दीदी ! नींद नहीं आ रही -----डा. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

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दीदी ! नींद नहीं आ रही -----डा. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव

Post by admin » Mon Aug 13, 2018 6:13 am

दीदी ! नींद नहीं आ रही ......डा. प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
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माँ की ममता का कोई मोल नहीं है । ममता अप्रतिम , अविस्मरणीय एवं मातृ
ऋण है । ईश्वर ने मातृ शक्ति को भरपूर ममता दी है , जिससे कि, वह अपनी
संतान का पालन –पोषण कर सके , व शिशु को अपने स्निग्ध कोमल अंचल मे छुपा
सके । प्यार से लोरी सुना कर शिशु को सुरक्षा का अहसास करा सके, व
प्यार से थपकी देकर सुला सके ।
नीरू एक सुंदर, सुशील , संस्कारी लड़की थी उसने परास्नातक डिग्री प्राप्त
की थी , व अपने विषय में पूर्ण रुपेण पारंगत थी । उसकी नियुक्ति हमारे
ग्राम में सहायक अध्यापिका के पद पर हुई । नीरू मिलनसार लड़की थी, व
मृदु स्वभाव की थी । जल्दी ही वह अपने विध्यालय मे कड़ी मेहनत व मृदु
व्यवहार के कारण लोक प्रिय हो गयी । छात्र व छात्राएं उसे बहुत चाहने लगे
। घर –घर उसके व्यवहार व विद्वता की चर्चा होने लगी थी ।
नीरू, अभी मात्र 25 वर्ष की थी । उसके माता –पिता निर्धन थे व पेन्शन से
मुश्किल से उनका गुजारा चलता था , अत :नीरू बेटी ही उनके जीवन यापन का
सहारा थी । नीरू बेटी के अतिरिक्त उसकी दो सगी बहनें नीना व रीना भी थी ,
जिनका विवाह हो चुका था । वे अपने घरों मे खुश थी , किन्तु माता –पिता की
देखभाल करना उनके लिए कठिन कार्य था । उन दोनों के भी दो –दो बच्चे थे ।
अपने माता –पिता के संरक्षण के अतिरिक्त, नीरू को अपने भविष्य की भी
चिंता थी । माता –पिता को नीरू के लिए विवाह योग्य लड़के की तलाश थी ,
किन्तु कहीं बात बन नहीं रही थी ।
नीरू के पड़ोस के विध्यालय मे अनुभव नाम का एक सहायक अध्यापक था , दोनों
साथ साथ बस पकड़ते थे । अनुभव नीरू को पसंद करता था, और मन ही मन नीरू भी
उसे चाहने लगी थी । नीरू, जब बस में अनुभव को देखती तो उसकी आँखों मे
चमक आ जाती थी । एक अनजान सहारे का अहसास उसे होता जो उसे सुकून पहुंचाता
था । अनुभव भी जब नीरू को आस पास पाता, उसका हृदय प्रफुल्लित हो उठता था

