सिन्धी कहानी बारूद -- लेखक:: हरी मोटवाणी/ अनुवाद: देवी नागरानी

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सिन्धी कहानी बारूद -- लेखक:: हरी मोटवाणी/ अनुवाद: देवी नागरानी

Post by admin » Sat Nov 24, 2018 6:18 am

सिन्धी कहानी
बारूद

लेखक:: हरी मोटवाणी
अनुवाद: देवी नागरानी

अहमदाबाद में एक अदबी सेमिनार के दौरान मेरी उससे मुलाक़ात हुई थी, जो आगे चलकर दोस्ती में बदल गई। उसे सिंधी साहित्य पढ़ने का बड़ा शौक था। वह कूँज का लाइफ़ मेंबर बन गया।

साहित्य के साथ संगीत में भी अच्छी रुचि रही। ठुमरी उसकी मनपसंद रागिनी थी, जिसे सुनते ही उसे नशा चढ़ जाता था-गर्दन झूमने लगती और हाथ सुर, लय, ताल पर थपकी देते रहते थे। कारोबार बैकिंग का था। ब्याज पर पैसे लेने और देने के सिलसिले में वह अक्सर मुंबई आया-जाया करता था। जब भी मुंबई आता मुझे फ़ोन करता, होटल में बुलाता। गुजरात में शराब पर पाबंदी थी, मुंबई में दिल जेलकर पीता और पिलाता था।

एक दिन अहमदाबाद से फ़ोन किया-‘हैलो काका! मेरा एक काम करोगे?’

उसने मेरा लिज हुआ सिंध का सफ़रनामा पढ़ा था। वहाँ सब मुझे काका कहकर बुलाते थे, तो यह भी ‘काका’ कहकर संबोधित करता।

‘हाँ बताओ, क्या काम है?’

‘मेरी बात ध्यान से सुनिए, सुन रहे हैं न?’

‘हाँ, सुन रहा हूँ।’ मैंने कहा।

‘मुंबई में एक नई ठुमरी गायिका आई है, बहुत अच्छा गाती है, मैं उसे सुनना चाहता हूँ। पता लगाएँ कि वह कहाँ पर गाती है?’

‘नाम तो बताओ?’

‘नाम चंपाबाई है।’

‘चंपाबाई।’ मैंने अजब षाहिर करते हुए कहा-‘फिर तो वह षरूर

दर्द की एक गाथा ढ


किसी कोठे पर गाती होगी! तुम कोठे पर जाओगे?’

‘काका, यह कौनसी बड़ी बात है। मैं तो उसे सुनने कहीं भी जा सकता हूँ।’

‘अच्छा, मैं पता लगाऊँगा।’

दूसरे दिन उसका फ़ोन फिर आया। मैंने चंपाबाई का पता लगाया था। वह ऑपेरा हाउस के करीब एक कोठे पर मुजरा करती है, यह जानकारी मैंने उसे दी।

मैंने कुछ झिझकते हुए कहा-‘मुझ जैसे सफ़ेदपोश के लिए कोठे पर चलना ठीक न होगा, तुम अकेले ही चले जाना!’

वह ठहाका मारकर हँस पड़ा, मैं चुप रहा! हँसते हुए उसने कहा- ‘काका आप भूल रहे हैं कि आप लेज्क हैं, और लेज्क कभी बूढ़ा नहीं होता। आपने ख़ुद एक बार हिंदी के लेज्क जैनेंद्रकुमार का क़िस्सा सुनाया था, जिसमें उसने कहा था कि ‘शरीर बूढ़ा हुआ है तो क्या, दिल तो जवान है! काका दिल से आप भी जवान हैं।’ और उसने फ़ोन रज् दिया।

शनिवार की रात को हम दोनों चंपाबाई के कोठे पर गए। चहल-पहल शुरू हो गई थी। हम दोनों एक तरफ़ अपने स्थान पर बैठ गए। वाकई में कमाल की ठुमरी गाई। गाते-गाते जो हरकतें सुर से तरंगें बनकर निकल रही थीं, उससे बदन में सिहरन-सी होने लगी। कितने प्रशंसक थे, जो उस पर नोटों का सदका उतार रहे थे।

मेरा अहमदाबादी दोस्त शांतचित्त बैठा रागिनी का आनंद लेता हुआ झूम रहा था। रात के दस बजे कुछ लोग चले गए, कुछ जाने की तैयारी में थे, पर हम बैठे रहे। सवा ग्यारह बजे चंपाबाई ने हमारे सामने आकर सलाम किया। हम समझ गए कि वह इजाजत चाहती हैं और साथ में बख्शीस की तलबगार भी हैं। मेरे दोस्त ने ब्रीफकेस जेला, एक लिफ़ाफ़ा चंपाबाई की ओर बढ़ाया जो लेते हुए चंपाबाई ने फिर झुककर सलाम किया और पलटकर चल दीं। हम दोनों भी नीचे आए, पर मैंने देज मेरे दोस्त पर रागिनी के सुरों का ख़ुमार छाया हुआ था।

