नया साहेब--- - अंकुश्री

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नया साहेब--- - अंकुश्री

Post by admin » Tue Nov 20, 2018 6:07 am

(कहानी)

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नया साहेब

- अंकुश्री

नया साहेब बधावन के योगदान करने के बाद सभी स्टाफ दहषत में थे. उनके बारे में पहले से ही सबको पता था कि वे काम नहीं जानते हैं और जुबान के बहुत फुहर हैं.
योगदान करने के तीसरे दिन से ही बधावन ने कर्मचारियों के साथ डांट-डपट शुरू कर दी. छोटी-छोटी गलतियां निकाल कर वे किसी को भी डांट देते थे. गलतियां भी ऐसी जो डांटने के लिये ही निकाली जाती थीं. उनके पास जो भी काम जाता था, उसमें वे नुक्स निकाल देते थे. फाइल में लंबी-चैड़ी टिप्पणी लिख देते और सहायक तथा बड़ा बाबू को बुला कर खड़ी-खोटी सुना देते थे. छोटे-छोटे पत्रों को भी वे कई-कई बार में फाइनल कर पाते थे. नया साहेब से कार्यालय परेषान था ही, साहेब भी दिन-दिन भर परेषान रहते थे. इतनी परेषानियों के बाद उपलब्धि शून्य थी. पत्रों में मीन-मेख निकालने, कर्मचारियों को डांटने-फटकारने में ही सारा समय निकल जाता था.
एक सप्ताह में ही स्थिति ऐसी हो गयी कि कोई भी कर्मचारी साहेब के चैम्बर में जाने से कतराने लगा. लेकिन साहेब थे कि स्टाफ को बार-बार बुलाते और डांटते थे. डांटना ही उनकी योग्यता थी. कार्यालय की स्थिति बहुत नाज़ुक हो गयी थी. सभी कर्मचारी तनाव में थे.
नया साहेब में कोई गुण नहीं दिखाई दे रहा था. लेकिन अवगुण उनमें कूट-कूट कर भरा था. उनके रोम-रोम में जातिवादी विषेषताएं भरी थीं. इस बात को वे खुल कर बोलते भी थे. परिणामतः दूसरी जाति वालों के प्रति उनका रवैया ठीक नहीं था. संयोगवष कार्यालय में उनकी जाति का एक ही कर्मचारी था. उसका नाम था मदन. लेकिन मदन भी बाॅस की तरह ही था. उसे भी कुछ आता-जाता नहीं था. वह दूसरे कर्मचारियों को खिला-पिला कर अपने जिम्मे के सरकारी कार्यों को पूरा करा लेता था. ऐसे में वह साहेब को क्या मदद करता ? लेकिन साहेब उस पर मेहरबान थे. कोई भी वजनदार पत्र साहेब उसी के हाथ में देते थे; ताकि उसे कुछ कमाई जो जाये.
एक दिन साहेब ने सामने रखी संचिका जैसे पलटी, उन्हें गुस्सा आ गया. पत्र गलत टंकित हो गया था. पाण्डेय की संचिका थी. पत्र को सुधारने या कर्मचारी को बुला कर बताने-समझाने की क्षमता उनमें थी नहीं. वे चिल्लाने लगे, ‘‘पत्र किसने टंकित किया है ?’’
टंकक वर्मा को बुलाया गया. वर्मा को देखते साहेब ने चिल्लाया, ‘‘यह पत्र आपने टंकित किया है ?’’
‘‘जी सर !’’
‘‘जी सर !’’ वर्मा की नकल करते हुए साहेब ने कहा, ‘‘यह क्या टंकित किया है?’’ एक शब्द पर अंगुली रखते हुए साहेब ने पूछा.
‘‘मैंने उन्हीं शब्दों को टंकित किया है, जो प्रारूप में लिखा हुआ है.’’ टंकक ने आगे कहा, ‘‘यदि टंकण में कुछ गलती भी हो गयी हो तो सहायक को उसे देख कर आपके पास भेजना चाहिये था, क्योंकि पत्र का मिलान उन्हीं के द्वारा किया गया है.’’
टंकक की बात सुन कर साहेब उखड़ गये, ‘‘एक तो गलत टंकण करते हैं और ऊपर से बहस करते हैं.’’
टंकक को डांट कर भेजने के बाद साहेब ने पाण्डेय को बुला कर पूछा, ‘‘टंकण के बाद पत्र को मिलाये बिना हस्ताक्षर के लिये क्यों भेज दिया ?’’ उसने गरजते हुए कहा, ‘‘कार्यालय को मजाक बना दिया है ? कोई काम ठीक से नहीं करते हैं !’’
