कंजूस की माफी ---Manmohan Bhatia (Blogger)

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कंजूस की माफी ---Manmohan Bhatia (Blogger)

Post by admin » Thu May 17, 2018 3:22 pm

कंजूस की माफी --- Blogger<no-reply@blogger.com> Thu, May 17, 2018 at 2:11 PM
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कंपनी के चार दिन के व्यस्त टूर पर विनोद और विपुल को कान खुजाने की फुरसत नही मिली। सुबह नौ बजे से रात दस बजे तक कमर तोड़ काम करने के पश्चात आज टूर के अंतिम दिन साढ़े बारह बजे दोनों को काम से छुट्टी मिली। रात आठ बजे की फ्लाइट थी। दोनों ने ऑफिस छोड़ कर रेस्टॉरेंट में खाना खाने के बाद थोड़ा बाजार घूमने के लिए एक बजे ऑफिस छोड़ा।

"विनोद इस बार तो काम के बोझ के कारण बदन दुख गया। ऑफिस के कैफेटेरिया का खाना भी एकदम बेकार होता है। गुणवक्ता पर कोई ध्यान नही देता है।" विपुल ने दोनों हाथों को सीधा करते हुए गर्दन का व्यायाम करते हुए विनोद को कहा।
"भाई विपुल तुम ठीक कह रहे हो। काम करने से पीछे नही हटते हम। कम से कम खाना तो सही ढंग का हो। मिलावटी पेट्रोल से गाड़ी चलवा कर गाड़ी खराब करवा रहे हैं कंपनी वाले।"
"कई बार शिकायत कर चुके हैं लेकिन सुनवाई नही है। अब दिल्ली जाकर दो दिन छुट्टी लेकर आराम करूंगा।"
"मैं भी आराम करूंगा।"
"खाना बढ़िया हो तब काम करने की रफ्तार दुगनी तिगनी हो जाती है। चल अब शाम तक छुट्टी है। किसी अच्छे बढ़िया रेस्टॉरेंट में चल कर खाना खाते हैं।"

वातानुकूलित रेस्टॉरेंट में विनोद और विपुल ने मन पसंद खाना खाया। कुछ देर तक बातें करने के पश्चात दोनों रेस्टॉरेंट से बाहर आए।

"विनोद अभी ढाई बजे हैं। फ्लाइट रात आठ बजे की है। साढ़े छ तक हवाई अड्डे पहुंचना है। मैं थोड़ा बाजार घूमता हूँ। बच्चों और श्रीमती जी के लिए कुछ खरीदारी करता हूँ।" विपुल ने घड़ी देखते हुए विनोद से पूछा।
"यार खाम खा बिना बात के जेब ढीली हो जाएगी। मैं नही जाता। चल एयरपोर्ट चल कर बैठते है।"
"यार पक्का कंजूस है। कभी-कभी ऐसे मौके मिलते है।"
"यार घर में सब कुछ है। फोकट में वही चीजों की खरीदारी में कोई फायदा नही। मेरी नजर में फिजूल खर्ची है। मैं नही जाऊंगा। नजदीक मॉल है यहां आराम से बैठ कर आराम करूँगा।"
"ठीक है विनोद तू मॉल जा, मैं बाजार घूम कर आता हूँ।"
"कहां जाएगा विपुल?"
"कोलकता आएं हैं तो न्यू मार्केट जाऊंगा। वहां सही दाम में खरीदारी होगी।"

कुछ सोच कर विनोद भी विपुल के संग न्यू मार्केट चल पड़ा। विपुल ने जम कर खरीदारी की। पत्नी के लिए बंगाली साड़ी, कट वर्क के पेटीकोट, नाइटी, सलवार सूट, बच्चों के कपड़े, खिलौने और घर के लिए कट वर्क की बेड शीट, तकिये के गिलाफ, पर्दे के कपड़े और अपने लिए बंगाली धोती। इतने अधिक समान के लिए विपुल को एक सूट केस भी खरीदना पड़ा।