उसके बाद आदतन यही होता रहा। वह जब भी मुंबई आता, शाम तक तमाम काम पूरे करता और रात को कोठे पर पहुँच जाता। रात को ग्यारह और

ढदर्द की एक गाथा


बारह के बीच का लिया हुआ आनंद समेटकर वह लौटता। मुझे घर छोड़ता और ख़ुद होटल चला जाता। दो-ढाई महीने न वह आया, न उसका फ़ोन। जाने कहाँ गायब हो गया? मैं भी अपने कामों में व्यस्त था। एक दिन अचानक आ पहुँचा और हम दोनों कोठे पर पहुँचे। मेरे दोस्त को देज्कर चंपाबाई की आँज्ें ऐसे चमक उठीं जैसे सूरज निकलने पर हर तरफ़ रोशनी छा गई हो। मेरे दोस्त के चेहरे पर भी ऐसी ही आभा फैलने लगी, जैसे सुबह की ताषा हवा के लगने से मुरझाया फूल ज्लि उठता है। रात को जब इजाजत लेनी चाही, तो चंपाबाई ने मुस्कराते पूछा-‘तबीयत नासाष है क्या?’ ये सवाल मेरे दोस्त से किया गया और उसने जवाब देते हुए कहा-‘यूरोप गया था।’

‘आप यूरोप गए थे?’ उसको शायद विश्वास ही नहीं हो रहा था।

‘बिजनिस ट्रिप थी।’

‘षाहिर है, वहाँ आपको हमारी याद कहाँ आई होगी?’ कहते हुए वह नषाकत के साथ सामने आकर बैठी।

मेरे दोस्त ने जेब से पर्स निकाला, मगर उसमें से नोट नहीं, एक फ़ोटो निकाला। मैं हैरानी के साथ उस तस्वीर को देज्ने लगा, वह रंगीन तस्वीर चंपाबाई की थी।

उसने फ़ोटो चंपाबाई को दिजते हुए कहा-‘आप हर वक़्त हमें याद हैं और पर्स में महफ़ूज हैं।’ यह कहते हुए उसके होंठों पर मुस्कान रक्स करने लगी। चंपाबाई यह देज्कर एक तरफ तो हैरान हुई, पर दूसरी ओर उसे गर्व महसूस हुआ। अचानक वह उठी, अंदर गई और एक लिफ़ाफ़ा लेकर लौटी। लिफ़ाफ़े में दिया हुआ चेक मेरे दोस्त की ओर बढ़ाया। वह भी हैरान हो गया और कह उठा-‘यह तो मेरा दिया हुआ चेक है। अभी तक कैश नहीं करवाया है? यह मुझे दे दो, तो मैं तुम्हें कैश दूँ।’

चंपाबाई चेकवाला हाथ पीछे लेते हुए मुस्कुराकर कह उठी-‘आप मेरी तस्वीर अपनी पर्स में रज् सकते हैं, तो क्या मैं आपका दिया हुआ चेक अपने पास सँभालकर नहीं रज् सकती?’

मेरा दोस्त ला-जवाब हो गया। शायद मन में ख़ुश भी था। फिर चंपाबाई की तरफ़ देज्ते हुए कहा-‘फ़ोटो महज फ़ोटो है यादगार को लिए, पर यह चेक है, जिससे तुम्हें पैसे मिलेंगे!’

दर्द की एक गाथा ढ


चंपाबाई का चेहरा उतर गया, उदास स्वर में बोली-‘यह सच है कि हम पैसों के लिए नाचते-गाते हैं, लेकिन हमारा दिल भी चाहता है कि हम आपकी दी हुई सौग़ातें सँभालकर रज्ें। जैसे आपने मेरी फ़ोटो रज्ी है।’ इतना कहकर वह बिना जवाब सुने अंदर चली गई। हम दोनों भी नीचे आए, पर दोस्त के दिल पर चंपाबाई के कथन का बोझ था, या उस चेक का उसके पास महफ़ूज रहने का फ़ख्र था, मैं कह नहीं सकता!

