जिंदगी की शाम ढ़लने लगी -— डा० श्रीमती तारा सिंह

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जिंदगी की शाम ढ़लने लगी -— डा० श्रीमती तारा सिंह

Post by admin » Wed Feb 14, 2018 6:55 am

जिंदगी की शाम ढ़लने लगी — डा० श्रीमती तारा सिंह, नवी मुम्बई

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जिंदगी की शाम ढ़लने लगी
न तुम मिले, न तुम्हारा सहारा मिला

भटक गये गम के अंधेरे में हम
उम्र भर न तुम्हारा इशारा मिला

हम अकेले थे, दिल भी बीमार था
न दवा ही मिली,न तीमार-दारा मिला

मौत ने जब मुस्कुराकर पुकारा मुझे
लगा , जिंदगी को किनारा मिला

मिट गये जमाने के सारे गिले,अब
न शिकवा रहा , न शिकारा मिला

आ गये जिंदगी से बहुत दूर हम
न तुम मिले, न दामन तुम्हारा मिला

चलते- चलते आ गए हम किस मोड़ पर
जहाँ न सूरज मिला,न चाँद दुलारा मिला

दूर तक आसमां , आसमां था मगर
आसमां में न कोई सितारा मिला
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