अंत --Manmohan Bhatia (Blogger)

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अंत --Manmohan Bhatia (Blogger)

Post by admin » Wed May 23, 2018 1:18 pm

अंत --Manmohan Bhatia (Blogger)
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"नयना क्या बात है फिर से सो गई?" नवीन ने सुबह की सैर से वापस आ कर नयना को बिस्तर पर लेटे देख कर पूछा।
"नवीन बदन टूटा सा लग रहा है। उठने की हिम्मत नही हो रही है।" बंद आंखों के साथ नयना ने हौले से कहा।
"ठीक है आराम कर लो। डॉक्टर दस बजे मिलेगा। दवा लोगी ठीक हो जाओगी।" कह कर नवीन नहाने गुसलखाने चला गया।

दस बजे नवीन नयना को डॉक्टर के क्लिनिक ले लेगा। डॉक्टर ने जांच करके दवा लिख दी। दो दिन बाद नयना की तबियत में कुछ सुधार हुआ और नयना घर के कामों में व्यस्त हो गई।

अभी दो महीने पहले नवीन सेवानिवृत हुआ। उम्र साठ वर्ष औऱ पत्नी नयना अब अकेले ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दोनों लड़कियों का विवाह हो गया है। वे अपने परिवार के साथ प्रसन्नतापूर्वक रह रही हैं।

कुछ दिन बाद नयना की तबियत फिर से सुस्त रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने लगभग सभी टेस्ट करवाए। नतीजा कुछ नही निकला। टेस्ट सामान्य रहे फिर भी तबियत में सुधार नही हुआ।
"नयना बाहर चलें। मन बहल जाएगा। तबियत भी सुधर जाएगी।"
"तबियत ठीक है नही। मैंने कहीं नही जाना। अपने घर में सही बैठे है। बाहर तबियत बिगड़ गई तब मुश्किल होगी। यहां तो डॉक्टर पास में है। मैंने कहीं नही जाना।"
"डॉक्टर से पूछ लेते हैं। दवाइयां साथ होंगी। घबराने की कोई आवश्यकता नही है।"
डॉक्टर ने भी पहाड़ पर कुछ दिन व्यतीत करने की सलाह दी। पहाड़ों में मौसम आजकल सही है। अधिक ठंड भी नही आरम्भ हुई है। अक्टूबर के महीने में आपको स्वास्थ्य लाभ होगा। बाहर जाने से मन बहलता है और स्वास्थ्य लाभ भी जरूर होगा।

नवीन और नयना अपनी पसंद के हिल स्टेशन मसूरी के लिए निकले। अक्टूबर के महीने में दिन में गुलाबी ठंड और रात को मध्यम ठंड थी। दिन में बादल आते औऱ खिड़कियों से अंदर आकर भाप में परिवर्तित हो जाते। कैमल बैक रोड पर घूमते हुए दोपहर के समय एक बेंच पर नवीन और नयना बैठ गए। नवीन के कंधे पर सर टिका कर सामने पहाड़ पर पड़ती धूप को देखते हुए बोली।
"नवीन कितने वर्षों बाद घर से बाहर निकले है?"
"नयना दस वर्ष हो गए होंगे शायद?"
"हां बच्चों के विवाह के कारण इतने व्यस्त हो गए थे कि कहीं बाहर की सोच ही नही सके। आज अच्छा लग रहा है पुरानी जगह पर घूम कर यादों को ताजा करते हुए। नवीन कैमल बैक रोड पर हाथ मे हाथ डाल कर घंटो घूमते थे फिर थक कर बेंच पर बैठ जाते थे। प्राकृतिक सौंदर्य को निहारते थे।"
"कैमल बैक रोड अब भी पहले जैसा है। कुछ नही बदला। वैसा ही शांत वातावरण।"
"मॉल रोड पर दुकाने अधिक हो गई हैं। पहले मॉल रोड से दून घाटी नजर आती थी और रात में देहरादून की झिलमिलाती बत्तियां नजर आती थी। बादलों में छुप जाती थी। बादल बत्तियों को अपने अंदर छुपा लेते थे और फिर जाते हुए बत्तियों को हमारे हवाले कर देते थे पर अब मॉल रोड पर खाली स्थान ही नजर आता कि देहरादून की बत्तियां देखने बेंच पर बैठें।"
थोड़ी देर तक नवीन और नयना पुरानी यादें ताजा करते रहे। धूप ढलने के बाद ठंडक बढ़ी और दोनों ने होटल की ओर प्रस्थान किया।