कितने मौसम बदले, गर्मी आई, सर्दी आई, बहार आई, पतझड़ आकर लौट गई, पर मेरा दोस्त मुंबई नहीं आया। इस बीच मैं हाँगकांग का सफ़र करके लौट आया, जिसकी रिपोर्ट मैगषीन में छपी। उसका एक परचा इस रिमार्क के साथ लौट आया कि ‘आदमी मौजूद नहीं।’ मैं हैरान था कि आख़िर वह गया कहाँ? एक साल से ष्यादा बीत गया। अचानक वह एक दिन आकर धमका। ताजमहल होटल से फ़ोन किया। फौरन आओ। फ़ोन नंबर और रूम नंबर भी बताया। मैं एक घंटे में उसके पास पहुँचा। वह इंतषार कर रहा था। पहले होटल में अच्छा नाश्ता किया, जूस पिया और फिर हाल-अहवाल दिया।

यूरोप की अगली ट्रिप में वह कुछ नई जान-पहचान बनाकर आया था। इस बार जब वह गया, तो उन्होंने उसे अमरीकन आर्मी के लिए एक कॉन्ट्रैक्ट लेकर दिया। अमरीका अफ़गनिस्तान के दहशतगारों पर हवाई हमले कर रहा था और उन्हें जिन चीषों की षरूरत थीं वह मेरा यह दोस्त उन्हें सप्लाई करता रहा। उस कॉन्ट्रैक्ट में उसने लाजें डॉलर कमाए। जंग बंद हुई तो कॉन्ट्रैक्ट भी पूरा हुआ। वह भारत लौट आया। पैसा बड़ा बलवान है। पहले वह मुंबई आता, तो सस्ते होटल में ठहरता। अब उसके पास डॉलर है, वह ताजमहल में आकर ठहरा है। होटल ने एयरकंडीशन कार का भी इंतषाम किया हुआ था। मेरे दोस्त का पहनावा भी बहुत क़ीमती था।

उस रात वह मुझे कार में चंपाबाई के कोठे पर ले गया, लेकिन पंछी उड़ गया था, पिंजरा ख़ाली था। दोस्त को गहरा सदमा पहुँचा। ख़ाली-ख़ाली निगाहों से वह मेरी तरफ़ देज्ने लगा। ऐसे जैसे समुद्र की बीच भँवर में उसकी नौका टूट गई हो और वह उससे बचकर निकलने के लिए प्रयास कर रहा हो।

मैंने उसे दिलदारी देते हुए कहा-‘मैं पता लगाता हूँ कि वह कहाँ गई है। वह भी आँजें में उम्मीद लिए मुझे देज्ता रहा और मुझे लगा कि सोने का

ढदर्द की एक गाथा


पिंजरा भी अमूल्य है, अगर उसमें से जीता-जागता परिंदा उड़ जाए। मैंने थोड़े पैसे खर्च करके चंपाबाई का पता लगवाया। हमारी तलाश की मंषिल एक ऐसे मोहल्ले में थी, जहाँ कोई भी भला आदमी जाने से कतराता! वह वेश्यागाह था, रेड लाइट एरिया!

कार को रोड पर पार्क करके हम दोनों चंपाबाई को ढूँढते-ढूँढते एक सँकरी गली में दाख़िल हुए। मैं उस रास्ते से कई बार गुषरा हूँ। मेरे साथी लक्ष्मण की प्रेस में जाने के लिए घर के पास से बस नं॰ 65 और 69 से सफ़र के बाद इसी रास्ते से जाना पड़ता था।

मेरा दोस्त मायूस होता रहा। कहाँ अमरीका का ऐशो-आराम और कहाँ मुंबई की यह गंदी गली-रेडलाइट एरिया!

हम चंपाबाई की जेली पर पहुँचे। जहाँ वह दरवाषे के पास रज्ी कुर्सी पर बैठी थी। गहरे मेकअप के बावजूद वह कोई ख़ास सुंदर नहीं लग रही थी। हमें देज्कर उठ ज्ड़ी हुई और मुस्कुराई।

मेरे दोस्त की हालत सूज्े पत्ते की तरह-निर्जीव! चंपा ने ही कहा- ‘मुझे खातिरी थी कि एक दिन आप मुझे जेज लेंगे।’

हम दोनों अब भी चुप थे। चंपा ने इशारे से कहा-‘आओ, अंदर आओ।’ वह ख़ुद थोड़ा भीतर होकर ज्ड़ी रही। हम जैसे-तैसे अंदर दाख़िल हुए।

मैंने देज कि और जेलियों में बैठी, ज्ड़ी, मोहन कल्पना (एक हस्ताक्षर सिंधी लेज्क का नाम) की नषर में, आधे घंटे की प्रेतात्माएँ हमको देज्कर मुस्कराने लगीं। हमें मालदार रईस समझकर शायद वो चंपा के नसीब पर रश्क कर रही थीं।

‘कैसे ढूँढ लिया?’ चंपा ने पलंग पर बिछी चादर की सलवटें ठीक करते हुए पूछा। हमने कुछ नहीं कहा।

‘ठहरो एक कुर्सी पड़ोस की जेली से ले आती हूँ।’

‘नहीं हम यहाँ ठीक है।’ मेरे दोस्त ने जैसे-तैसे मुँह जेला।

‘पुरानी कोठी पर जाकर ख़बर लगी होगी।’

‘हाँ! किसी तरह आपका पता लगाया।’ मैंने उसे बताया।

‘बैठिए तो मैं आपको बताऊँ कि मैं यहाँ कैसे पहुँची?’

