सुनन्दा----राधाकृष्ण अरोरा

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सुनन्दा----राधाकृष्ण अरोरा

Post by admin » Mon Jun 25, 2018 3:35 pm

सुनन्दा----राधाकृष्ण अरोरा

शीत ऋतु का प्रभात। कोहरे की मोटी चादर ओढ़े पुण्य-सलिला भागीरथी सिसक रही थी। पास ही खड़ा हिमालय पुत्री की सिसकियाँ सुनकर व्याकुल हो उठा। उसकी छाती से कुछ पत्थर गिरे और गंगा से पूछने लगे—क्या हुआ बेटी ? गंगा चुप रही। सिसकती रही। धीरे-धीरे बालरवि की किरणों ने कोहरे की चादर को समेट लिया। बेटी गंगा का उदास मुँह देखकर हिमगिरि छटपटा उठा। कितने ही बड़े-बड़े पत्थर उसकी छाती से लुढ़क कर गंगा की गोद मे आ गिरे। पुरातन पिता की व्याकुलता से विचलित गंगा, उनके चरणों मे लेटे-लेटे अपने मन का बोझ हल्का करने लगी। कहने लगी—
“ वैसे तो आँसू और मुस्कानों का मेला मेरे किनारे रोज रोज लगता है। दुनियाँ के दुखों से घबड़ाकर लोग मेरे पास आते हैं। मंगल-कामना करते हुए श्रद्धा के पुष्प मुझे अर्पित करते हैं। पर सुनन्दा का आना सचमुच निराला था। पिछले साल की ही तो बात है। सर्दियों की ऐसी ही एक सुबह थी। भोर का ऐसा ही अँधियारा था। तभी मैंने देखा सामने आश्रम की सीढ़ियों से उतरती हुई एक दीपशिखा को। धीरे-धीरे मेरी तरफ आती हुई उस दीपशिखा के प्रकाश मे मैंने देखा एक सुन्दर पर बेहद उदास चेहरा। पूजा की थाली मे दीप लिए जब वह मेरे पास आ खड़ी हुई तो मैं उसे देखती ही रह गई---28-29 साल की लगती थी सुनन्दा, किसी अच्छे घर की प्यारी लड़की। शान्त और सोम्य चेहरा, कमल सी सुन्दर आँखें। मेरे पास बैठकर सुनन्दा ने मेरे जल को आँखों से लगाया, माथे से छुआया। फिर मेरी जलधारा मे उतर आई, स्नान करने लगी। वह नहाती रही। मैं उसके सुन्दर, सुगठित, युवा शरीर को दुलारती रही। तभी मैंने सुना-वह अपनी मधुर आवाज मे गा रही थी—
मुक्तिदायनी गंगा
जगत-तारिणी गंगा
पापहारिणी गंगा
ओ गंगा...
“भोर की नीरवता में सुनन्दा के अन्तर्मन की गहराईयों से आती हुई उस आवाज की वेदना को महसूस करने में मुझे देर न लगी। सोचती रही मैं –आखिर क्यों मुक्ति चाहती है सुनन्दा इस उम्र में? दीपक के प्रकाश में उसकी खामोश आँखों को पढ़ना चाहा मैंने। पर वहाँ मुझे उदासी और वितृष्णा के सिवाय कुछ न मिला। स्नान कर, पूजा करके मेरे दिल में कितने ही प्रश्न जगाकर सुनन्दा आश्रम लौट गई। शाम को वह फिर आई। घंटों मेरे पास बैठी रही।