साहेब के गरजने से पाण्डेय सहम गया. उसने मिमियाते हुए कहा, ‘‘लेकिन मैंने पत्र मिला कर बढ़ाया है.’’
‘‘जब मिला कर बढ़ाया है तब पत्र में गलती कैसे रह गयी ?’’
‘‘प्रारूप में जो लिखा था, मैंने उसे मिला कर पत्र बढ़ाया है.’’ पाण्डेय ने स्पष्ट करते हुए कहा.
संचिका से प्रारूप निकाल कर साहेब मिलाने लगे. पत्र प्रारूप के अनुरूप ही टंकित हुआ था. सहायक द्वारा बढ़ाये गये प्रारूप को साहेब ने संषोधित कर लौटाया था. संषोधित प्रारूप के अनुरूप पत्र टंकित एवं उपस्थापित किया गया था. प्रारूप का संषोधन देख कर साहेब झेंप गये. लेकिन अपनी झेंप मिटाने के लिये उन्होंने पाण्डेय को डांटना शुरू किया, ‘‘आप इतने पुराने सहायक हैं, पांच वर्ष में सेवानिवृत्त होंगे और आपको इतनी जानकारी नहीं है कि पत्र गलत टंकित हुआ है. आपको चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिये.’’
साहेब की बात का पाण्डेय ने कोई जवाब नहीं दिया. उसने मन ही मन सोचा, ‘‘आता-जाता कुछ है नहीं, लिखावट ऐसी है कि कोई पढ़ नहीं पाये और ऊपर से इतनी डांट-डपट ? चुल्लू भर पानी में तो डूब मरना चाहिये आपको.’’ लेकिन पाण्डेय ऊपर से कुछ बोल नहीं पाया.
नया साहेब की लिखावट इतनी गंदी थी कि लिखने के बाद उसे वे स्वयं नहीं पढ़ पाते थे. भाषा या षिल्प का उन्हें अल्प ज्ञान भी नहीं था. लेकिन टंकित पत्रों को पढ़ कर उसके षिल्प के बारे में दूसरों को खूब बताते थे. वे जो भी बात करते, डांट-डपट कर. सीधी जुबान वे किसी से बात नहीं कर पाते थे.
कर्मचारियों की परेषानी का एक और कारण था. नया साहेब बात-बात में निलंबित और स्थानांतरित करने की धमकी देते थे. निलंबन और स्थानांतरण षब्द उनकी जुबान पर तैरते रहते थे. बल्कि यह कहना श्रेयष्कर होगा कि ये दोनों शब्द उनके तकियाकलाम हो गये थे.
अल्प वेतन और वृहत समस्याओं के कारण सभी कर्मचारी यों ही परेषान रहते थे. परेषानी का कारण व्यक्तिगत समस्याएं तो थीं ही, विभागीय असुविधाएं भी थीं. लेकिन नया साहेब के आने के बाद से सबकी परेषानियां अकारण बढ़ गयी थीं.
कर्मचारियों की आदत होती है किसी विषय पर चर्चा करने की. नया साहेब के आने के बाद चर्चा का विषय वही हो गये थे. बड़ा बाबू वंषीधर ने कर्मचारियों से कहा, ‘‘पदाधिकारी दो तरह के होते हैं. एक, जो काम जानते हैं और दूसरा, जो नहीं जानते हैं. जो पदाधिकारी काम जानते हैं, वे कर्मचारियों की गलती पर टिका-टिप्पणी नहीं करते हंै. पत्र को सुधार कर संचिका भेज देते हैं.’’ वंषीधर ने आगे बताया, ‘‘जो पदाधिकारी काम नहीं जानते हैं, वे खूब डांट-डपट करते हैं. बात-बात में डांटना, पत्र को काटना या फाड़ना तथा संचिकाएं पटकना उनकी विषेषता होती है.’’
श्री निवास ने भी वंषीधर की बातों पर सहमति जतायी. वह भी कई साहेबों के साथ काम कर चुका था.
‘‘लेकिन साहेब जब डांटते हंै तो बहुत बुरा लगता है.’’ यह पाण्डेय की आवाज थी.
‘‘हमलोग इनकी षिकायत भी करेंगे तो कौन सुनेगा ?’’ कष्यप ने कहा, ‘‘देखते नहीं हैं, ये दौड़-दौड़ कर बड़े साहेब के यहां जाते रहते है. उनके यहां चान्दमणि से काॅफी भेजवाते रहते हैं.’’ चान्दमणि कार्यालय की महिला आदेषपाल थी.
