"गंगा " (व्यंग रचना )----सुखमंगल सिंह

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"गंगा " (व्यंग रचना )----सुखमंगल सिंह

Post by admin » Fri Feb 23, 2018 10:28 am

"गंगा " (व्यंग रचना )
मंगल की ललकार
सरयू करे पुकार
गंगा गंगा गंगा
तू पाताले जा ?
जब तू पाताले जायेगी
जहां हाहाकार मचाएगा |
गंगा -सरयू तेरी बहना
विष्णु आँसू उसका गहना |
बहुत हो चुका उलाहना
बड़े काम का तेरा अंगना |
गंगा तेरी महिमा - कृपा
से सरयू का और नाम बढेगा |
गंगा गंगा गंगा
तू पाताते जा ?
कमण्डल -पगनख की
जहा रीति नही चलती !
तुझने हजम करने की
नीति जहाँ चलती |
यह कलयुग है यहाँ
प्रीती नही चलती ?
तेरी छटा पर का
उड़द दडा जाएगा ?
तेरे कण से महल गढ़ा जाएगा !
गंगा गंगा तू पाताले जा !!


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Sukhmangal Singh
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