दोनों को, इस तरह सफर करते दो बरस बीत गए , परस्पर एक दूसरे की
अनुपस्थिति उनको उदास व बैचेन करती थी ।
एक दिन दोनों बस स्टॉप पर बस का इंतजार कर रहे थे , रिम झिम फुहार पड़ रही
थी । सावन का महीना था। नीरू छाते की ओट लेकर तिरछी निगाहों से कभी-
कभार अनुभव पर नजर डालती , और फिर सामान्य होने का प्रयास करती थी ।
अनुभव भी मन ही मन परेशान व बैचेन था , उसके मन की बात मन ही मन मे दब कर
उफान मारती थी । आखिर उससे रहा ना गया । और वो नीरू के करीब खड़ा हो
गया , बस स्टॉप पर एक्का –दुक्का ही यात्री बस की प्रतीक्षा मे खड़े थे ।
अनुभव ने, नीरू के पास खड़े होकर उसका औपचारिक रूप से उसका हाल –चाल
पूछा । नीरू ने भी स्वाभाविक रूप से उनका उत्तर दिया । धीरे –धीरे, नीरू
व अनुभव करीब आते गए । नीरू ने भी अनुभव के विचार जानने की कोशिश की व
अपने माता पिता के बारे में विस्तार से बताया अनुभव के परिवार के
सम्बंध में जानकारी प्राप्त की । नीरू के अनुसार , अनुभव एक सुशील,
संस्कारी व सच्चा , ईमानदार इंसान था , जो परिवार की ज़िम्मेदारी निष्पक्ष
रूप से निभाने को तैयार था । अनुभव के माता पिता सामान्य परिवार के थे ।
उनकी भी देखभाल अनुभव ही करता था ।
धीरे धीरे विचारों का संगम , प्रेम के बीज़ प्रस्फुटित कर गया । दोनों ना
केवल दूरभाष पर बल्कि प्रत्यक्ष रूप मे भी एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते
थे । एक दिन बस स्टॉप पर अनुभव ने नीरू से अपने दिल की बात प्रकट की ,
डरते –डरते, हृदय मे घबराहट लिए उसने कहा , --नीरू, हम दोनों एक दूसरे
को अच्छी तरह जानते है । हमारे परिवार को हमारी आवश्यकता है , हम एक
दूसरे को प्यार करने लगे हैं । नीरू तुम्हें देख कर मन आनंदित होता है ,
क्या तुम मुझसे विवाह करोगी ।
नीरू ने अचानक आए, इस प्रस्ताव पर पहले हिचकिचाहट व्यक्त की, किन्तु,
धीरे- धीरे उसने स्वीकार कर लिया कि वह भी, अनुभव से प्यार करने लगी है,
व अनुभव, उसके लिए उचित जीवन साथी साबित होगा, उसने अनुभव से हामी भर
दी ।
अनुभव संस्कारी लड़का था । उसने अपने माता- पिता से , अपने विवाह और नीरू
के सम्बंध मे विस्तार से चर्चा की । अनुभव के माता -पिता उदार हृदय, व
बच्चे की चाहत मे अपनी चाहत रखते थे । उन्हे, अपने लाढले पर पूरा भरोसा
था ।
उन्होने नीरू के माता- पिता से नीरू का हाथ मांग लिया ।
जब, हल्की ठंडक दस्तक देती है , सूरज गुलाबी होकर चारों तरफ नरम धूप व
फूलों की खुशबू बिखेरता है , जब गरम कपड़े पहने युवा , रंग- बिरंगे,
परिधानों मे राहों पर आवागमन करते हैं, तो ये अद्भुत दृश्य होता है
। एसी ही, रात्रि के अंतिम प्रहार मे , वर्ष के अंतिम माह में , दोनों
युवा, विवाह- बंधनो मे बंध गए । जब , सूरज की किरने प्रथम गवाही देने,
गवाक्ष से कमरों मे प्रवेश करती हैं, व दिवस के आगमन का संकेत करती हैं
, दो नव युवा एक दूसरे से, सात जन्मों की कसमें खाते हुए हमेशा के
लिए एक -दूजे के हो जाते हैं ।
दोनों का दाम्पत्य जीवन प्रारम्भ हो चुका था। उनके कंधों पर सास –ससुर
की अतिरिक्त ज़िम्मेदारी थी , जिसे उन्होने बखूबी निभाया , दोनों जीवन
रूपी नैया मझधार मे खेने लगे ।
एक दिन नीरू, अनमनस्क भाव से बैठी थी । अनुभव उसकी बैचेनी का कारण समझ
नहीं पा रहा था । अनुभव ने प्यार से कहा , --
नीर, कुछ समझ में नहीं आवत तुम काहे ऐसन बैठी हो , मन ही मन मे कछु
परेशान लगती हो।
नीरू ने कहा –अनु, हम एक दुविधा में हैन , काहे की हमरे कक्षा की एक
लइकी एक मुस्लिम लरिका के संघे फरार हो गइल बा , ई लईकन सब , काह समझ
के एतना बाड़ा कदम उठाइन हैं ।
अनुभव –कौन लड़की बा जौन स्कूल के पूरब माही गाँव से आवत रही , वही, का
नाव रहा ओकर ? –मोनी
हाँ मोनी ?
अनुभव –लईका कौन रहा, जौन हड्डी टोला से आवत रहा ?
नीरू –नुरुल ,
अनुभव –वह लईका एतना बदमाशी किहिश , अगर दुइनों काउनों गलत कदम उठाए
लिहे, तो समझो उपद्रव होई जाई ।
एक दिन बाद, पता चलता है, की दोनों नाबालिग अन्य ग्राम में साथ साथ
पकड़े गए । गाँव वालों ने, दोनों की धुनाई की फिर दोनों को पुलिस के
हवाले कर दिया । पुलिस ने , दोनों के माता- पिता को चेतावनी देकर, दोनों
बच्चो को उनके अभिभावकों के हाथ सौप दिया ।