नवीन और नयना एक सप्ताह मसूरी में रहे और सुबह और फिर दोपहर के समय घूमते। घर की दिनचर्या से दूर दोनों खुशनुमा माहौल में हाथ में हाथ डाले घूमते। मसूरी से देहरादून और ऋषिकेश में दो-दो दिन रुक कर हरिद्वार आ गए।

हर की पौड़ी पर नयना अपने पैरों को गंगाजी में डाल कर सामने चंडीदेवी की पर्वत श्रृंखला को देखती हुई नवीन से बोली "नवीन गंगाजी में समा जाने को दिल कह रहा है।"
नवीन ने नयना का मुख को अपने दोनों हाथों में लिया और नयना की आंखों में झांकते हुए "क्या कह रही है तू?"
"एक दिन तो गंगाजी में प्रवाहित करोगे मुझे। आज मैं स्वयं गंगाजी में समा जाती हूं।"
"पागल हो गई है तू, क्या बक रही है?"
"नवीन तुम मानो या नही मानो, शरीर ने संकेत देने आरम्भ कर दिए है। तबियत भी ठीक नही रहती है। मुझे अपना अंत दिखाई देने लगा है।"
"नयना दुनिया भर के टेस्ट करवा लिए। किसी में कुछ भी नही निकला। कोई बीमारी नही है। बेकार की मत सोच। दवाई चल रही है। तुम चिंता मत करो। सब ठीक है।"
"तुम कहते हो तो ठीक मान लेती हूं परन्तु तुम मेरी एक बात सुनो कि कुछ तो अवश्य है चाहे टेस्ट भी उनको पकड़ने में सफल न रहे हों।"
"तू इस तरफ नही सोचेगी। अपनी खोपड़ी में से उल्टे विचार बाहर कर। सकारात्मक सोच नयना।"
"चलो तुम्हारी बात मान ली। अब गंगा स्नान तो कर लो।"
"ठंड है। पानी भी ठंडा है, मैं मुंह धो लेता हूं।"
"बिल्कुल नही नहाना तो पड़ेगा। अक्टूबर का महीना है और धूप भी अच्छी निकली हुई है। अपनी जवानी याद करो और डुबकी लगाओ। ठंड नही लगेगी।"
"मेरा हाथ पकड़ कर नहाना।"
"तुम्हारी बात मान रही हूं। आज गंगाजी में नही समाउंगी। चलो एक साथ डुबकी लगाते हैं।"
नवीन ने तीन-चार डुबकी लगाई और घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। नयना चार-पांच डुबकी लगाती फिर घाट की सीढ़ियों पर बैठती। दो-चार मिनट के बाद फिर डुबकी लगती। नवीन नयना पर नजर रखे हुए था और नयना की मनोदशा पर विचार कर रहा था कि आखिर क्यों नयना अपने अंतिम समय की बात कर रही है जब डॉक्टरों ने तमाम टेस्ट कर के देख लिया कि कोई बीमारी नही है।
"तुम डरपोक हो, दो डुबकी लगा कर किनारे बैठ गए। कितना मजा आया नहाने में। तृप्त हो गई आज गंगा स्नान करके। वर्षो बाद गंगा स्नान हुआ। चलो नाश्ता करके भवन चलते है फिर सारा दिन आराम।"
"एक तो नहाने के लिए कपड़े नही लाये। पहने हुए कपड़ो के साथ नहा लिए। मेरे कपड़े तो धूप में सूख गए हैं। पहले दस मिनट धूप में बैठ कपड़े सुखा। बदन से चिपके हुए गीले कपड़े अच्छे नही लगते।"
पांच मिनट में गीले कपड़े सूख गए। ढाबे में नाश्ता करने के पश्चात भवन में आराम किया।
नवीन नयना की मनोदशा पर विचार करने लगा।
"पंखे की ओर टकटकी लगाए क्या सोच रहे हो?"
"जो तुम हर की पौड़ी में कह रही थी।"
"दिमाग पर बोझ मत डालो। एक दिन अंत आना है, जो परमसत्य है। खुशी से उसको स्वीकार करते है हो सकता है अधिक तकलीफ न हो। आराम से चले जाएं।"
"जाना तो सबसे एक दिन है लेकिन तुम इस विषय पर अधिक सोच रही हो।"
"नवीन हम घूमने आए हैं। अच्छा लग रहा है। मन दूसरी तरफ लग जाता है और हम कुछ पलों के लिए अपने दुख भूल जाते है। घर पहुंच कर फिर उन्ही चक्करों में बंध कर जीते हैं। मैं तुम्हे यहां प्रसन्न दिख रही हूं लेकिन अंदर-अंदर मेरी तबियत ठीक नही है। लगता है कि कुछ हो जाएगा।"
"ऐसा मत सोच मैं तेरे साथ हूं।"
"ठीक है अब तुम भी मत सोचो और कल वापिस दिल्ली चलो।"