“इसी तरह रोज, सुबह के धुंधलके में, आश्रम की सीढ़ियो से उतरकर, आकाश की वह उदास देवी, मेरे पास आती, स्नान कर, पूजा करके लौट जाती। रोज शाम को मेरे पास आकर घंटों चुपचाप बैठी रहती। जब सुनन्दा आती, उसे खुश करने के लिए मेरे आस-पास की हवा महक उठती। मेरी जलधाराएँ थिरकने लगतीं। दोनों किनारों पर खड़े पेडों पर पक्षी चहकने लगते। जिस रोज वह नहीं आती, मेरा मन भी उठने को न करता। पक्षी गाना भूल जाते। हवा का दम घुटने लगता। सुनन्दा मुझे बेटी-सी लगने लगी थी। वह भी तो मुझे माँ ही मानती थी। तभी तो एक शाम, मेरे बहुत आग्रह करने पर उसने मुझसे सबकुछ कह दिया था---
“सुनन्दा अपनी तीन बहनों में सबसे छोटी थी। भाई नहीं था। ममता का आँचल बचपन में ही सिर से उठ गया था। पिता शहर के जाने-माने इंजीनियर थे। सुनन्दा बचपन से ही बहुत जिद्दी थी। पिता उसकी हर जिद्द पूरी करते। स्कूल की पढ़ाई खत्म कर जब वह कॉलेज में आई तो एक राजकुमार उसके युवा मन के सपनों पर हावी हो गया। वह उसकी ही क्लास में पढ़ता था। पर वह उसकी जाति का न था। प्यार की पींगे बढ़ती गईं पर जब शादी का सवाल आया तो सुनन्दा के पिता पत्थर की तरह अड़कर खड़े हो गए। जाति के बाहर बेटी की शादी करने से उनहोने साफ इन्कार कर दिया। जिद्दी सुनन्दा ने अपने सपनों के राजकुमार से कोर्ट मे जाकर सिविल मैरेज कर ली।
“सुनन्दा की शादी मे उसकी तरफ से कोई नहीं आया। न उसके पिता, न उसकी बहनें। हाँ, उसकी कॉलेज की एक सहेली जरूर थी। सुनन्दा ने सोचा-शादी के बाद वह पिता को और बहनों को मना लेगी। उसे सुखी देखकर वे पिछली बातें भूल जाएंगे।
“शादी के बाद जब सुनन्दा अपने पति के घर आई तो सास-ससुर से उसे वह सबकुछ नहीं मिला जिसकी कामना हर नई-नवेली दुल्हन करती है। पर उसका पति उसे दिलो-जान से प्यार करता था। प्यार की यह अनमोल दौलत सुनन्दा के लिए काफी थी। एक़ दिन धीरे से जब पति के कानों मे उसने कुछ कहा तो उसने सुनन्दा को खुशी के मारे बाहों मे भरकर आकाश मे उछाल दिया। दोनों अपनी पहली संतान का मुंह देखने के लिए उतावले हो उठे।
“पर हाय रे नियति की निष्ठुरता ! सुनन्दा को मरा हुआ लड़का पैदा हुआ। अपनी मृत संतान को बाहों मे भरकर पागल-सी हो गई थी सुनन्दा। वह उसके मृत शरीर को चूम-चूम कर रोने लगी। समझ नहीं पाई कौन से पाप की सजा दी है ईश्वर ने उसे।
“फिर सात-आठ साल यों ही बीत गए। सुनन्दा की गोद सूनी रही। मातृत्व का सुख उसे नसीब न हुआ। उसका पति अब उससे खिंचा-खिंचा रहता। वह उस खिंचाव का, अलगाव का, तिरस्कार का कारण जानती थी। पर क्या करती बेचारी! पिता उसे कई बार घर लिवा ले गए थे। स्वाभिमानी सुनन्दा उन्हें अपना दुख न बता पाई। बिटिया की चुप्पी और उदासी देखकर पिता बेचैन हो उठते, उसे छाती से लगाकर बार-बार पूछते। पर वह हर बार टाल जाती,बात बदल देती। कभी-कभी सुनन्दा अपनी बहनों के यहाँ जाकर रहती। उनके बच्चों पर अपनी ममता उड़ेल देती। पिया के घर से पत्र लिखकर उसे कोई नहीं बुलाता—वह राजकुमार भी नहीं, जिसकी छवि को अपनी जागती आँखों मे भरकर सुनन्दा ने जीवन के सतरंगी सपने सजोए थे। कुछ दिन पिता और बहनों के यहाँ रहकर वह स्वयं ही पति के घर की दहलीज पर आ खड़ी होती। पति को अपने तन,मन और आत्मा का सारा सौन्दर्य देकर भी संतान न दे सकी थी। अभागिन सुनन्दा का शायद यही सबसे बड़ा अपराध था।
