकिन वह रुकी नही।"
"जो भी हो राकेश वह हमारे लिए फरिश्ता बन कर आई।"

उस युवती पर चर्चा करते हुए दोनों गेस्ट हाउस पहुंचे। खाना खाने के पश्चात थकान के कारण दोनों नींद में डूब गए। शाम के समय एक बार फिर दोनों भ्रमण पर निकले। सड़क के किनारे पेड़ों के झुरमुट के बीच चलते हुए एक बेंच पर बैठ कर सूर्यास्त देखने लगे। धीरे-धीरे सूर्य की लालिमा कम होने लगी। आकाश नारंगी से स्याह होने लगा। पर्वत के पीछे जाता सूर्य अचानक से कहीं गिर सा गया।

सूर्यास्त होते ही राकेश और रीना को एक बिल्ली की मीआउं की आवाज सुनाई दी। दोनों ने दाएं-बाएं देखा। जिस बेंच पर वे दोनों बैठे थे उस से सट कर एक काली बिल्ली बैठी थी। एकदम काले रंग की बिल्ली की भूरी आंखें चमक रही थी। राकेश और रीना के घर में एक भूरी बिल्ली आ कर बैठ जाती थी। वह भगाने से भी नही भागती थी। मीआउं का जवाब मीआउं से देती थी। जब तक उसको कुछ खाने को नही दो तब तक वह हिलती नही थी। उस काली बिल्ली को देख कर राकेश ने उसकी आंखों में देख कर मीआउं कहा। बिल्ली ने भी पलट कर मीआउं कहा।
"राकेश हम मीआउं से अधिक कुछ नही जानते लेकिन जब बिल्ली ने मीआउं का जवाब मीआउं से दिया है तब इसका सीधा मतलब है कि वह हमसे कुछ कहना चाहती है। हमारे घर पर आने वाली भूरी बिल्ली हमसे खाने को कुछ मांगती है। इसको भी कुछ दे दो।"
"रीना बैग में देखो इसके मतलब का कुछ है क्या?"
रीना के बैग में बिस्कुट और चिप्स के पैकेट के साथ जूस के छोटे पैक थे। रीना ने एक बिस्कुट का पैकेट खोल कर बिल्ली के सामने रख दिया। बिल्ली ने दो बिस्कुट खाये।
"राकेश इस बिल्ली ने भी बिस्कुट खा लिए।"
"अच्छी बात है।" राकेश ने अभी इतना ही कहा था कि काली बिल्ली चौकन्नी हो कर खड़ी हो गई और सड़क के एकदम बीच मुस्तैदी से खड़ी हो गई। पहाड़ों पर अधिक चौड़ी सड़क नही होती। वाहन एक-एक करके गुजरते हैं। ओवरटेक की गुंजाइश कम होती है कम से कम सड़क के इस भाग पर बिल्कुल नही थी जहां काली बिल्ली खड़ी थी। तभी वहां एक कार आई और सड़क के बीच खड़ी काली बिल्ली को देख कर वहीं रुक गई। काली बिल्ली के रास्ता काटने को सब अशुभ मानते हैं इसलिए वह कार रुक गई। कार में कौन बैठे हैं यह राकेश और रीना नही देख सके। कार की खिड़की के शीशे बंद थे। काली बिल्ली ने तेज छलांग लगाई और कार के बोनट पर चढ़ गई। काली बिल्ली की इस हरकत से कार में बैठे बच्चों की चीख निकल गई। काली बिल्ली ने कार के शीशे से अंदर झांका और फिर तेजी से छलांग लगा कर बेंच के पास बैठ गई जहां राकेश औऱ रीना बैठे थे। काली बिल्ली ने रास्ता छोड़ दिया था लेकिन कार आगे नही बड़ी। वह सड़क के एक छोर पर खड़ी हो गई। मान्यता के अनुसार काली बिल्ली के रास्ता काटने को वे अशुभ मान रहे थे। रास्ते में कुछ अशुभ न हो जाये इस कारण कार आगे नही बड़ी।