विशाल न्यू मार्केट घूमने के बाद बाहर निकले। मार्किट के बाहर हाथ से खींचने वाले रिक्शे खड़े थे।
"यार विनोद कोलकता में अभी भी हाथ से खींचने वाले रिक्शे चलते हैं। कमाल है। इनको बंद करना चाहिए। यह अमानवीय है विनोद। सरकार को इन्हें साईकल रिक्शे देने चाहिए। वैसे तो आजकल ई रिक्शे का जमाना है। दिल्ली में तो अब ई रिक्शे चलते हैं। कोलकता में अभी भी हाथ से खींचने वाले रिक्शे चलते हैं।"
"विपुल इनके साथ फोटो खींचते हैं।"
"विनोद मुझे हाथ से खींचने वाले रिक्शे अमानवीय लगते हैं। मैं नही फ़ोटो खिचवाऊंगा।"
"विपुल तू मेरी फोटो खींच।"
"ठीक है।"
विनोद एक रिक्शे में बैठ गया। विपुल ने विनोद की तीन चार फोटो खींची। फोटो खिंचवाने के पश्चात विनोद विपुल के संग जाने लगा तब रिक्शे वाले ने विनोद को आवाज दी। "बाबू पैसे।"
"किस बात के बे?" कंजूस विनोद पैसों की बात सुनकर बिगड़ गया।
रिक्शे वाले ने जवाब दिया "रिक्शे में बैठने के बीस रुपये और फोटो खिंचवाने के पचास रुपये। कुल सत्तर रुपये बनते हैं।"
"सत्तर रुपये सुनकर कंजूस विनोद भड़क गया। "क्या बकवास करता है बंगाली। सत्तर रुपये। दिन दहाड़े शराब पी रखी है क्या?"
"बाबू हमें गाली मत दो। हम मेहनत की खाते हैं।" रिक्शे वाले ने विनोद को पकड़ लिया।
"कौन सी गाली निकाली है बे? कौन सा तेरे रिक्शे पर बैठ कर घूमा हूँ बे?"
"तू तड़ाक मत करो बाबू। चुपचाप सत्तर रुपये दे दो वरना पैसे निकालने हमें भी आते हैं बाबू।"
"नही देता, चल फूट यहां से।" कह कर विनोद ने उसे हल्का सा धक्का दिया। धक्का लगने से रिक्शे वाला गिर पड़ा और उसने शोर मचा दिया। रिक्शे वाले के शोर मचाने से चार-पांच रिक्शे वाले एकत्र हो गए। उन्होंने विनोद को पकड़ लिया। इतने में गिरने वाला रिक्शे वाला उठ कर आया और अपने पैसे मांगे। विनोद को रिक्शे वालों के बीच घिरा देख विपुल बीच बचाव के लिए आया। रिक्शे वालों ने विपुल को झगडे से दूर रहने को कहा।
"बाबू आप दूर रहें। इसको पैसे भी देने पड़ेंगे और माफी भी मांगनी पड़ेगी।"
"पैसे मैं देता हूँ। झगड़ा समाप्त करो। कितने पैसे हैं।" विपुल ने झगड़ा समाप्त करने के इरादे से रिक्शे वालों को कहा।
"बाबू हम आप से पैसे क्यों ले? हम तो पैसे उसी से लेंगे।" रिक्शे वाले भी जिद पर अड़ गए।
इधर कंजूस विनोद जिद पर और उधर रिक्शे वाले जिद पर। झगड़ा देख कर जनता भी मजे लेने लगी और भीड़ एकत्र हो गई।
"फोकट में हमारी फोटो नही खींच सकते बाबू। विदेशी तो फोटो खींचने के डॉलर दे कर जाते हैं। आपसे तो सिर्फ पचास रुपये ही मांग रहे हैं। चुपचाप निकालो सत्तर रुपये। बीस बैठने के और पचास फोटो खिंचवाने के। नही दिए तो पुलिस को बुलाएंगे।"
जनता के बीच खुद को घिरा देख चुपचाप विनोद को सत्तर रुपये देने पड़े।
"माफी भी मांगनी पड़ेगी। रिक्शे वाले के पैर पकड़ कर माफी मांगो।" सभी रिक्शे वालों ने जबरदस्ती विनोद को झुकाया। विनोद को अहसास हुआ कि यदि उसने माफी नही मानी तो रिक्शे वाले उसका गला ही दबा देंगे। आखिर विनोद ने रिक्शे वाले के पैर पकड़ कर नाक रगड़ कर माफी मांगी। विनोद के माफी मांगते मामला शांत हुआ। रिक्शे वालों ने विनोद को छोड़ दिया। जनता की भीड़ ने माफी मांगते विनोद का वीडियो बना लिया।
माफी मांगते भीड़ छट गई।

लुटा पिता विनोद विपुल के संग टैक्सी में बैठ एयरपोर्ट की ओर चल पड़े।
"विनोद तुम्हे रिक्शे वाले से उलझना नही चाहिए था। उसके साथ फोटो खिंचवाई। मात्र सत्तर रुपये के लिए अपनी बेइज्जती करवा ली। तुम्हे तो मालूम है कि बंगाल में यूनियन बाजी बहुत है बात-बात पर हर मिनट लाल झंडा उठा कर सड़क पर मार पीट पर उतर आते हैं। हम परदेशी हैं। बाहर जगह किसी से उलझना नही चाहिए।"

मान मर्यादा, इज्जत अपने हाथों में होती है। लाखों रुपये हम शादी विवाह, मुंडन पर खर्च कर देते हैं लेकिन मात्र सत्तर रुपये की खातिर विनोद ने अपनी अनमोल इज्जत सरे आम बाजार में लुटवा ली। क्या जरूरत थी उसे उलझने की? सत्तर रिक्शे वाले ने मांगे थे, शायद मोल भाव से दस बीस कम कर देता लेकिन झगड़ा नही करना था।

विनोद कुछ नही बोला बस सिर झुका कर आत्मग्लानि संग आत्मचिंतन करने लगा।
चिड़िया तब तक खेत चुग गई थी। रिक्शे वाले से उसकी माफी का वीडियो सोशल मीडिया पर फैल चुका था। उसे लग रहा था कि एयरपोर्ट पर हर निगाह उसे भेद रही है।
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