नीरू के विध्यालय के छात्र होने के कारण नीरू और अनुभव, मोनी के घर
मिलने पहुंचे व हालचाल जाना । नीरू ने मोनी को बुला कर उससे घटना के बारे
मे पूछा ।उसे समझाते हुए कहा ।
मोनी –का समझ के तू नुरुल के साथे भागले हो , शादी बियाह , पीयार –मनुहार
गुड्डा –गुड्डी के खेल नाही ।
मोनी सर झुकाये मौन पूर्ववत खड़ी रही ।
नीरू ने कहना शुरू किया –मोनी जानत हौ की नुरुल विधर्मी परिवार के लईका
है, ओकर संग कैसे कर लेला । ओकर रीति –रिवाज , धरम –संस्कार सब उल्टा बा
, उ तुमका बुर्का पहिनाइ , पर्दामें रहे के पड़ी , तूहारआपन नाम , धरम
बदलवा दीन जाई । मांसाहार उनकर मुख्य भोजन बा । ओकर संग कैसे कर लेला ,
बात न माने पर मार –पिटाई , गली गलोज सब सहे के पड़ी । मोनिया उन लोगन के
कौनौ भरोसा नईखे , जौन आपन बहन –बिटिया के असुरक्षित छोड़ सकेला ,तनी से
विवाद में तलाक हो जाला , समझौता करे पे दुसर मर्द के संघे हलाला होला
फिर इद्दत होला , फिर तलाक होला उसके बाद निकाह होला । ई सब अत्याचार-
अनाचार मुस्लिम बहनों पर रोजाना होला , पर कौनौ खिलाफत मे ना खड़ा हो
सकेला । बेटी , आपन बजूद बचाय के चला , कुसंगत से बचा ।
मोनिया , पढ़ –लिख कर आपन पाँव पर खडा हो । तब जौन निर्णय लीन जाई , ठीक होई ।
मोनी, इस कदम से पूरे खान –दान की नाक कटजाला , कम से कम बनाय ना सका ,
तो बिगाड़ा तो ना ।
मोनी की समझ में आ गया कि उसके द्वारा उठाया गया कदम बिलकुल गलत था , अगर
कुछ उंच- नीच हो जाती तो खान –दान की नाक कट जाती , उसने नीरू दीदी से
कहा –दीदी हम अब कब्बो कौनौ गलत कदम ना उठाइब । जौन करब माता –पिता जी कि
सहमति से करब ।
नीरू ने राहत की सांस ली , व मोनी को समझा –बुझा कर उसे पुन :विध्यालय
आने के लिए तैयार किया ।
अब नीरू और अनुभव अपने दिन खुशी- खुशी गुजारने लगे । दोनों को विवाह किए
हुए दो वर्ष बीत चुके थे । अब नीरू ने अपने परिवार के बारे में सोचना
प्रारम्भ कर दिया था । दोनों की सहमति से एक बच्चे पर बात बनी , और दोनों
ने खुशी -खुशी स्वीकार कर लिया ।
नीरू अब गर्भवती हो गयी थी । अनुभव उसकी देखभाल में कोई कसर ना छोडता था
। सुबह फलों का रस, पौष्टिक भोजन , आराम , औषधियों सब का ख्याल समय से
रखता था । महिला चिकित्सक से परामर्श , टीका करण सब कराया , धीरे - धीरे
वह दिन भी आया जब नीरू को प्रसव पीड़ा शुरू हुई , अनुभव ने तुरंत नीरू को,
चिकित्सालय मे भर्ती कराया । उसने नीरू की दो बहनों को बुलावा भेजा । वे
दोनों समय रहते नए मेहमान की अगवानी हेतु पहुँच गईं ।
रात्रि के प्रथम प्रहर में नीरू ने सुंदर स्वस्थ्य शिशु को जन्म दिया ,
अनुभव की खुशी का ठिकाना ना रहा । अनुभव को प्रथम बार पिता की भूमिका का
अहसास हो रहा था । नीरू भी बहुत खुश थी , सारा परिवार नन्हें –नए मेहमान
के आगमन पर खुशियाँ मना रहा था । अनुभव ने सबका मुंह मीठा कराया ।
दो दिन बाद नीरू की बड़ी दीदी ने नीरू का ख्याल करके नवजात शिशु को अपने
पास सुला लिया , जिससे नीरू आसानी से सो सके , किन्तु माँ की ममता इतनी
निष्ठुर कहाँ होती है कि क्षण भर अपने लाल का वियोग सह सके , उसने दीदी
से कहा –दीदी , नींद नहीं आ रही ।
दीदी ने पुचकारते हुए कहा , जाओ, सो जाओ आराम से, बच्चा आराम से सो रहा है ।
नीरू ने फिर थोड़ी देर बाद कहा , दीदी, नींद नहीं आ रही ।
आखिर कार शिशु को नीरू के पार्श्व मे सुलाना पड़ा तब नीरू चैन से सो सकी ।
आखिर बच्चे के रुदन , मुस्कान व नेत्र खोलकर देखने में उसके साथ माँ का
साया हमेशा साथ रहता है , उंगली पकड़ कर चलने से लेकर अपने पैरों पर खड़े
होने तक माँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हर कदम पर साथ होती है ।
आजकल लव जेहाद जैसे शब्द कानों में जहर घोलते हैं व पत्र –पत्रिका की
शीर्ष पंक्ति बन जाते हैं , किन्तु इस घटना के पीछे का सच ये है कि इन
हिन्दू लड़कियों का मानसिक ,व धार्मिक शोषण होता है । मुस्लिम लड़कों के
खूबसूरत चेहरे, दिखावटी हाव –भाव ना केवल आकर्षित करते हैं बल्कि गुमराह
भी करते हैं और निकाह की आड़ में धर्म परिवर्तन भी कराते हैं ।
02- 08- 2018
डा प्रवीण कुमार श्रीवास्तव ,

सीतापुर
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