राकेश औऱ रीना दोनों ने बहुत आश्चर्य से यह किस्सा देखा। दोनों के मुख से एक साथ निकला "चलें" और बेंच से खड़े होकर गेस्ट हाउस की ओर चल पड़े।
"काली बिल्ली के कारण यह कार रुक गई औऱ हमारा रास्ता भी उस ओर है। राकेश हमें भी रुक जाना चाहिए। कोई अनहोनी न हो जाए?" रीना ने डरते हुए राकेश को कहा।
"भगवान का नाम लेकर चलते हैं। प्रभु की इच्छा के मुताबिक ही सब होता है। प्रभु रक्षा करेंगे।" राकेश ने रीना का ढाढस बंधाया।

दोनों आगे बड़े। उनके काली बिल्ली के स्थान से आगे बढ़ते ही कार भी आगे बढ़ी और पलक झपकते उनसे आगे निकल गई। सुनसान रास्ते पर राकेश और रीना चल रहे थे औऱ काली बिल्ली उनके पीछे चुपचाप चल रही थी।
"राकेश तुमने काली बिल्ली को देखा था न कैसे वह फुर्ती से छलांग मार कर कार के बोनट पर चढ़ कर कार के अंदर कुछ तलाश रही थी।"
"रीना यह एक अनोखा दृश्य था। रौंगटे खड़े हो गए थे। मालूम नही बिल्ली किसे ढूंढ रही थी और क्या चाहती है।"
बातों-बातों में दोनों गेस्ट हाउस पहुंच गए। काली बिल्ली गेस्ट हाउस के मुंडेर पर चढ़ कर बैठ गई।
तभी रीना की नजर मुंडेर पर बैठी काली बिल्ली पर पड़ी। "राकेश यह वही बिल्ली है न?"
"लगती तो वही है। चल कमरे में बैठते हैं।"

दोनों गेस्ट हाउस के अंदर गए। कालूराम गेस्ट हाउस के गेट पर मिल गया।
"भैया कालूराम मुंडेर पर बैठी बिल्ली को देखो। बहुत अजीब लग रही है।"
मुंडेर पर बैठी काली बिल्ली को देख कर कालूराम ने कहा "साहब जी यह बिल्ली नही भूत है। आप अंदर चलिये।"
"भूत, तुम कैसे कह सकते हो?" राकेश ने कालूराम से पूछा।
"साहब जी यह बिल्ली है इसलिए लड़की का भूत है। लड़कों के भूत बिल्ला बन कर आते हैं।"
"कालूराम हम शहर में रहते हैं सिर्फ भूतों के बारे में सुना है, देखा कभी नही। मेरे मित्र जिनका गांव से संबंध है भूतों पर विश्वास करते हैं। पहाड़ों पर रहने वाले अक्सर बिल्ली में भूत देखते हैं। ये भूत शहरों में क्यों नही आते हैं?"
"वो मुझे नही मालूम कि भूत शहरों में क्यों नही रहते लेकिन भूत होते हैं और यह काली बिल्ली एक लड़की का भूत है। आप सावधान रहें और रात को कमरे से बाहर न निकले।" कालूराम ने उनको चेतावनी देकर सावधान किया।

रात के खाने के पश्चात राकेश और रीना बिस्तर पर लेटे हुए टीवी देख रहे थे।
"राकेश क्या तुम कालूराम की बात को सच समझते हो?" रीना ने टीवी की आवाज को धीमे करते हुए पूछा।
"रीना न तुमने और न मैंने कभी भूत देखा है। हमने सिर्फ किस्से कहानियां सुने है। गांव के लोग अक्सर भूत देखने की बात करते हैं। मैंने जब अपने गांव की पृष्ठभूमि वाले सहपाठियों से पूछा कि क्या उन्होंने भूत देखे हैं तब बहुत विश्वास और दावे के साथ भूत देखने की पुष्ठि करते हैं और जब मैं पूछता हूं कि क्या शहर में देखे हैं तब उनका जवाब होता है कि आदमियों के रहने के लिए शहरों में स्थान नही, भूत कहां रहेंगें।"
"राकेश उस काली बिल्ली की हरकतें आपने देखी। जिस तरह से वह कार पर झपटी थी वैसे होता नही है। वह जरूर कुछ ढूंढ रही थी।"
"रीना तुम ठीक कह रही हो लेकिन क्या वह काली बिल्ली भूत है? मैं कुछ कह नही सकता।"

