दीप बनकर...अमरेश सिंह भदोरिया

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दीप बनकर...अमरेश सिंह भदोरिया

Post by admin » Sun Dec 10, 2017 12:13 pm

दीप बनकर...

दीप बनकर रात के
साये में जलना चाहता हूँ।
मैं भी समय के साथ-
साथ चलना चाहता हूँ।
1.
राह में गिरना फिसलना
बात बीते कल की थी;
आज अपने पैरों पर
मैं भी सम्भलना चाहता हूँ।
2.
छाया हो या धूप हो
या कि हों बरखा के दिन;
बादलों की बूँद-सा मैं
जमी पर बरसना चाहता हूँ।
3.
हर तरफ होती है चर्चा
बस सियासी तल्खियों की;
काजल की इस कोठरी से
मैं बाहर निकलना चाहता हूँ।
4.
बढ़ गई ना जाने कैसे
अपने दिलों में दूरियां;
भूल कर शिकवे गिले मैं
अब गले मिलना चाहता हूँ।

अमरेश सिंह भदोरिया
अजीतपुर
लालगंज
रायबरेली उ0 प्र0
पिनकोड-229206
Email-amreshsinghhh@gmail.com
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