साहेब की डांट-डपट की तरह ही उनकी लिखावट और शैली से भी सभी परेषान थे. लेकिन उनकी गलतियों को उजागर करने की हिम्मत किसी में नहीं थी. ऐसा संभव भी नहीं था. उनके पास जो भी संचिकाएं जाती थीं, उनमें वे गलतियां निकाल देते थें और संबंधित सहायक तथा बड़ा बाबू को बुला कर डांट-डपट कर संचिका उन्हें पकड़ा देते थें. काम के उनके इस ढंग के कारण संचिकाओं का निष्पादन नहीं हो पा रहा था. एक ही संचिका कार्यालय में बार-बार घूमती रहती थी. इससे हर टेबुल पर संचिकाओं का अम्बार लगा रहने लगा.
महीना दो महीना करते छह माह बीत गये. कार्यालय से वांछित प्रतिवेदन आगे नहीं पहुंच पाता था. पत्र और प्रतिवेदन सहायक, टंकक, बड़ा बाबू और साहेब के बीच ही घूमते रहते थे. पहले उस कार्यालय की पहचान शीघ्र निष्पादन वाले कार्यालय के रूप में थी. लेकिन नया साहेब ने उन्हीं संसाधनों के रहते हुए भी कार्यालय की पहचान निष्क्रिय कार्यालय के रूप में बना दी थी. अब उस कार्यालय की पहचान प्रतिवेदन नहीं भेजने वाले या विलंब से प्रतिवेदन भेजने वाले कार्यालय के रूप में होने लगी थी. उस कार्यालय की नयी पहचान का संदेष ऊपर के कार्यालयों में गया ही, नीचे के कार्यालय में भी उसकी छवि धूमिल होने लगी.
सरकारी कार्यालयों की कार्य शैली के अनुसार ऊपरी कार्यालयों में प्रतिवेदन नहीं पहुंच पाने के कारण वहां से स्मार आने लगे. जब कोई स्मार पत्र आता तो उस प्रतिवेदन के लिये साहेब थोड़ी देर के लिये सक्रिय हो जाते थे. पहले वे बड़ा बाबू को बुलाते और उन्हें डांटते. उसके बाद संबंधित सहायक को बुला कर डांटते. तब संचिका मंगा कर उसमें आदेष देते कि विलंब क्यों हुआ, इसका स्पष्टीकरण दें.
संचिका में आदेष देने के बाद संबंधित सहायक से स्पष्टीकरण पूछने के लिये प्रारूप बढ़ाने, प्रारूप को टंकित कराने, टंकित स्पष्टीकरण को फिर से कई-कई बार सुधारने में दो-तीन दिन बीत जाता था. किसी-किसी स्पष्टीकरण को अंतिम रूप देने में सप्ताह और पखवारा भी लग जाता था. उसके बाद संबंधित सहायक पूछे गये स्पष्टीकरण का उत्तर तैयार करने-कराने में लग जाता. कार्यालय का माहौल कर्मचारियों से स्पष्टीकरण पूछने और पूछे गये स्पष्टीकरण का जवाब देने के इर्द-गिर्द घूमने लगा था. कभी-कभी एक ही प्रतिवेदन के लिये निर्गतकर्ता रमापति, टंकक वर्मा या कष्यप, सहायक पाण्डेय या अनिता और बड़ा बाबू वंषीधर से एक साथ स्पष्टीकरण पूछा जाता था.
डांट-डपट और स्पष्टीकरण पूछा-पूछी में कई दिनों तक साहेब इतना व्यस्त हो जाते थे कि उन्हें यह याद ही नहीं रहता था कि जिस प्रतिवेदन के लिये यह सब हो रहा है, उसे तो भेजा ही नहीं गया. प्रतिवेदन के लिये जब स्मार पत्र आता था तो फिर से वही सिलसिला शुरू हो जाता था.
प्रतिवेदनों के नहीं पहुंचने से ऊपरी कार्यालयों में विवाद उत्पन्न होने लगा. महत्वपूर्ण प्रतिवेदनों के लंबित रहने के कारण बड़ा साहेब ने साहेब से स्पष्टीकरण पूछ दिया. स्पष्टीकरण का पत्र पंहुचने भर की देर थी, साहेब ने अपने कर्मचारियों को डांटना शुरू कर दिया. उन्होंने टंकक वर्मा, सहायक पाण्डेय और बड़ा बाबू वंषीधर को निलंबित कर दिया.