कुछ देर बाद दोनों सो गए। आधी रात के समय काली बिल्ली की चीखने और रोने की आवाज आने के कारण राकेश और रीना की नींद खुल गई।
"राकेश बिल्ली का रोना अशुभ होता है। बहुत देर से रो रही है। इसको यहां से भगाना होगा।"
"थोड़ा रुक जा। मालूम नही कहां होगी फिर कालूराम की बात याद कर।"
बिल्ली के चीखने की आवाज तेज हो जाती है।
"राकेश जानवरों में किसी अनहोनी के पूर्वमान करने की शक्ति होती है। शायद वह चेतावनी दे रही हो?"
"हो सकता है तुम ठीक कह रही हो। चलो बाहर चल कर देखते हैं।"
शॉल ओढ़ कर राकेश और रीना कमरे से बाहर आते हैं। चांदनी रात में चांद के प्रकाश से देखने लायक रोशनी थी। मुंडेर पर काली बिल्ली बैठी थी। राकेश और रीना को देख कर काली बिल्ली चुप हो गई और गेस्ट हाउस के पिछले भाग में कूद कर कहां गई यह राकेश और रीना नही देख सके।

कमरे में वापिस आकर दोनों कुछ देर तक काली बिल्ली पर चर्चा करते रहे। सुबह उठ कर उन्होंने कालूराम से रात की बात का जिक्र किया।
"साहब जी वह काली बिल्ली अवश्य एक लड़की का भूत है और किसी से बदला लेकर रहेगी। रात को उसका चीखना इसी बात का संकेत है।" कालूराम की बात में आत्मविश्वास था।

नाश्ता करने के पश्चात पेड़ों की झुरमुट में घूमने राकेश और रीना चल पड़े।
"राकेश आगे जो लड़की चल रही है। मुझे वही लगती है जिसने हमारा हाथ पकड़ कर हमें खाई में गिरने से बचाया था।"
दोनों अपनी रफ्तार तेज करके लड़की के समीप पहुंच गए।
"सुनिए।" रीना ने उस लड़की को आवाज दी।
आवाज सुनकर वह युवती रुक गई और मुड़ कर रीना से कहा। "कहिये आंटी।"
रीना से उस युवती को ऊपर से नीचे तक देखा। सांवले रंग की तीखे नैन नक्श वाली आकर्षक व्यक्तित्व के साथ वह युवती किसी का भी दिल चुरा सकती थी। उसने आज भी हल्के नीले रंग की फटी जीन्स और सफेद टॉप पहना हुआ था।
"आप वही हैं न जिसने हमे कल खाई में गिरने से बचाया था।"
"आंटी आप अंकल के साथ प्रेम की बातों में इतनी मस्त हो गई थी कि आप एक दम सड़क के किनारे खाई वाली छोर पर चल रही थी और जरा सा भी पैर सरकते ही नीचे खाई में गिरती।"
"बहुत शुक्रिया आप ने हमें बचाया। आपका क्या नाम है?"
"आंटी मैं आपके बच्चों की उम्र की हूं। मुझे तुम कहो।"
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"रश्मि।"
बातें करते हुए बेंच तक पहुंच गए और तीनों बेंच पर बैठ कर बातें करने लगे।
"रश्मि तुम इतने आधुनिक कपड़े मतलब फ़टी जीन्स पहनती हो, कहां की रहने वाली हो और बड़े आराम से पहाड़ों पर चलती हो?"
"आंटी मैं नीचे गांव की रहने वाली हूं और दिल्ली में नौकरी करती हूं। अभी मैं छुट्टियों में घर आई हूं। मेरा बचपन गांव में बीता इसलिए बडे आराम से पहाड़ी रास्तों पर चलती हूं और रहती दिल्ली में हूं इसलिए आधुनिक कपड़े पहनती हूं। आंटी आप यहां कोठी वाले गेस्ट हाउस में रुके हैं न?"
"हां तुम्हे कैसे मालूम?"
"मैंने आपको वहां देखा है। आप होटल में रुकते तो अच्छा होता।"
"क्यों?"
"इस कोठी का मालिक बुरा इंसान है। यहां सबको मालूम है। अय्याशी का अड्डा बना रखा है। उसने कल रात आना था लेकिन आया नही। आज तो अवश्य आएगा तब देख लेना।"
"हम तो आज रात तक हैं। कल सुबह छ बजे मसूरी के लिए निकल जाएंगे। दिन मसूरी ठहर कर शाम को देहरादून जाना है।"
"आज की रात सावधान रहना।"
"लेकिन क्यों?"
"खुद देख लेना। अच्छा मैं चलती हूं।" इतना कह कर रश्मि उठी और पांच-दस कदमों की दूरी पर एक पेड़ के आगे कच्चे रास्ते पर उतर गई।