हमारे मन की भावना भी यही थी कि पता तो लगे कि वह किन हालात

दर्द की एक गाथा ढ


में यहाँ पहुँची है। उसने ख़ुद ही अपने बारे में बताया।

‘षिंदगी बड़ी बेरहम है।’ चंपा ने हमें पलंग पर बिठाया और ख़ुद हमारे सामने कुर्सी पर बैठ गई। मैंने सोचा यह ‘षिंदगी’ लफ़्ज भी अजीब है। कभी बेरहम, तो कभी मेहरबान। कभी षहर जैसी कड़वी, तो कभी शहद जैसी मीठी। चंपा की बातों से यही सच्चाई सामने आई। वह कहती रही, गाती बजाती रही, आप जैसे क़द्रदान आए गए, षिंदगी से कोई शिकायत न रही। एक दिन नगर सेवक आया, मेरे साथ रात गुजारने की ख़्वाहिश षाहिर की। मैंने उससे कहा ‘मैं वेश्या नहीं, गायिका हूँ।’ उसने हँसते हुए कहा-‘एक ही बात है।’

मैंने कहा ‘एक बात नहीं है, तुम जिस्मफ़रोश हो, मैं राग गाकर बख़्शीश लेती हूँ!’ नाराष होकर तेवर बदलकर बोला-‘राषी ख़ुशी नहीं मानोगी, तो षबरदस्ती करूँगा!’ इतना कहकर वह चुप हो गई। उसकी बात सुनकर हमारे दिलों में कहीं बारूद सुलगने लगा।

‘एक रात कोठी पर रेड करवाकर, षबरदस्ती मुझे अपने बँगले पर उठवाकर ले गया। मैंने उसे बहुत समझाया, उसके सामने बहुत गिड़गिड़ाई कि ‘मैं एक कलाकार हूँ, गाती हूँ, आराधना करती हूँ’, पर वह क्रूरता से हँसने लगा जैसे मेरी ज्ल्लिी उड़ा रहा हो। उसी रात, वहशी दरिंदे ने मुझे वेश्या बनाकर छोड़ा।

जैसे बारूद फटा, बड़ा धमाका हुआ, हमारा दिल भी जैसे पुर्षा-पुर्षा होकर बिज्रा। जब धमाके का धुआँ छटा, तब हमने सुना चंपाबाई कह रही थी-‘उस दिन के बाद मैं ठुमरी गायिका नहीं रही, जिस्मफ़रोश रंडी हो गई हूँ!’

उस दिन के पश्चात् मैंने अपने अहमदाबादी दोस्त को फिर कभी नहीं देज।

12. Hari Motwani (Barood)
हरि मोटवाणी (१९२९-२००६)
लाड़काणो, सिंध (पाकिस्तान), उपन्यास - ६, कहानी सं. - ४, सफ़रनामा - २, आत्मकथा - १ और कई सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित । उनके ज़्यादातर पात्र अपने ही जीवन के प्रतिबिम्ब होते हैं और ईमानदारी से जीते-जूझते हैं । लगभग ५ दशक तक साहित्यिक पत्रिका ‘कूँज’ के संपादक रहे । अन्य कई लेखकों की पुस्तकें प्रकाशित करके अहम् रोल अदा किया। उनका सिंध जाना और फिर एक सफरनामा हमारे सामने लाना एक उपलब्धि है। । कई संस्थाओं के पुरस्कार एवं ‘अझो’ उपन्यास पर साहित्यिक अकादमी द्वारा सम्मानित (१९९५)
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देवी नागरानी जन्म: 1941 कराची, सिंध (पाकिस्तान), 8 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, (एक अंग्रेज़ी) 2 भजन-संग्रह, 8 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, महाराष्ट्र अकादमी, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। साहित्य अकादमी / राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद से पुरुसकृत।
संपर्क 9-डी, कार्नर व्यू सोसाइटी, 15/33 रोड, बांद्रा, मुम्बई 400050॰ dnangrani@gmail.com
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