मधुवा की माँ---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

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मधुवा की माँ---डॉ. श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Fri Nov 30, 2018 4:51 pm

मधुवा की माँ---डॉ. श्रीमती तारा सिंह
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एक लम्बे अरसे के बाद, बीरजू और दीपक, दोनों जब शहर से गाँव लौटे । अपनी पूर्व यादों की मनोवेदना के निर्जन कानन में भटकते हुए कजरी के घर जा पहुँचे, हालाँकि पाँव दोनों के ही निश्चल थे । सामने प्याले में पड़ी मदिरा की अंतिम बूँदों को देखकर बीरजू बोल पड़ा---- दीपू, वह यौवन निष्फ़ल है, जिसका कोई हृदय उपासक नहीं ।
दीपू, बीरजू की बाँह का निष्फ़ल सहारा लेते हुए ,उन्हीं लफ़्जों में जवाब दिया, बोला ---- जैसे हम यहाँ प्रेम-अग्नि में जल रहे हैं, हो न हो उसी तरह व्याकुल, आहत कजरी भी हमारे लिए तड़प रही होगी । इसीलिए क्यों न हम उसके घर जाकर ,उसकी तड़प को कम कर दें, जिससे यह पृथ्वी स्वर्ग बनने से बच जाय ,क्योंकि पृथ्वी का गौरव स्वर्ग बनने में नहीं है । यह वसुंधरा, मानव-जाति के लिए बनी है ; इसमें आकांक्षा, कल्पित स्वर्ग की जगह नहीं है । रात के करीब 12 बजे थे, दोनों दोस्त कजरी के घर पहुँचे और आवाज लगाये ---- मधुवा, दरवाजा खोल बेटा ; देखो तुम्हारे चाचा आये हैं ।
नशे में धुत बीरजू ने पूछा--- दीपू , ये मधुवा कौन है ? हम तो कजरी से मिलने आये हैं, यहाँ ।
दीपू लड़खड़ाता हुआ बोला---- यह बच्चा, कजरी की ढ़लान जिंदगी का अलान है, बीरजू ।
कुछ देर बाद मधुवा ( लगभग 10 साल का एक बच्चा ) ने आकर दरवाजा खोला ; दोनों दोस्त अंदर गये । वहाँ जाकर देखा---- कजरी, भूमि पर अचेत पड़ी हुई है ।
दीपू, कुप्पी की रोशनी में कजरी को सर से पैर तक निहारा और चिल्ला पड़ा --- इसकी रौनक भरी जिंदगी में ऐसा सन्नाटा कहाँ से आ गया, बीरजू । इसके रसभरे होठ सूख गये हैं ,सारे अंग ढ़ीले पड़े हैं । जिंदगी होने का कोई चिह्न बाकी बचा है तो वह है उसका धीरे-धीरे कराहना । पास खड़ा, मधुवा बोल पड़ा---- पता नहीं चाचा ! माँ की तबीयत आज दो-तीन साल से ठीक क्यों नहीं चल रही ?
बीरजू, भूमि पर पड़ी कजरी के मुख पर से लट को हटाता हुआ बोला---- उस दृप्त सौन्दर्य को याद कर विश्वास नहीं होता कि यौवन के ढ़लने में इतनी तीव्र प्रवाह होती है ।