दिल्ली आने के बाद नयना की तबियत बिगड़ गई। डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर कटने लगे। खामोश नयना के होठों पर मंद मुस्कान रहती। एक दिन डॉक्टरों ने नयना को कैंसर घोषित कर दिया।
"पिछले एक वर्ष से चेकअप हो रहा है। कमाल है कि आज कैंसर का पता चला?" नवीन ने आश्चर्य से पूछा।
"नवीन जी कई बार कैंसर का पता देर से चलता है और वह बढ़ चुका होता है। ऐसा कुछ नयना की बीमारी पर हुआ।" डॉक्टर ने स्पष्टीकरण दिया।
"डॉक्टर साहब हमने कोई टेस्ट नही छोड़ा। आप फ़ाइल की मोटाई देखिए। एक साल में टेस्ट ही टेस्ट। मुझे यकीन नही होता कि कैंसर अधिक बढ़ गया है?" नवीन आश्चर्य से शून्य में ताकता हुआ डॉक्टर को देखता रह गया।
डॉक्टर नवीन की मनोदशा समझ गया और धीरज से नवीन और नयना को इलाज की जानकारी दी।

नयना धीरज से नवीन को देखती रही और डॉक्टर की बात सुनती रही। उसे पहले से अहसास हो चुका था और ईश्वर की मर्जी समझ कर शांत रही। नवीन की आंखों में आंसू देख नयना ने डॉक्टर से प्रश्न पूछा। "डॉक्टर साहब इलाज कब से शुरू करना है?"
"आप निर्णय लीजिए। हम तुरंत इलाज आरम्भ कर देंगे।"
"ठीक है डॉक्टर साहब हम दो चार दिन में निर्णय करके आपसे मिलते हैं।"
घर आकर नयना ने नवीन से कहा "मुझे किसी गंभीर बीमारी का अहसास हो गया था क्योंकि जब तबियत ठीक नही थी और टेस्ट भी बीमारी को पकड़ने में असफल रहे। अब अंत कभी भी हो सकता है। हमें यह तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए।"
"नयना चमत्कार भी होते हैं। इलाज करवाना है। तुम ठीक हो जाओगी।"
"ठीक है। जब कहो इलाज शुरू करवाते हैं। नवीन कल से ही करते हैं।"
"हां नयना।"

अगले दिन से नयना का इलाज आरम्भ हो गया। बच्चों को सूचना दे दी। बच्चे और नजदीकी रिश्तेदार सभी नयना के इर्दगिर्द एकत्रित हो गए। थोड़े दिन बाद सभी अपने काम, नौकरी और व्यवसाय का वास्ता देते हुए अपने घरों को प्रस्थान हो गए। बच्चे भी वापिस अपने घर चले गए। अब नवीन और नयना अकेले रह गए। कीमोथेरिपी के बीच अपनी और नवीन की जरूरतों को पूरा करती नयना कभी रो देती और कभी हंसती। नवीन नयना को सांत्वना देता कि वह बीमारी से उभर जाएगी लेकिन नयना उभर न सकी। तीसरी कीमोथेरपी के पश्चात नयना को तेज ज्वर हुआ। ज्वर एक सौ पांच से नीचे नही हुआ। अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई नयना ने अर्ध चेतना में नवीन को पुकारा। गले से बहुत धीमी आवाज निकली। नवीन ने नयना के माथे पर हाथ रखा। ज्वर से नयना का तन झुलझ रहा था।
"नवीन जन्म भी अस्पताल में हुआ और आज मृत्यु भी अस्पताल में। देखो विधाता के नियम।"
"नयना तुम धीरज रखी।" कह कर नवीन ने नर्स बुलाने के लिए घंटी बजाई।
"नवीन डॉक्टर अब कुछ नही कर सकते। मुझे अपनी बाहों का सहारा दो। अंतिम समय तुम्हारी बाहों में रहना चाहती हूं।"
नवीन ने नयना को बाहों में लिया। नयना ने नवीन को देखा और आंखें बंद कर ली। नर्स आई और नयना की हालत देख डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने निरीक्षण के पश्चात नयना का अंत घोषित कर दिया।
हरिद्वार में गंगाजी में नयना के फूल विसर्जित करते समय नवीन की आंखों के सामने हर की पौड़ी पर स्नान करती नयना की बात कानों में गूंजने लगी।
"नवीन गंगाजी में समा जाने को दिल कह रहा है।"
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