“एक बार सुनन्दा लगभग दो महीने से अपने पिता के घर टिकी हुई थी। इस बीच एक दिन उसकी सहेली के एक पत्र ने उसे झकझोर दिया। सहेली ने लिखा था— जीजाजी अपने ऑफिस की एक लड़की के साथ घूमते-फिरते हैं। सुना है वे दूसरी शादी करने वाले हैं। सुनन्दा का दिल टूट गया । जानती थी की दूसरी शादी गैरकानूनी होगी। पिता से कहकर वह उस शादी मे बाधा डाल सकती थी। पर मन ने कहा—जिसे तूने पहला प्यार किया, जब उसीने तुझे अपने ह्रदय-सिंहासन से उतारकर फेंक दिया तो अब कानून की सहायता लेने का क्या फायदा?
“सुनन्दा ने अपने पिता को कुछ नहीं बताया और उसी रात, अपने सोये हुए पिता के चरण छूकर उसने वह महानगर छोड़ दिया और इस आश्रम मे आ बसी। आश्रम के हॉस्पिटल मे वह बीमारों की सेवा करती। शाम को आश्रम के गरीब-अनाथ बच्चों को लेकर मेरे किनारे आकर तरह तरह के खेल खिलाती। फिर उनके साथ मिलकर आरती गाती और लौट जाती।
“एक बार सुनन्दा जब काफी दिनों से मेरे पास नहीं आई तो मैं छटपटाने लगी। शाम को अब आश्रम के मंदिर के पुजारी बच्चों को लेकर आते। एक शाम उनकी बातों से मुझे पता चला—सुनन्दा को केन्सर हो गया है। वह दवा लेने से और कोई भी इलाज कराने से इन्कार कर रही है।
“उस रात मैं सो नहीं पाई। रात भर मेरी जलधारा चीखती रही, दहाड़ती रही, पत्थरों पर सिर पटकती रही। रात बीती। फिर भोर के धुंधलके मे मेरी प्यासी आँखों ने देखा—हवा मे बुझती-जलती दीपक की लौ, पूजा की थाली, उस थाली को थामे दो कमजोर हाथ। डगमगाते कदमों से, स्वर्ग की वह उदास देवी आश्रम की सीढियाँ उतर रही थी। मैं निहाल हो गई। जैसे ही वह मेरे पास आकर बैठी, मैंने हाथ बड़ाकर अपने ठंडे जल से उसका मुंह धोया। लम्बी बीमारी के निशान उसके चेहरे पर साफ साफ नज़र आ रहे थे। फिर वह मेरी गोद मे आ बैठी। कितनी दुबली-पतली और हलकी हो गई थी मेरी सुनन्दा। उसके कमजोर स्वर मेरे कानों मे पड़े—
मुक्तिदायिनी गंगा
जगततारिणी गंगा
पापहारिणी गंगा
ओ गंगा...
“स्नान कर,पूजा का दीप और पुष्प मुझे देकर जब वह उठने ही लगी तो अचेत होकर वहीं गिर पड़ी। मेरी जलधारा बार बार उसे चूम-चूम कर जगाने लगी।
फिर क्या हुआ बेटी?—हिमालय ने घबड़ाकर पूछा।
“मेरी बेटी, मेरी सुनन्दा मेरी ही गोद मे अनन्त निद्रा मे सो गई”—यह कहकर भागीरथी फिर सुबकने लगी,सिसकने लगी। पास ही खड़ा हिमालय उसे समझाता रहा,सांत्वना देता रहा।

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