राकेश और रीना हैरानी से उसको देखते रहे लेकिन पेड़ के बाद कहीं नजर नही आई।
"रीना यह लड़की कहां से आती है और कहां गायब हो जाती है। मुझे रहस्यमयी लड़की लगती है।"
"हां राकेश जैसे काली बिल्ली रात में चीख रही थी और यह लड़की हमें सावधान रहने को बोल रही है। जरूर कोई गड़बड़ है। हमें कोठी छोड़ कर चले जाना चाहिए।"
"रीना कल सुबह तो जाना ही है। दोपहर का समय हो रहा है अब कहां जाएं। डर मत।"
"राकेश जो माहौल उत्पन्न हुआ है वह डराने के लिए बहुत है। दिन तो ठीक है लेकिन रात डरावनी हुई तब बहुत मुश्किल होगी।"
"कुछ नही होगा। गांव वाले भूतों पर विश्वास अधिक करते हैं।"

दोनों गेस्ट हाउस वापिस आ गए और शाम को बाहर घूमने नही निकले। लगभग सात बजे के आसपास कोठी के मालिक अपने दो मित्रों संग आए। उनके विशेष कमरे कालूराम ने पहले ही दुरुस्त कर रखे थे।
"रीना उस लड़की का कहना सत्य निकला कि कोठी के मालिक कल नही आये तब आज जरूर आएंगे।"
"राकेश हमें सावधान रहना होगा। मुझे बहुत डर लग रहा है। मालूम नही कब अनहोनी हो जाए। अब इस समय कहीं जा भी नही सकते हैं।"
"रीना हिम्मत रख। अब डरने का क्या फायदा।" राकेश ने रीना को धीरज रखने को कहा।
दोनों का टीवी देखने में भी मन नही लग रहा था। काफी देर तक दोनों जागते रहे लेकिन उनको नींद आ गई।
आधी रात के समय कुछ तेज आवाजों के कारण राकेश और रीना की नींद खुली। समय रात के साढ़े बारह बजे थे।
"किसी के झगड़ने की आवाज लग रही है।" रीना ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगी।
"रीना आवाजों से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई स्त्री और पुरुष के स्वर हैं।"
"बाहर चल कर देखते हैं कि क्या माजरा है?"
"रीना पहले तो डर रही थी अब निडर हो कर बाहर रोमांच का आनंद लेना चाहती हो।"
"चलो राकेश बाहर चल कर देखते हैं।"