निलंबित कर्मचारियों से काम नहीं लिया जा सकता. कार्यालय का काम हो तो कैसे ? यह एक बहुत बड़ी समस्या थी. साहेब इतना सक्षम नहीं थे कि अपने बुते प्रतिवेदन तैयार कर देते. हालांकि लैपटाॅप पर वे दिन-दिन भर बैठे रहते थे. देखने वाला कोई भी कह सकता था कि साहेब कितना जानकार हैं और कार्यालय के कार्यों को अपने से अद्यतन रखते हैं. लेकिन लैपटाॅप से अंतिम रूप से कोई प्रतिवेदन कभी बाहर नहीं आ पाया था.
लैपटाॅप में इन्टरनेट की सुविधा थी. साहेब उसका लाभ उठाने से नहीं चुकते थे. देष-दुनिया की तरह-तरह की बातें, तरह-तरह के कार्यक्रम और मनचाहे तष्वीरों को देखने में साहेब दिन-दिन भर व्यस्त रहते थे.
नीचे के कार्यालयों से कोई प्रतिवेदन मंगाना रहता तो साहेब उसकी हार्ड काॅपी के साथ ही सौफ्ट काॅपी भी मांगते थे. प्रतिवेदनों की प्राप्त सी0डी0 को लैपटाॅप में लगा कर देखने और कट-पेस्ट कर उसे समेकित करने में साहेब को मन लगता था. लेकिन हिन्दी टंकन का ज्ञान नहीं रहने से कट-पेस्ट के अलावा वे कुछ कर नहीं पाते थे. दिन-दिन भर वे लैपटाॅप में प्रतिवेदन की तैयारी अवष्य करते थे. मगर किसी भी प्रतिवेदन को वे अंतिम रूप नहीं दे पाते थे. दूसरे का काम उन्हें पसंद नहीं था और स्वयं काम पूरा कर पाने की क्षमता नहीं थी.
साहेब से स्पष्टीकरण पूछे हुए अभी दो ही दिन हुए थे कि एक दूसरे प्रतिवेदन के लिये उनसे दूसरा स्पष्टीकरण पूछा गया. पत्र मिलने पर उनको गुस्सा आना ही था. गुस्सा में उन्होंने अपने दो और कर्मचारियों को निलंबित कर दिया.
नया साहेब के आने के बाद कोई प्रतिवेदन ऊपर भेजा नहीं गया था. एक तीसरे प्रतिवेदन के लिये साहेब से तीसरा स्पष्टीकरण पूछा गया. स्पष्टीकरण पाकर वे गुस्सा से आग बबूला हो गये. सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ. अन्य लंबित प्रतिवेदनों के लिये भी उनसे स्पष्टीकरण पूछा जाने लगा.
साहेब कोई प्रतिवेदन भेजने में समर्थ नहीं थे, पूछे गये स्पष्टीकरण का उत्तर दे पाना भी उनके लिये संभव नहीं था. महत्वपूर्ण पत्राचार का काम श्रीनिवास ही कर सकता था. लेकिन साहेब ने पिछले दिन ही उसे भी निलंबित कर दिया था.
लैपटाॅप पर बैठे साहेब की स्थिति बदतर हो चुकी थी. उनके अधीनस्थ पदाधिकारी उनसे मिलने आते, उनसे मीठी-मीठी बातें करतें और मीठा काॅफी पीकर चले जाते थे. सबको पता था कि काॅफी की व्यवस्था सिर्फ इसी साहेब के चैम्बर में है.
कार्यालय के निलंबित कर्मचारियों ने बड़ा साहेब के यहां जाकर भेंट की. बड़ा साहेब ने स्थिति की समीक्षा कर तुरंत कार्रवाई की. उन्होंने कर्मचारियों का निलंबन समाप्त कर दिया. साथ ही बड़े साहेब ने एक और काम किया. उन्होंने सरकार को प्रस्ताव भेज कर नया साहेब को निलंबित करा दिया.
कर्मचारियों के निलंबन की समाप्ति का पत्र और नया साहेब के निलंबन का पत्र दोनों एक ही साथ कार्यालय में मिला. सभी कर्मचारी बहुत खुष थे. उनकी खुषी का दोहरा कारण था.
लेकिन कर्मचारियों की खुषी के विपरीत नया साहेब बहुत दुखी थे. उनके दुख का भी दोहरा कारण था. कर्मचारियों की खुषी बांटने वाले सभी थे. लेकिन नया साहेब का दुख बांटने वाला कोई नहीं था. अपना लैपटाॅप लेकर वे कार्यालय से चुपचाप निकल गये.
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अंकुश्री
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