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वतन ये मेरा, बहती---madhu trivedi

Posted: Thu Jul 12, 2018 10:51 am
by admin
madhu trivedi

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वतन ये मेरा, बहती
जहाँ स्नेह फुहार है
जहाँ पर हर प्रेम बंधन
में हार स्वीकार है

बहती जहाँ रगो में सतत
निर्मल , पावनि गंगा
रहता है जहाँ पर हर
इक दिल चंगा

वहाँ दिलों में हर रोज खिंची क्यों
जाँति -पाँति की अमिट दीवार है

पति पत्नी में न समरसता
रिश्ते लगते झूठे
सार न जिन्दगी का कोई ,
कोरे लगते ठूँठे

अब न शेष बचा उत्साह
और उन्माद है
ग्रहण लगा कैसा अस्तित्व
हो गया तार तार है

बाप बेटे में तन रही , खेले खून की होलियाँ
भारत भू हो गयी लाल अपने पर दागे गोलियाँ

जीवन हो गया मुश्किल
करूँ कान्ह पुकार
घर के झगड़े घर से निकल
रोज अखवार है