राकेश औऱ रीना कमरे से बाहर आते है। ठंड बढ़ गई थी। हवा भी थोड़ी तेज चल रही थी। चारों ओर शांत वातावरण था। राकेश और रीना को बाहर कोई नजर नही आया। तभी मालिक के कमरे का दरवाजा खुला औऱ कोठी के मालिक ने एक युवती को धक्का दिया।
"तेरी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई। एक गोली सीने के आर पार और तू सीधा बिना टिकट ऊपर।" कोठी का मालिक मुड़ा औऱ पिस्तौल ले कर आया और लड़की पर तान दी।
लड़की खूब जोर से हंसी। यह क्या लड़की तो रश्मि निकली।
"रीना यह तो रश्मि है।" राकेश के मुख से निकले शब्दो पर रश्मि ने राकेश और रश्मि की ओर मुड़ कर देखते हुए कहा। "अंकल-आंटी मैंने आपको कहा था न इस कोठी का मालिक अय्याश है। दो साल तक मुझसे खेल कर एक रात प्यार का नाटक करते-करते कोठी के पीछे खाई में धक्का दे दिया था। मैं तो बिना टिकट दो वर्ष पहले ही ऊपर पहुंच गई थी। आज बिना टिकट ऊपर पहुंचने की इसकी बारी है।"
"तू उस दिन बच गई तो आज खत्म कर देता हूं।" कोठी के मालिक ने पिस्तौल से गोली चलाई। निशाना चूक कर सामने पेड़ पर लगा। गोली चलने की आवाज सुनकर कालूराम भी बाहर आ गया।
रश्मि पीछे होती गई और कोठी के मुंडेर पर उस भाग की ओर हो गई जिधर खाई थी। कोठी के मालिक ने पिस्तौल से दो गोलियां और दागी लेकिन रश्मि पर कोई असर नही हुआ। एक दम कोने पर पहुंच कर रश्मि गायब हो गई और मीआउं की आवाज के साथ वही काली बिल्ली मुंडेर पर नजर आई। उस काली बिल्ली ने जबरदस्त छलांग लगा कर कोठी के मालिक के मुंह पर अपना पंजा मारा। कोठी का मालिक लड़खड़ा कर गिर पड़ा। नशे में होने के कारण वह मुश्किल से खड़ा हो सका। काली बिल्ली उस पर छलांग मारते हुए उस पर झपटती और मुंह और आंखों पर पंजा मारती। कोठी का मालिक एक दम मुंडेर पर गिरा। काली बिल्ली ने अब अंतिम प्रहार किया औऱ कोठी का मालिक खाई में गिर कर बिना टिकट ऊपर पहुंच गया। काली बिल्ली कालूराम के पैरों से लिपट कर रोई और चुपचाप मुंडेर पर चढ़ कर गायब हो गई।
राकेश और रीना स्तब्ध हो गए। उनको बुत बना देख कालूराम ने कहा।

"साहब जी रश्मि मेरी बेटी थी। मालिक ने दिल्ली के कॉलेज में अपने खर्च पर रश्मि का दाखिला करवाया था। रश्मि दिल्ली वाली कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में रहती थी। मुझे नही मालूम कि मालिक ने कब रश्मि को अपने प्रेम जाल में फंसाया। दो वर्ष पहले जब रश्मि गर्मियों की छुट्टियों में आई तब एक दिन रश्मि का रात के समय मालिक से खूब झगड़ा हुआ तब मुझे यह बात पता चली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यही मुंडेर के समीप झगड़ा हुआ और रश्मि नीचे गिरी और हमारे बीच नही रही। आज दो वर्ष बाद मालिक आये हैं और रश्मि ने अपनी मौत का बदला ले लिया।"
"कालूराम तुम दो वर्ष तक चुप रहे?" राकेश ने पूछा।
"मैं गरीब क्या कर सकता था। अमीरों के हाथ बहुत लंबे होते हैं। रश्मि काली बिल्ली बन कर आने लगी। मुझे विश्वास था कि वह इंसाफ करेगी। आज मुझे इंसाफ मिल गया। साहब जी आज के बाद रश्मि काली बिल्ली के रूप में कभी नजर नही आएगी। उसे मुक्ति मिल गई।"
कालूराम की आंखों में आंसू थे। राकेश और रीना कुछ नही कह सके।
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