मेघाच्छन्न आकाश---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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मेघाच्छन्न आकाश---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Tue Jun 26, 2018 7:29 pm

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मेघाच्छन्न आकाश---डॉ. श्रीमती तारा सिंह
निविड़ अंधकार की ओर बढ़ती जा रही, मनोरमा की आँखों की रोशनी अब धुँधली पड़ने लगी है, लेकिन आज भी उसका नीरव हृदय उसे यादकर आलोकित हो उठता है, जैसे स्वच्छ जल का एक श्रोत उस एकाग्र मन से बहा जाता हो । उसका वदन सहसा खिल उठता है, हथेलियाँ पल्लव की तरह काँपने लगती हैं और आनंद से अधीर उसका हृदय नाचने लगता है । ऐसी शायद ही कोई रात गुजरी होगी, जब पलक बंदकर उसकी चिंता में मनोरमा न बितायी हो । पति रमेश के पूछने पर कहती है --- ’मेरी जागती आँखों में मेरे अतीत की परिछाहीं से एक नन्हीं परी निकलकर आ जाती है और वह मेरे साथ खेल-खेलकर मुझे इतना थका देती है कि दिन में भी, मैं क्लांत जीती हूँ । ’
मनोरमा की दर्द भरी बातों से रमेश विचलित हो उठा । उसने मनोरमा की ओर आद्र आँखों से देखते हुए कहा ----’ आखिर कब तक , इस तरह तुम घुलती रहोगी उसे याद कर । अब तो जीवन-संध्या आ गई , शीघ्र ही रात्री भी होने वाली है, जल्द ही हमलोग चिरनिद्रा में सो जायेंगे । तुम क्या सोचती हो ’मनो’ ,कि मुझे उसकी याद नहीं तड़पाती । अरि ! सच मानो, जब भी उसका चेहरा, पृथ्वी के छाया-पथ की तरह मुझे दिखाई पड़ती है , मैं उसे देखकर संतोष का जीवन बिताने लगता हूँ । मगर हटते ही ,उसकी परिछाहीं , आँखों से अश्रुधारा बन बह जाती है । मुझे खुद भी समझ में नहीं आता, कि मुझ जैसे निराश पिता की आँखों से वह व्यर्थ आँसू बन क्यों ढ़लक जाती है ? यह आँसू मेरे लिए गरल है या अमृत , यह तो मैं नहीं जानता; अगर अमृत है, तो इसमें इतना जलन क्यों है और अगर ज्वाला है, तो मुझे जलाकर भस्म क्यों नहीं कर देती ? मैं और जीना नहीं चाहता ।’
मनोरमा , पति रमेश की बातों से विचलित हो उठी । उसे आज समझ आया, कि रमेश की उदासी का रहस्य क्या है ? वह बात को अलग मोड़ देने के लिए, अतीत में झाँकती हुई बोली ---’तुम भी अजीब के प्रोफ़ेसर थे, तेंतीस साल की नौकरी में कभी कॉलेज से छुट्टी नहीं लिये ।’
रमेश , कलेजा मजबूत करते हुए बोला – ’हाँ, उस रोज भी जब नियति अपना कठोर विधान पूर्ण कर चुकी थी ,तब मैं कॉलेज से घर पहुँचा था । जानती हो , उसे गोद में लेकर जब मैं दफ़नाने जा रहा था, उसकी निश्चेष्ट आँखें मौन- भाषा में जैसे मुझसे कह रही थी , ” पापा, आज भी आप कॉलेज चले गये , जब कि आपको पता था, मैँ महायात्रा पर निकलने वाली हूँ ।’
मेरे पास ,उसके प्रश्न का जवाब नहीं था, सिवा अफ़सोस के , आँसू टपक-टपककर मेरी आँखों से गिरता रहा । रोते-रोते मेरी हिचकी बंध गई थी ।
मनोरमा पति के दर्द को समझ पा रही थी । वह आँखों में प्राण लेकर रमेश के समीप गई, और एक क्षण भी खड़ी नहीं रह सकी । जैसे लोहा खिंचकर चुम्बक से चिपक जाता है, उसी तरह वह रमेश से जाकर लिपट गई और कातर होकर कही -----’ अब और सुना नहीं जाता रमेश ; बाकी फ़िर कभी बताना । अभी तुम पहले गम के सागर से बाहर निकलो और मुझे माफ़ कर दो । मेरे शब्दों ने तुम्हारे दिल को तोड़ दिया ।’
रमेश चुपचाप खड़ा, मनोरमा के मुख की ओर ताकते रहा, काले मेघ का वह अल्पांश, जिसे आज 35 साल हो गये; रमेश के हृदय- आकाश पर पक्षी की भाँति उड़ता हुआ आ गया था , और धीरे-धीरे सम्पूर्ण हृदय—आकाश पर छा गया । अतीत की ज्वाला में उसकी झुलसी हुई कामनाएँ राख बनकर उड़ने लगीं, जिसे वह सहज आँखों से देख न सका और आँसू बहने लगे । ऐसे में कौन किसे संभाले; दोनों ने ही आहत कंठ से एक- दूसरे से कहा---’ पता नहीं, आगे स्वर्ग की शीतल छाया है, या फ़िर अभी की तरह ज्वाला । इसी मानसिक पराभव की दशा में दोनों के अंत:करण से निकल पड़ा ---’ वह तो ईश्वर ही जाने ।’ दोनों ही बुढ़ापे के भार को अपने-अपने सरों पर लेकर दबे जा रहे थे; मगर इस भार को हल्का करने के लिए कोई साधन भी तो नहीं था । पुत्र-स्नेह में ईश्वर का वहिष्कार कर मानो उफ़नती नदिया में नौके का परित्याग, दोनों पहले ही कर चुके थे । कर्म जिग्यासा किसी तिनके का सहारा नहीं लेने देता । ऐसे में इस जीवन का अंत क्या होगा , और कहाँ , सोचकर दोनों मूर्च्छित हो उठे । दोनों का पीड़ित हृदय , पक्षी के समान तन-पिंजड़े से निकलकर कोई आश्रय खोजने लगे । तभी उस नन्हीं परी की सलौनी सूरत दोनों के आँखों के आगे आकर खड़ी हो गई , जो दोनों हाथ फ़ैलाये ,गोद में बैठने के लिए हलस रही थी , उसे आतुर दिल झपटकर गोद में बिठा लिया, जिससे वर्षों से मन-आकाश पर छाया हुआ गर्द बैठ गया और अतीत की ज्वाला में झुलसी हुई कामनाएँ ,पल भर के लिए ही सही, फ़िर से उसकी शीतल छाया में हरी हो गई ।
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