दीपू, बीरजू के हाँ में हाँ मिलाता हुआ बोला------ हाँ, जैसे चाँदनी रात में पहाड़ से बरसाती झरने घंटे-दो घंटे में गिर कर खत्म हो जाते हैं ; ठीक वैसी ही यह जवानी झड़कर एक दिन खत्म हो जाती है । इसे न कोई आते देख पाता है, न जाते ; मगर ढ़लने का एहसास हर कोई करता है ।
वह भी एक जमाना था, सांसारिक व्यवहारों में चतुर, चिकनी-चुपड़ी बातों में बड़े-बड़ों को बेवकूफ़ बनाने में दक्ष कजरी के आगे-पीछे ,क्या पहरेदार और क्या थानेदार , सभी कुत्ते की तरह दुम हिलाये चलते थे । मजाल था कि कोई जोर गले में कजरी को डाँट दे । बावजूद नित्य बदल-बदल कर आनेवाले , आगन्तुकों से कजरी पड़ेशान रहा करती थी । आज इसका हाल जानने वाला कोई नहीं ।
बीरजू द्रवित हो बोला ---- वो रामधनी चाचा !
दीपू चकित हो पूछा --- किस चाचा की बात तुम करते हो ?
बीरजू , भारी साँस छोड़ते हुए बोला ---- वही हमारे गाँव का पुलिस चाचा, जो कजरी के घर का फ़ेरा ऐसे लगाया करते थे, जैसे देवीस्थान में जाकर उपासक लगाया करते हैं । उनको तो कम से कम एक बार कजरी का हाल-समाचार लेना चाहिये था । कितने स्वार्थी निकले ? कभी तो स्त्रियों की कमजोरी को भाँपते हुए, चाँदी का बरक लगाया मिठाई लेकर कजरी के घर पड़े रहते थे । तब उन्हें न घर की लाज थी, न ही समाज की परवाह ; आज खुद को नाती-पोते के समक्ष पुरुषोत्तम कहलाते हैं ।
बीरजू की बात पर दीपू गंभीर होकर बोला--- अरे ! तब की कजरी और अभी की कजरी में आकाश-जमीन का फ़र्क है । कजरी तब जवान थी; रंग-रूप में , हाव-भाव में इसकी बराबरी पाँच गाँव में, कोई दूसरी नहीं थी । इसके अंग-अंग में स्फ़ूर्ति भरी हुई थी; पोर –पोर से मद छलकता था और अब तो सूखी जूही सी पड़ी हुई है । फ़िर उदासीन भाव से दीपू ने कहा ---रूप और यौवन का प्रदर्शन ज्यादा दिन नहीं चलता । जानते हो बीरजू, यह जानकर तुमको दुख होगा, कि कजरी शुरू से ऐसी नहीं थी । सुनता हूँ कजरी, जवानी की दहलीज पर पाँव रखने से पहले से ही उसकी माँ, अपने दरवाजे पर किसी नौजवान को खड़ा तक नहीं होने देती थी । उसका कहना था, अर्द्धविकसित कलियों को कोट में सजाना हर कोई चाहता है ,



मगर प्रस्वेद बिन्दू के समान उस पर पड़े ओस को, सुर्य की तपती किरणों से बचाता कोई नहीं ।
बीरजू ,जो सर झुकाये दीपू की बातों को अब तक ध्यान से सुन रहा था, कड़कता हुआ बोला --- तो क्या हमारे सामने जो भूमि पर पड़ी हुई है, यह कभी गंगा-जल के समान पवित्र भी थी ?
बीरजू ने कहा --- हाँ ।
दीपू सशंकित हो बोला ---- तो कजरी बदनाम क्यों है ? इसे लोग बुरी नजर से क्यों देखते हैं ?
बीरजू ने कहा ---- एक बार कजरी, अपनी बड़ी बहन के साथ उसके ससुराल गई थी । वहाँ, दीदी के देवर के साथ हँसी-मजाक में जो उसका पैर फ़िसला, फ़िसलता ही चला गया । यहाँ तक कि शादी के बाद भी,कजरी के पाँव नहीं रुके, जैसा कि बेचू चाचा बताते हैं । कजरी के इसी व्यवहार से ऊबकर उसके पति घर छोड़कर चले गये । कहाँ गये , उनका आज तक कोई अता-पता नहीं मिला ।
बीरजू की बात पर असहमति जताते हुए दीपू ने कहा--- दायित्वविहीन विचारपति, सच्चा पति नहीं होता । उसे चाहिये, पति-धर्म को निभाते हुए , कजरी को धर्म की राह पर चलने, सिखलाना ।
बीरजू, दरिद्र कजरी की ओर कृतग्यता की दॄष्टि से देखा और सहायता स्वरूप कुछ रुपये उसे देना चाहा, जिसे कजरी अस्वीकार करती हुई, दोनों हाथ जोड़कर रो पड़ी , बोली---- जिंदगी की सत्तर बहार ,आपलोगों की खिदमत में गुजरी है, अब बची-खुची जिंदगी ,उसकी खिदमत में गुजर जाने दीजिये,जिसने मुझे यह रूप-रंग देकर इस दुनिया में भेजा । आज मैं कजरी नहीं, मधुवा की माँ हूँ, यह कहकर कजरी शिशिर की संध्या में अपनी वेदना और जिंदगी की थकावट की धूसर चादर में, मुँह लपेटकर सदा के लिए सो गई ।
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